शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पराक्रमी रुद्र सर्वथा शिवरूप ही हैं। वे भक्तोंके कार्यकी सिद्धिके निमित्त विष्णु और ब्रह्माकी सहायता करनेके लिये प्रकट हुए हैं। अन्य जो-जो देवता जिस क्रमसे प्रकट हुए हैं, उसी क्रमसे लयको प्राप्त होते हैं। परंतु रुद्रदेव उस तरह लीन नहीं होते। उनका साक्षात् शिवमें ही लय होता है। ये प्राकृत प्राणी रुद्रमें मिलकर ही लयको प्राप्त होते हैं। परंतु रुद्र इनमें मिलकर लयको नहीं प्राप्त होते। यह भगवती श्रुतिका उपदेश है। सब लोग रुद्रका भजन करते हैं, किंतु रुद्र किसीका भजन नहीं करते। वे भक्तवत्सल होनेके कारण कभी-कभी अपने-आप भक्तजनोंका चिन्तन कर लेते हैं। जो दूसरे देवताका भजन करते हैं, वे उसीमें लीन होते हैं; इसीलिये वे दीर्घकालके बाद रुद्रमें लीन होनेका अवसर पाते हैं। जो कोई रुद्रके भक्त हैं, वे तत्काल शिव हो जाते हैं; अतः उनके लिये दूसरेकी अपेक्षा नहीं रहती। यह सनातन श्रुतिका संदेश है।
द्विजो! अज्ञान अनेक प्रकारका होता है, परंतु विज्ञानका एक ही स्वरूप है। वह अनेक प्रकारका नहीं होता। उसको समझनेका प्रकार मैं बताऊँगा, तुमलोग आदरपूर्वक सुनो। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ भी यहाँ देखा जाता है, वह सब शिवरूप ही है। उसमें नानात्वकी कल्पना मिथ्या है। सृष्टिके पूर्व भी शिवकी सत्ता बतायी गयी है, सृष्टिके मध्यमें भी शिव विराज रहे हैं, सृष्टिके अन्तमें भी शिव रहते हैं और जब सब कुछ शून्यतामें परिणत हो जाता है, उस समय भी शिवकी सत्ता रहती ही है। अतः मुनीश्वरो ! शिवको ही चतुर्गुण कहा गया है। वे ही शिव शक्तिमान् होनेके कारण 'सगुण' जाननेयोग्य हैं। इस प्रकार वे सगुण-निर्गुणके भेदसे दो प्रकारके हैं। जिन शिवने ही भगवान् विष्णुको सम्पूर्ण सनातन वेद, अनेक वर्ण, अनेक मात्रा तथा अपना ध्यान एवं पूजन दिये हैं, वे ही सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर हैं—ऐसी सनातन श्रुति है। अतएव शम्भुको ‘वेदोंका प्राकट्यकर्ता’ तथा ‘वेदपति’ कहा गया है। वे ही सबपर अनुग्रह करनेवाले साक्षात् शंकर हैं। कर्ता, भर्ता, हर्ता, साक्षी तथा निर्गुण भी वे ही हैं। दूसरोंके लिये कालका मान है, परंतु कालस्वरूप रुद्रके लिये कालकी कोई गणना नहीं है; क्योंकि वे साक्षात् स्वयं महाकाल हैं और महाकाली उनके आश्रित हैं। ब्राह्मण, रुद्र और कालीको एक-से ही बताते हैं। उन दोनोंने सत्य लीला करनेवाली अपनी इच्छासे ही सब कुछ प्राप्त किया है। शिवका कोई उत्पादक नहीं है। उनका कोई पालक और संहारक भी नहीं है। ये स्वयं सबके हेतु हैं। एक होकर भी अनेकताको प्राप्त हो सकते हैं और अनेक होकर भी एकताको। एक ही बीज बाहर होकर वृक्ष और फल आदिके रूपमें परिणत होता हुआ पुनः बीजभावको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार शिवरूपी महेश्वर स्वयं एकसे अनेक होनेमें हेतु हैं। यह उत्तम शिवज्ञान तत्त्वतः बताया गया है। ज्ञानवान् पुरुष ही इसको जानता है, दूसरा नहीं।
मुनि बोले—सूतजी! आप लक्षणसहित ज्ञानका वर्णन कीजिये, जिसको जानकर मनुष्य शिवभावको प्राप्त हो जाता है। सारा जगत् शिव कैसे है अथवा शिव ही सम्पूर्ण जगत् कैसे हैं?
ऋषियोंका यह प्रश्न सुनकर पौराणिक-शिरोमणि सूतजीने भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके उनसे कहा।
(अध्याय ४२)
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