शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
वे सब प्रकारके दण्डका भय दिखाकर उन पापियोंको डाँटते रहते हैं। बहुत बड़े भैंसेपर आरूढ़, लाल वस्त्र और लाल माला धारण करके बहुत ऊँचे महामेरुके समान दृष्टिगोचर होते हैं। उनके नेत्र प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त दिखायी देते हैं। उनका शब्द प्रलयकालके मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर होता है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो महासागरको पी रहे हैं, गिरिराजको निगल रहे हैं और मुँहसे आग उगल रहे हैं।
उनके समीप प्रलयकालकी अग्निके समान प्रभाववाले मृत्यु देवता खड़े रहते हैं। काजलके समान काले कालदेवता और भयानक कृतान्त देवता भी रहते हैं। इनके सिवा मारी, उग्र महामारी, भयंकर कालरात्रि, अनेक प्रकारके रोग तथा भाँति-भाँतिके भयावह कुष्ठ मूर्तिमान् हो हाथोंमें शक्ति, शूल, अंकुश, पाश, चक्र और खड्ग लिये खड़े रहते हैं।
वज्रतुल्य मुख धारण करनेवाले रुद्रगण क्षुर, तरकश और धनुष धारण किये वहाँ उपस्थित होते हैं। सभी नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले; महान् वीर एवं भयंकर हैं। इनके अतिरिक्त असंख्य महावीर यमदूत, जिनकी अंगकान्ति काले कोयलेके समान काली होती है, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र लिये बड़े भयंकर जान पड़ते हैं। ऐसे परिवारसे घिरे हुए घोर यमराज तथा भीषण चित्रगुप्तको पापिष्ठप्राणी देखते हैं। यमराज उन पापकर्मियोंको बहुत डाँटते हैं और भगवान् चित्रगुप्त धर्मयुक्त वचनोंद्वारा उन्हें समझाते हैं। (अध्याय ७)
नरकोंकी अट्ठाईस कोटियों तथा प्रत्येकके पाँच-पाँच नायकके क्रमसे एक सौ चालीस रौरवादि नरकोंकी नामावली
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! तदनन्तर यमदूत पापियोंको अत्यन्त तपे हुए पत्थरपर बड़े वेगसे दे मारते हैं, मानो वज्रसे बड़े-बड़े वृक्षोंको धराशायी कर दिया गया हो। उस समय शरीरसे जर्जर हुआ देहधारी जीव कानसे खून बहाने लगता है और सुध-बुध खोकर निश्चेष्ट हो जाता है। तब वायुका स्पर्श कराकर वे यमदूत फिर उसे जीवित कर देते हैं और उसके पापोंकी शुद्धिके लिये उसे नरक-समुद्रमें डाल देते हैं। पृथ्वीके नीचे नरककी सात कोटियाँ हैं, जो सातवें तलके अन्तमें घोर अन्धकारके भीतर स्थित हैं। उन सबकी अट्ठाईस कोटियाँ हैं। पहली कोटि घोरा कही गयी है। दूसरी सुघोरा है, जो उसके नीचे स्थित है। तीसरी अतिघोरा, चौथी महाघोरा, पाँचवीं घोररूपा, छठी तलातला, सातवीं भयानका, आठवीं कालरात्रि, नवीं भयोत्कटा, उसके नीचे दसवीं चण्डा, उसके भी नीचे महाचण्डा, फिर चण्ड-कोलाहला तथा उससे भिन्न प्रचण्डा है, जो चण्डोंकी नायिका कही गयी है; उसके बाद पद्मा, पद्मावती, भीता और भीमा है, जो भीषण नरकोंकी नायिका मानी गयी है। अठारहवीं कराला, उन्नीसवीं विकराला और बीसवीं नरककोटि वज्रा कही गयी है। तदनन्तर त्रिकोणा, पंचकोणा, सुदीर्घा, अखिलार्तिदा, समा, भीमबला, भीमा तथा अट्ठाईसवीं दीप्तप्राया