भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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५९२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

चाहिये। महामुने ! जो इस प्रसंगको सुनता अथवा श्राद्धमें ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसके पितरोंको अक्षय अन्नदान प्राप्त होता है। (अध्याय ११)

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जलदान, जलाशय-निर्माण, वृक्षारोपण, सत्यभाषण और तपकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! जलदान सबसे श्रेष्ठ है। वह सब दानोंमें सदा उत्तम है; क्योंकि जल सभी जीवसमुदायको तृप्त करनेवाला जीवन कहा गया है।$^१$ इसलिये बड़े स्नेहके साथ अनिवार्यरूपसे प्रपादान (पौंसला चलाकर दूसरोंको पानी पिलानेका प्रबन्ध) करना चाहिये। जलाशयका निर्माण इस लोक और परलोकमें भी महान् आनन्दकी प्राप्ति करानेवाला होता है—यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह कुआँ, बावड़ी और तालाब बनवाये। कुएँमें जब पानी निकल आता है, तब वह पापी पुरुषके पापकर्मका आधा भाग हर लेता है तथा सत्कर्ममें लगे हुए मनुष्यके सदा समस्त पापोंको हर लेता है। जिसके खुदवाये हुए जलाशयमें गौ, ब्राह्मण तथा साधुपुरुष सदा पानी पीते हैं, वह अपने सारे वंशका उद्धार कर देता है। जिसके जलाशयमें गरमीके मौसममें भी अनिवार्यरूपसे पानी टिका रहता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकटको नहीं प्राप्त होता। जिसके पोखरेमें केवल वर्षा-ऋतुमें जल ठहरता है, उसे प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेका फल मिलता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। जिसके तड़ागमें शरत्कालतक जल ठहरता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है—इसमें संशय नहीं है। जिसके तालाबमें हेमन्त और शिशिर-ऋतुतक पानी मौजूद रहता है, वह बहुत-सी सुवर्ण-मुद्राओंकी दक्षिणासे युक्त यज्ञका फल पाता है। जिसके सरोवरमें वसन्त और ग्रीष्मकालतक पानी बना रहता है, उसे अतिरात्र और अश्वमेधयज्ञोंका फल मिलता है—ऐसा मनीषी महात्माओंका कथन है।

मुनिवर व्यास ! जीवोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले जलाशयके उत्तम फलका वर्णन किया गया। अब वृक्ष लगानेमें जो गुण हैं, उनका वर्णन सुनो। जो वीरान एवं दुर्गम स्थानोंमें वृक्ष लगाता है, वह अपनी बीती तथा आनेवाली सम्पूर्ण पीढ़ियोंको तार देता है। इसलिये वृक्ष अवश्य लगाना चाहिये$^२$। ये वृक्ष लगानेवालेके पुत्र होते हैं, इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर अक्षय लोकोंको पाता है। पोखरा खुदानेवाला, वृक्ष लगानेवाला और यज्ञ करानेवाला जो द्विज है, वह तथा दूसरे-दूसरे सत्यवादी पुरुष—ये स्वर्गसे


१-पानीयदानं परमं दानानामुत्तमं तदा। सर्वेषां जीवपुञ्जानां तर्पणं जीवनं स्मृतम्॥
(शि० पु० उ० सं० १२।१)
२-अतीतानागतान् सर्वान् पितृवंशांस्तु तारयेत्। कान्तारे वृक्षरोपी यस्तस्माद् वृक्षांस्तु रोपयेत्॥
(शि० पु० उ० सं० १२।१७)