शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५७७
शिवसम्बन्धी तत्त्वज्ञानका वर्णन तथा उसकी महिमा, कोटिरुद्रसंहिताका माहात्म्य एवं उपसंहार
सूतजीने कहा—ऋषियो! मैंने शिवज्ञान जैसा सुना है, उसे बता रहा हूँ। तुम सब लोग सुनो, वह अत्यन्त गुह्य और परम मोक्षस्वरूप है। ब्रह्मा, नारद, सनकादि, मुनि व्यास तथा कपिल—इनके समाजमें इन्हीं लोगोंने निश्चय करके ज्ञानका जो स्वरूप बताया है, उसीको यथार्थ ज्ञान समझना चाहिये। सम्पूर्ण जगत् शिवमय है, यह ज्ञान सदा अनुशीलन करनेयोग्य है। सर्वज्ञ विद्वान्को यह निश्चितरूपसे जानना चाहिये कि शिव सर्वमय हैं। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब शिव ही हैं। वे महादेवजी ही शिव कहलाते हैं। जब उनकी इच्छा होती है, तब वे इस जगत्की रचना करते हैं। वे ही सबको जानते हैं, उनको कोई नहीं जानता। वे इस जगत्की रचना करके स्वयं इसके भीतर प्रविष्ट होकर भी इससे दूर हैं। वास्तवमें उनका इसमें प्रवेश नहीं हुआ है; क्योंकि वे निर्लिप्त, सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। जैसे सूर्य आदि ज्योतियोंका जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, वास्तवमें जलके भीतर उनका प्रवेश नहीं होता, उसी प्रकार साक्षात् शिवके विषयमें समझना चाहिये। वस्तुतः तो वे स्वयं ही सब कुछ हैं। मतभेद ही अज्ञान है; क्योंकि शिवसे भिन्न किसी द्वैत वस्तुकी सत्ता नहीं है। सम्पूर्ण दर्शनोंमें मतभेद ही दिखाया जाता है, परंतु वेदान्ती नित्य अद्वैत तत्त्वका वर्णन करते हैं। जीव परमात्मा शिवका ही अंश है; परंतु अविद्यासे मोहित होकर अवश हो रहा है और अपनेको शिवसे भिन्न समझता है। अविद्यासे मुक्त होनेपर वह शिव ही हो जाता है। शिव सबको व्याप्त करके स्थित हैं और सम्पूर्ण जन्तुओंमें व्यापक हैं। वे जड़ और चेतन—सबके ईश्वर होकर स्वयं ही सबका कल्याण करते हैं। जो विद्वान् पुरुष वेदान्तमार्गका आश्रय ले उनके साक्षात्कारके लिये साधना करता है, उसे वह साक्षात्काररूप फल अवश्य प्राप्त होता है। व्यापक अग्नितत्त्व प्रत्येक काष्ठमें स्थित है; परंतु जो उस काष्ठका मन्थन करता है, वही असंदिग्धरूपसे अग्निको प्रकट करके देखता है। उसी तरह जो बुद्धिमान् यहाँ भक्ति आदि साधनोंका अनुष्ठान करता है, उसे अवश्य शिवका दर्शन प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। सर्वत्र केवल शिव हैं, शिव हैं, शिव हैं; दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वे शिव भ्रमसे ही सदा नाना रूपोंमें भासित होते हैं।
जैसे समुद्र, मिट्टी अथवा सुवर्ण—ये उपाधिभेदसे नानात्वको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार भगवान् शंकर भी उपाधियोंसे ही अनेक रूपोंमें भासते हैं। कार्य और कारणमें वास्तविक भेद नहीं होता। केवल भ्रमसे भरी हुई बुद्धिके द्वारा ही उसमें भेदकी प्रतीति होती है। भ्रम दूर होते ही भेदबुद्धिका नाश हो जाता है। जब बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है, तब वह नानात्वको प्रकट करता है; फिर अन्तमें वह बीजरूपमें ही स्थित होता है और अंकुर नष्ट हो जाता है। ज्ञानी बीजरूपमें ही स्थित है और नाना प्रकारके विकार अंकुररूप हैं। उन विकारस्वरूप अंकुरोंकी निवृत्ति हो जानेपर पुरुष फिर ज्ञानीरूपमें ही स्थित होता है—इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। सब कुछ शिव है और शिव ही सब कुछ हैं। शिव तथा
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