भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 607

* उमासंहिता * ५९३

कभी नीचे नहीं गिरते।

सत्य ही परब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही श्रेष्ठ यज्ञ है और सत्य ही उत्कृष्ट शास्त्रज्ञान है। सोये हुए पुरुषोंमें सत्य ही जागता है, सत्य ही परमपद है, सत्यसे ही पृथ्वी टिकी हुई है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। तप, यज्ञ, पुण्य, देवता, ऋषि और पितरोंका पूजन, जल और विद्या—ये सब सत्यपर ही अवलम्बित हैं। सबका आधार सत्य ही है। सत्य ही यज्ञ, तप, दान, मन्त्र, सरस्वतीदेवी तथा ब्रह्मचर्य है। ओंकार भी सत्यरूप ही है। सत्यसे ही वायु चलती है, सत्यसे ही सूर्य तपता है, सत्यसे ही आग जलाती है और सत्यसे ही स्वर्ग टिका हुआ है। लोकमें सम्पूर्ण वेदोंका पालन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंका स्नान केवल सत्यसे सुलभ हो जाता है। सत्यसे सब कुछ प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। एक सहस्र अश्वमेध और लाखों यज्ञ एक ओर तराजूपर रखे जायँ और दूसरी ओर सत्य हो तो सत्यका ही पलड़ा भारी होगा। देवता, पितर, मनुष्य, नाग, राक्षस तथा चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोक सत्यसे ही प्रसन्न होते हैं। सत्यको परम धर्म कहा गया है। सत्यको ही परमपद बताया गया है और सत्यको ही परब्रह्म परमात्मा कहते हैं। इसलिये सदा सत्य बोलना चाहिये।* सत्यपरायण मुनि अत्यन्त दुष्कर तप करके स्वर्गको प्राप्त हुए हैं तथा सत्यधर्ममें अनुरक्त रहनेवाले सिद्ध पुरुष भी सत्यसे ही स्वर्गके निवासी हुए हैं। अतः सदा सत्य बोलना चाहिये। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। सत्यरूपी तीर्थ अगाध, विशाल, सिद्ध एवं पवित्र जलाशय है। उसमें योगयुक्त होकर मनके द्वारा स्नान करना चाहिये। सत्यको परमपद कहा गया है। जो मनुष्य अपने लिये, दूसरेके लिये अथवा अपने बेटेके लिये भी झूठ नहीं बोलते वे ही स्वर्गगामी होते हैं। वेद, यज्ञ तथा मन्त्र—ये ब्राह्मणोंमें सदा निवास करते हैं; परंतु असत्यवादी ब्राह्मणोंमें इनकी प्रतीति नहीं होती। अतः सदा सत्य बोलना चाहिये।

तदनन्तर तपकी बड़ी भारी महिमा बताते हुए सनत्कुमारजीने कहा—मुने! संसारमें ऐसा कोई सुख नहीं है जो तपस्याके बिना सुलभ होता हो। तपसे ही सारा सुख मिलता


* सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः। सत्यमेव परो यज्ञः सत्यमेव परं श्रुतम्॥
सत्यं सुप्तेषु जागर्ति सत्यं च परमं पदम्। सत्येनैव धृता पृथ्वी सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
तपो यज्ञश्च पुण्यं च देवर्षिपितृपूजने। आपो विद्या च ते सर्वे सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्यं यज्ञस्तपो दानं मन्त्रा देवी सरस्वती। ब्रह्मचर्यं तथा सत्यमोंकारः सत्यमेव च॥
सत्येन वायुरभ्येति सत्येन तपते रविः। सत्येनाग्निर्दहति स्वर्गः सत्येन तिष्ठति॥
पालनं सर्ववेदानां सर्वतीर्थावगाहनम्। सत्येन वहते लोके सर्वमाप्नोत्यसंशयम्॥
अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम्। लक्षाणि क्रतवश्चैव सत्यमेव विशिष्यते॥
सत्येन देवाः पितरो मानवोरगराक्षसाः। प्रीयन्ते सत्यतः सर्वे लोकाश्च सचराचराः॥
सत्यमाहुः परं धर्मं सत्यमाहुः परं पदम्। सत्यमाहुः परं ब्रह्म तस्मात्सत्यं सदा वदेत्॥
(शि० पु० उ० सं० १२। २३—३१)