शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 608, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें५९४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
है, इस बातको वेदवेत्ता पुरुष जानते हैं। ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, सुन्दर रूप, सौभाग्य तथा शाश्वत सुख तपसे ही प्राप्त होते हैं। तपस्यासे ही ब्रह्मा बिना परिश्रमके ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करते हैं। तपस्यासे ही विष्णु इसका पालन करते हैं। तपस्याके बलसे ही रुद्रदेव संहार करते हैं तथा तपके प्रभावसे ही शेष अशेष भूमण्डलको धारण करते हैं।
(अध्याय १२)
वेद और पुराणोंके स्वाध्याय तथा विविध प्रकारके दानकी महिमा, नरकोंका वर्णन तथा उनमें गिरानेवाले पापोंका दिग्दर्शन, पापोंके लिये सर्वोत्तम प्रायश्चित्त शिवस्मरण तथा ज्ञानके महत्त्वका प्रतिपादन
सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! जो वनमें जंगली फल-मूल खाकर तप करता है और जो वेदकी एक ऋचाका स्वाध्याय करता है, इन दोनोंका फल समान है। श्रेष्ठ द्विज वेदाध्ययनसे जिस पुण्यको पाता है, उससे दूना फल वह उस वेदको पढ़ानेसे पाता है। मुने ! जैसे चन्द्रमा और सूर्यके बिना जगत्में अन्धकार छा जाता है, उसी प्रकार पुराणके बिना ज्ञानका आलोक नहीं रह जाता है—अज्ञानका अन्धकार छाया रहता है। इसलिये सदा पुराणका अध्ययन करना चाहिये। अज्ञानके कारण नरकमें पड़कर सदा संतप्त होनेवाले लोकको जो शास्त्रका ज्ञान देकर समझाता है, वह पुराणवक्ता अपनी इसी महत्ताके कारण सदा पूजनीय है। जो साधु पुरुष पुराणवक्ता विद्वान्को दानका पात्र समझकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे उत्तमोत्तम वस्तुएँ देता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो सुपात्र ब्राह्मणको भूमि, गौ, रथ, हाथी और सुन्दर घोड़े देता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। वह इस जन्ममें और परलोकमें भी सम्पूर्ण अक्षय मनोरथोंको पा लेता है तथा अश्वमेधयज्ञके फलका भी भागी होता है।
मुनीश्वर ! जो पुरुष भगवान् शिवकी कथा सुनता है, वह कर्मोंके विशाल वनको जलाकर संसारसे तर जाता है। जो दो घड़ी, एक घड़ी अथवा एक क्षण भी भक्तिभावसे भगवान् शिवकी कथा सुनते हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती। मुने ! सम्पूर्ण दानों अथवा सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो पुण्य होता है, वही फल शिवपुराण सुननेसे अविचलरूपमें प्राप्त हो जाता है। व्यासजी! विशेषतः कलियुगमें पुराणश्रवणके सिवा मनुष्योंके लिये दूसरा कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है। वही उनके लिये मोक्ष एवं ध्यानरूपी फल देनेवाला बताया गया है। शिवपुराणका श्रवण और शिव-नामका कीर्तन मनुष्योंके लिये कल्पवृक्षका रमणीय फल है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, दान, तप और तीर्थसेवन-से जो फल मिलता है, उसीको मनुष्य पुराणोंके श्रवणमात्रसे पा लेता है।
प्रतिदिन सुपात्र लोगोंको बड़े-बड़े दान देने चाहिये, वे दान दाताके उद्धारक होते हैं। विप्रवर! सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान—ये पवित्र दान हैं, जो दाताको