शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउमासंहिता
भगवान् श्रीकृष्णके तपसे संतुष्ट हुए शिव और पार्वतीका उन्हें अभीष्ट वर देना तथा शिवकी महिमा
यो धत्ते भुवनानि सप्त गुणवान् स्रष्टा रजःसंश्रयः
संहर्त्ता तमसान्वितो गुणवतीं मायामतीत्य स्थितः।
सत्यानन्दमनन्तबोधममलं ब्रह्मादिसंज्ञास्पदं
नित्यं सत्त्वसमन्वयादधिगतं पूर्णं शिवं धीमहि॥
'जो रजोगुणका आश्रय ले संसारकी सृष्टि करते हैं, सत्त्वगुणसे सम्पन्न हो सातों भुवनोंका धारण-पोषण करते हैं, तमोगुणसे युक्त हो सबका संहार करते हैं तथा त्रिगुणमयी मायाको लाँघकर अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित रहते हैं, उन सत्यानन्दस्वरूप, अनन्त बोधमय, निर्मल एवं पूर्ण ब्रह्म शिवका हम ध्यान करते हैं। वे ही सृष्टिकालमें ब्रह्मा, पालनके समय विष्णु और संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं तथा सदैव सात्त्विक-भावको अपनानेसे ही प्राप्त होते हैं।
ऋषि बोले—महाज्ञानी व्यासशिष्य सूतजी! आपको नमस्कार है। आपने कोटिरुद्र नामक चौथी संहिता हमें सुना दी। अब उमासंहिताके अन्तर्गत नाना प्रकारके उपाख्यानोंसे युक्त जो परमात्मा साम्ब सदाशिवका चरित्र है, उसका वर्णन कीजिये।
सूतजीने कहा—शौनक आदि महर्षियो! भगवान् शंकरका मंगलमय चरित्र परम दिव्य एवं भोग और मोक्षको देनेवाला है। तुमलोग प्रेमसे इसका श्रवण करो। पूर्वकालमें मुनिवर व्यासने सनत्कुमारके सामने ऐसे ही पवित्र प्रश्नको उपस्थित किया था और इसके उत्तरमें उन्होंने भगवान् शिवके उत्तम चरित्रका गान किया था।
उस समय पुत्रकी प्राप्तिके निमित्त श्रीकृष्णके हिमवान् पर्वतपर जाकर महर्षि उपमन्युसे मिलने, उनकी बतायी हुई पद्धतिके अनुसार भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तप करने, उनके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती, कार्तिकेय तथा गणेशसहित शिवके प्रकट होने तथा श्रीकृष्णके द्वारा उनकी स्तुतिपूर्वक वरदान माँगनेकी कथा सुनाकर सनत्कुमारजीने कहा—श्रीकृष्णका वचन सुनकर भगवान् भव उनसे बोले—'वासुदेव! तुमने जो कुछ मनोरथ किया है, वह सब पूर्ण होगा।' इतना कहकर त्रिशूलधारी भगवान् शिव फिर बोले—"यादवेन्द्र! तुम्हें साम्ब नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी बलवान् पुत्र प्राप्त होगा। एक समय मुनियोंने भयानक संवर्तक (प्रलयंकर) सूर्यको शाप दिया था कि 'तुम मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होओगे' अतः वे संवर्तक सूर्य ही तुम्हारे पुत्र होंगे। इसके सिवा जो-जो वस्तु तुम्हें अभीष्ट है, वह सब तुम प्राप्त करो।"
सनत्कुमारजी कहते हैं—इस प्रकार परमेश्वर शिवसे सम्पूर्ण वरोंको प्राप्त करके श्रीकृष्णने विविध प्रकारकी बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा उन्हें पूर्णतया संतुष्ट किया। तदनन्तर भक्तवत्सला गिरिराजकुमारी शिवाने प्रसन्न हो उन तपस्वी शिवभक्त महात्मा वासुदेवसे कहा।
पार्वती बोलीं—परम बुद्धिमान् वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ।
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