शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ५८१
अनघ! तुम मुझसे भी उन मनोवांछित वरोंको ग्रहण करो, जो भूतलपर दुर्लभ हैं।
श्रीकृष्णने कहा—देवि! यदि आप मेरे इस सत्य तपसे संतुष्ट हैं और मुझे वर दे रही हैं तो मैं यह चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंके प्रति कभी मेरे मनमें द्वेष न हो, मैं सदा द्विजोँका पूजन करता रहूँ। मेरे माता-पिता सदा मुझसे संतुष्ट रहें। मैं जहाँ कहीं भी जाऊँ, समस्त प्राणियोंके प्रति मेरे हृदयमें अनुकूल भाव रहे। आपके दर्शनके प्रभावसे मेरी संतति उत्तम हो। मैं सैकड़ों यज्ञ करके इन्द्र आदि देवताओंको तृप्त करूँ। सहस्त्रों साधु-संन्यासियों और अतिथियोंको सदा अपने घरपर श्रद्धासे पवित्र अन्नका भोजन कराऊँ। भाई-बन्धुओंके साथ नित्य मेरा प्रेम बना रहे तथा मैं सदा संतुष्ट रहूँ।
सनत्कुमारजी कहते हैं—श्रीकृष्णका वह वचन सुनकर सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाली सनातनी देवी पार्वती विस्मित हो उनसे बोलीं—'वासुदेव! ऐसा ही होगा। तुम्हारा कल्याण हो।' इस प्रकार श्रीकृष्णपर उत्तम कृपा करके उन्हें उन वरोंको देकर पार्वतीदेवी तथा परमेश्वर शिव दोनों वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर केशिहन्ता श्रीकृष्णने मुनिवर उपमन्युको प्रणाम करके उनसे वर-प्राप्तिका सारा समाचार बताया। तब उन मुनिने कहा—'जनार्दन! संसारमें भगवान् शिवके सिवा दूसरा कौन महादानी ईश्वर है तथा क्रोधके समय दूसरा कौन अत्यन्त दुस्सह हो उठता है। महायशस्वी गोविन्द! दान, तप, शौर्य तथा स्थिरतामें शिवसे बढ़कर कौन है। अतः तुम शम्भुके दिव्य ऐश्वर्यका सदा श्रवण करते रहो।'*
तदनन्तर उपमन्युके द्वारा शिवकी महिमा सुननेके बाद उन मुनीश्वरको नमस्कार करके वसुदेवनन्दन केशव मन-ही-मन शम्भुका स्मरण करते हुए द्वारकापुरीको चले गये।
(अध्याय १—३)
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* महर्षि उपमन्युके द्वारा श्रीकृष्णके प्रति शिवतत्त्वके उपदेश तथा उपमन्युकी कथा वायवीयसंहितामें विस्तारसे कही जायगी।