शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५६९
हो उसे साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक घरको जाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके वह व्याध एक बेलके पेड़पर चढ़ गया और वहीं जल साथ लेकर बैठ गया। उसके मनमें केवल यही चिन्ता थी कि कब कोई जीव आयेगा और कब मैं उसे मारूँगा। इसी प्रतीक्षामें भूख-प्याससे पीड़ित हो वह बैठा रहा। उस रातके पहले पहरमें एक प्यासी हरिणी वहाँ आयी, जो चकित होकर जोर-जोरसे चौकड़ी भर रही थी। ब्राह्मणो ! उस मृगीको देखकर व्याधको बड़ा हर्ष हुआ और उसने तुरंत ही उसके वधके लिये अपने धनुषपर एक बाणका संधान किया। ऐसा करते हुए उसके हाथके धक्केसे थोड़ा-सा जल और बिल्वपत्र नीचे गिर पड़े। उस पेड़के नीचे शिवलिंग था। उक्त जल और बिल्वपत्रसे शिवकी प्रथम प्रहरकी पूजा सम्पन्न हो गयी। उस पूजाके माहात्म्यसे उस व्याधका बहुत-सा पातक तत्काल नष्ट हो गया। वहाँ होनेवाली खड़खड़ाहटकी आवाजको सुनकर हरिणीने भयसे ऊपरकी ओर देखा। व्याधको देखते ही वह व्याकुल हो गयी और बोली—
मृगीने कहा—व्याध ! तुम क्या करना चाहते हो मेरे सामने सच-सच बताओ।
हरिणीकी वह बात सुनकर व्याधने कहा—आज मेरे कुटुम्बके लोग भूखे हैं; अतः तुमको मारकर उनकी भूख मिटाऊँगा, उन्हें तृप्त करूँगा।
व्याधका वह दारुण वचन सुनकर तथा जिसे रोकना कठिन था, उस दुष्ट भीलको बाण ताने देखकर मृगी सोचने लगी कि ‘अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? अच्छा कोई उपाय रचती हूँ।’ ऐसा विचारकर उसने वहाँ इस प्रकार कहा।
मृगी बोली—भील ! मेरे मांससे तुमको सुख होगा, इस अनर्थकारी शरीरके लिये इससे अधिक महान् पुण्यका कार्य और क्या हो सकता है? उपकार करनेवाले प्राणीको इस लोकमें जो पुण्य प्राप्त होता है, उसका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता *। परंतु इस समय मेरे सब बच्चे मेरे आश्रममें ही हैं। मैं उन्हें अपनी बहिनको अथवा स्वामीको सौंपकर लौट आऊँगी। वनेचर ! तुम मेरी इस बातको मिथ्या न समझो। मैं फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगी, इसमें संशय नहीं है। सत्यसे ही धरती टिकी हुई है, सत्यसे ही समुद्र अपनी मर्यादामें स्थित है और सत्यसे ही निर्झरोंसे जलकी
* उपकारकरस्यैव यत् पुण्यं जायते त्विह। तत् पुण्यं शक्यते नैव वक्तुं वर्षशतैरपि॥
(शि० पु० को० रु० सं० ४०। २६)