शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७० * संक्षिप्त शिवपुराण *
धाराएँ गिरती रहती हैं। सत्यमें ही सब कुछ स्थित है।*
सूतजी कहते हैं—मृगीके ऐसा कहनेपर भी जब व्याधने उसकी बात नहीं मानी, तब उसने अत्यन्त विस्मित एवं भयभीत हो पुनः इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
मृगी बोली—व्याध! सुनो, मैं तुम्हारे सामने ऐसी शपथ खाती हूँ, जिससे घर जानेपर मैं अवश्य तुम्हारे पास लौट आऊँगी। ब्राह्मण यदि वेद बेचे और तीनों काल संध्या न करे तो उसे जो पाप लगता है, पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करके स्वेच्छा-नुसार कार्य करनेवाली स्त्रियोंको जिस पापकी प्राप्ति होती है, किये हुए उपकारको न माननेवाले, भगवान् शंकरसे विमुख रहनेवाले, दूसरोंसे द्रोह करनेवाले, धर्मको लाँघनेवाले तथा विश्वासघात और छल करनेवाले लोगोंको जो पाप लगता है, उसी पापसे मैं भी लिप्त हो जाऊँ, यदि लौटकर यहाँ न आऊँ।
इस तरह अनेक शपथ खाकर जब मृगी चुपचाप खड़ी हो गयी, तब उस व्याधने उसपर विश्वास करके कहा—'अच्छा, अब तुम अपने घरको जाओ।' तब वह मृगी बड़े हर्षके साथ पानी पीकर अपने आश्रम-मण्डलमें गयी। इतनेमें ही रातका वह पहला प्रहर व्याधके जागते-ही-जागते बीत गया। तब उस हिरनीकी बहिन दूसरी मृगी, जिसका पहलीने स्मरण किया था, उसीकी राह देखती हुई जल पीनेके लिये वहाँ आ गयी। उसे देखकर भीलने स्वयं बाणको तरकशसे खींचा। ऐसा करते समय पुनः पहलेकी भाँति भगवान् शिवके ऊपर जल और बिल्वपत्र गिरे। उसके द्वारा महात्मा शम्भुकी दूसरे प्रहरकी पूजा सम्पन्न हो गयी। यद्यपि वह प्रसंगवश ही हुई थी, तो भी व्याधके लिये सुखदायिनी हो गयी। मृगीने उसे बाण खींचते देख पूछा—'वनेचर! यह क्या करते हो?' व्याधने पूर्ववत् उत्तर दिया—'मैं अपने भूखे कुटुम्बको तृप्त करनेके लिये तुझे मारूँगा।' यह सुनकर वह मृगी बोली।
मृगीने कहा—व्याध! मेरी बात सुनो। मैं धन्य हूँ। मेरा देह-धारण सफल हो गया; क्योंकि इस अनित्य शरीरके द्वारा उपकार होगा। परंतु मेरे छोटे-छोटे बच्चे घरमें हैं। अतः मैं एक बार जाकर उन्हें अपने स्वामीको सौंप दूँ, फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगी।
व्याध बोला—तुम्हारी बातपर मुझे विश्वास नहीं है। मैं तुझे मारूँगा, इसमें संशय नहीं है।
यह सुनकर वह हरिणी भगवान् विष्णुकी शपथ खाती हुई बोली—'व्याध! जो कुछ मैं कहती हूँ, उसे सुनो। यदि मैं लौटकर न आऊँ तो अपना सारा पुण्य हार जाऊँ; क्योंकि जो वचन देकर उससे पलट जाता है, वह अपने पुण्यको हार जाता है। जो पुरुष अपनी विवाहिता स्त्रीको त्यागकर दूसरीके पास जाता है, वैदिक धर्मका उल्लंघन करके कपोलकल्पित धर्मपर
* स्थिता सत्येन धरणी सत्येनैव च वारिधिः। सत्येन जलधाराश्च सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
(शि० पु० को० रु० सं० ४०।२९)