भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

* उमासंहिता * ५८५

तीखे डाभ फैले हुए हैं।

तदनन्तर यमपुरीके मार्गकी भीषण यातनाओं और कष्टोंका वर्णन करके सनत्कुमारजीने कहा—व्यासजी! जिन्होंने कभी दान नहीं किया है, वे लोग ही इस प्रकार दुःख उठाते और सुखकी याचना करते हुए उस मार्गपर जाते हैं। जिन्होंने पहलेसे ही दानरूपी पाथेय (राहरखर्च) ले रखा है, वे सुखपूर्वक यमलोककी यात्रा करते हैं। इस रीतिसे कष्ट उठाकर पापी जीव जब प्रेतपुरीमें पहुँच जाते हैं, तब उनके विषयमें यमराजको सूचना दी जाती है। उनकी आज्ञा पाकर दूत उन पापियोंको यमराजके आगे ले जाकर खड़े करते हैं। वहाँ जो शुभ कर्म करनेवाले लोग होते हैं, उनको यमराज स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य और अर्घ्य निवेदन करके प्रिय बर्तावके द्वारा सम्मानित करते हैं और कहते हैं—'वेदोक्त कर्म करनेवाले महात्माओ! आपलोग धन्य हैं, जिन्होंने दिव्य सुखकी प्राप्तिके लिये पुण्यकर्म किया है। अतः आपलोग दिव्यांगनाओंके भोगसे भूषित तथा सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंसे सम्पन्न निर्मल स्वर्गलोकमें जाइये। वहाँ महान् भोगोंका उपभोग करके अन्तमें पुण्यके क्षीण हो जानेपर जो कुछ थोड़ा-सा अशुभ शेष रह जाय; उसे फिर यहाँ आकर भोगियेगा।' जो धर्मात्मा मनुष्य होते हैं, वे मानो यमराजके लिये मित्रके समान हैं। वे यमराजको सुखपूर्वक सौम्य धर्मराजके रूपमें देखते हैं।

किंतु जो क्रूर कर्म करनेवाले हैं, वे यमराजको भयानक रूपमें देखते हैं। उनकी दृष्टिमें यमराजका मुख दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता है। नेत्र टेढ़ी भौंहोंसे युक्त प्रतीत होते हैं। उनके केश ऊपरको उठे होते हैं। दाढ़ी-मूँछ बड़ी-बड़ी होती है। ओठ ऊपरकी ओर फड़कते रहते हैं। उनके अठारह भुजाएँ होती हैं, वे कुपित तथा काले कोयलोंके ढेर-से दिखायी देते हैं। उनके हाथोंमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उठे होते हैं।