भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

अनाथों, स्वाधीन पुरुषों, दीनों, बाल, वृद्ध, दुर्बल एवं रोगियोंपर कृपा नहीं करते, वे मूढ़ नरकके समुद्रमें गिरते हैं। मनुष्य जब मरता है तब उसका कमाया हुआ धन घरमें ही रह जाता है। भाई-बन्धु भी श्मशानतक जाकर लौट आते हैं, केवल उसके किये हुए पाप और पुण्य ही परलोकके पथपर जानेवाले उस जीवके साथ जाते हैं।

जो औचित्यकी सीमाको लाँघकर मनमाना कर वसूल करता है तथा दूसरोंको दण्ड देनेमें ही रुचि रखता है, वह राजा नरकमें पकाया जाता है। जिस राजाके राज्यमें प्रजा घूसखोरों, अपनी रुचिके अनुसार कम दाम देकर अधिक कीमतका माल ले लेनेवाले अधिकारियों तथा चोर-डाकुओंसे अधिक सतायी जाती है, वह राजा भी नरकोंमें पकाया जाता है। परायी स्त्रियोंके साथ व्यभिचार और चोरी करनेवाले प्रचण्ड पुरुषोंको जो पाप लगता है, वही परस्त्रीगामी राजाको भी लगता है। जो साधुको चोर और चोरको साधु समझता है तथा बिना विचारे ही निरपराधको प्राणदण्ड दे देता है, वह राजा नरकमें पड़ता है। जिस-किसी पराये द्रव्यको सरसों बराबर भी चुरा लेनेपर मनुष्य नरकमें गिरते हैं, इसमें संशय नहीं है। इस तरहके पापोंसे युक्त मनुष्य मरनेके पश्चात् यातना भोगनेके लिये नूतन शरीर पाता है, जिसमें सम्पूर्ण आकार अभिव्यक्त रहते हैं। इसलिये किये हुए पापका प्रायश्चित्त कर लेना चाहिये। अन्यथा सौ करोड़ कल्पोंमें भी बिना भोगे हुए पापका नाश नहीं हो सकता। जो मन, वाणी और शरीरद्वारा स्वयं पाप करता, दूसरेसे कराता तथा किसीके दुष्कर्मका अनुमोदन करता है, उसके लिये पापगति (नरक) ही फल है। (अध्याय ४—६)


पापियों और पुण्यात्माओंकी यमलोकयात्रा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! मनुष्य चार प्रकारके पापोंसे यमलोकमें जाते हैं। यमलोक अत्यन्त भयदायक और भयंकर है। वहाँ समस्त देहधारियोंको विवश होकर जाना पड़ता है। कोई ऐसे प्राणी नहीं हैं, जो यमलोकमें न जाते हों। किये हुए कर्मका फल कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका विचार करो। जीवोंमें जो शुभ कर्म करनेवाले, सौम्यचित्त और दयालु हैं, वे सौम्यमार्गसे यमपुरीके पूर्व द्वारको जाते हैं। जो पापी पापकर्मपरायण तथा दानसे रहित हैं, वे भयानक दक्षिण मार्गसे यमलोककी यात्रा करते हैं। मर्त्यलोकसे छियासी हजार योजनकी दूरी लाँघकर नानारूपवाले यमलोककी स्थिति है, यह जानना चाहिये। पुण्यकर्म करनेवाले लोगोंको तो वह नगर निकटवर्ती-सा जान पड़ता है; परंतु भयानक मार्गसे यात्रा करनेवाले पापियोंको वह बहुत दूर स्थित दिखायी देता है। वहाँका मार्ग कहीं तो तीखे काँटोंसे युक्त है; कहीं कंकड़ोंसे व्याप्त है; कहीं छुरेकी धारके समान तीखे पत्थर उस मार्गपर जड़े गये हैं, कहीं बड़ी भारी कीचड़ फैली हुई है। बड़े-छोटे पातकोंके अनुसार वहाँकी कठिनाइयोंमें भी भारीपन और हलकापन है। कहीं-कहीं यमपुरीके मार्गपर लोहेकी सूईके समान