शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 605, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता *
५९१
वह घोड़ेकी पीठपर बैठकर यात्रा करता है।
व्यासजी! जो पाद्य, अभ्यंग (अंगराग), दीपक, अन्न और घर दान करता है, उसके पास यमराज कभी नहीं जाते। सुवर्ण और रत्नका दान करनेसे मनुष्य दुर्गम संकटों और स्थानोंको लाँघता हुआ जाता है। चाँदी, गाड़ी ढोनेवाले बैल और फूलोंकी माला दान करनेसे दाता सुखपूर्वक यमलोकमें जाता है। इस तरहके दानोंसे मनुष्य सुखपूर्वक यमलोककी यात्रा करते हैं और स्वर्गमें सदा भाँति-भाँतिके भोग पाते हैं। सब दानोंमें अन्नदानको ही उत्तम बताया गया है; क्योंकि यह तत्काल तृप्ति प्रदान करनेवाला, मनको प्रिय लगनेवाला तथा बल और बुद्धिको बढ़ानेवाला है। मुनिश्रेष्ठ! अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्नके अभावमें मर जाते हैं। अतएव अन्नदानसे महान् पुण्य बताया गया है; क्योंकि अन्नके बिना भूखकी आगसे तप्त हुए समस्त प्राणी मर जाते हैं। अतः अन्नकी ही सब लोग प्रशंसा करते हैं; क्योंकि अन्नमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। अन्नके समान दान न तो हुआ है और न होगा। मुने ! यह सम्पूर्ण जगत् अन्नसे ही धारण किया जाता है। लोकमें अन्नको बलकारक बताया गया है; क्योंकि अन्नमें ही प्राण प्रतिष्ठित हैं।*
प्राप्त हुए अन्नकी कभी निन्दा न करे और न किसी तरह उसे फेंके ही। कुत्ते और चाण्डालके लिये भी किया हुआ अन्नदान कभी नष्ट नहीं होता। जो मनुष्य थके-माँदे और अपरिचित पथिकको अन्न देता है और देते समय कष्टका अनुभव नहीं करता, वह समृद्धिका भागी होता है। महामुने! जो देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियोंको अन्नसे तृप्त करता है, उसे महान् पुण्य-फलकी प्राप्ति होती है। अन्न और जलका दान शूद्र और ब्राह्मणके लिये भी समानरूपसे महत्त्व रखता है। अन्नकी इच्छावाले पुरुषसे उसका गोत्र, शाखा, स्वाध्याय और देश नहीं पूछना चाहिये।
अन्न साक्षात् ब्रह्मा है, अन्न साक्षात् विष्णु और शिव है। इसलिये अन्नके समान दान न हुआ है और न होगा! जो पहले बड़ा भारी पाप करके भी पीछे अन्नका दान करनेवाला हो जाता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है। अन्न, जल, घोड़ा, गौ, वस्त्र, शय्या, छत्र और आसन—इन आठ वस्तुओंके दान यमलोकके लिये उत्तम माने गये हैं। इस प्रकार दान-विशेषसे मनुष्य विमानपर बैठकर धर्मराजके नगरमें जाता है; इसलिये सबको दान करना
* सर्वेषामेव दानानामन्नदानं परं स्मृतम्। सद्यः प्रीतिकरं हृद्यं बलबुद्धिविवर्धनम्॥
नान्नदानसमं दानं विद्यते मुनिसत्तम। अन्नाद्भवन्ति भूतानि तदभावे म्रियन्ति च॥
अतएव महत्पुण्यमन्नदाने प्रकीर्तितम्। तथा क्षुधाग्निना तप्ता म्रियन्ते सर्वदेहिनः॥
अन्नमेव प्रशंसन्ति सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम्। अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति॥
अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं मुने। अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणा ह्यन्ने प्रतिष्ठिताः॥
(शि० पु० उ० सं० ११। १७-१८, २४, २९-३०)