शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ५९५
तो तारते ही हैं, लेनेवालोंका भी उद्धार कर देते हैं। सुवर्णदान, गोदान और पृथ्वीदान—इन श्रेष्ठ दानोंको करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तुलादानकी बड़ी प्रशंसा की गयी है, गौ और पृथ्वीके दान भी प्रशस्त एवं समान शक्तिवाले हैं। परंतु सरस्वतीका दान इन सबसे अधिक उत्तम है। नित्य दुही जानेवाली गाय, छाता, वस्त्र, जूता तथा अन्न और जल—ये सब वस्तुएँ याचकोंको देनी चाहिये। ब्राह्मणोंको तथा अपीडित याचकोंको जो संकल्पपूर्वक धनादि वस्तुओंका दान किया जाता है, उससे दाता मनस्वी होता है। लोकमें जो-जो अत्यन्त अभीष्ट और प्रिय है, वह यदि घरमें हो तो उसे अक्षय बनानेकी इच्छावाले पुरुषको गुणवान् पुरुषको दान करना चाहिये। तुला-पुरुषका दान सब दानोंमें उत्तम है। जो अपने लिये कल्याण चाहे, उसे तराजूपर बैठना और अपने शरीरसे तौली गयी वस्तुका दान करना चाहिये। दिनमें, रातमें, दोनों संध्याओंके समय, दोपहरमें, आधी रातके समय तथा भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंमें मन, वाणी और शरीरद्वारा किये गये सारे पापोंको तुला-पुरुषका दान दूर कर देता है।
इसके बाद ब्रह्माण्डदानका माहात्म्य एवं ब्रह्माण्डका वर्णन करके सनत्कुमारजीने कहा—मुनिवरोंमें श्रेष्ठ व्यास ! पाताललोकसे ऊपर जो नरक हैं, उनका वर्णन मुझसे सुनो; पापी पुरुष उन्हींमें यातनाएँ भोगते हैं। रौरव, शूकर, रोध, ताल, विवसन या विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विलोहित, पीब बहानेवाली वैतरणी, कृमि या कृमीश, कृमिभोजन, कृष्ण, असिपत्रवन, दारुण लालाभक्ष, पूयवह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कालसूत्र, तमस, अवीचि, रोधन, श्वभोजन, अप्रतिष्ठ, महारौरव और शाल्मलि इत्यादि बहुत-से दुःखदायक नरक वहाँ हैं। व्यासजी! उनमें जो पापकर्म-परायण पुरुष पकाये जाते हैं, उनका क्रमशः वर्णन करता हूँ; सावधान होकर सुनो। जो मनुष्य ब्राह्मणों, देवताओं तथा गौओंके लिये हितकर कार्योंके सिवा अन्य किसी कार्यके लिये झूठी गवाही देता है अथवा सदा झूठ बोलता है, वह रौरव नरकमें जाता है।
जो भ्रूण (गर्भस्थ शिशु)-की हत्या और सुवर्णकी चोरी करनेवाला, गायको कटघरेमें बंद करनेवाला, विश्वासघाती, शराबी, ब्रह्महत्यारा, दूसरोंके द्रव्यका अपहरण करनेवाला तथा इन सबका संगी है, वह मरनेपर तप्तकुम्भ नामक नरकमें जाता है। गुरुके वधसे भी इसी नरककी प्राप्ति होती है। बहिन, माता, गौ तथा पुत्रीका वध करनेसे भी तप्तकुम्भमें ही गिरना पड़ता है। साध्वी स्त्रीको बेचनेवाला, अधिक व्याज लेनेवाला, केश-विक्रय करनेवाला तथा अपने भक्तको त्यागनेवाला—ये सब पापी तप्तलोह नामक नरकमें पकाये जाते हैं। जो नराधम गुरुजनोंका अपमान करनेवाला तथा उनके प्रति दुर्वचन बोलनेवाला है और जो वेदकी निन्दा करनेवाला, वेद बेचनेवाला तथा अगम्या स्त्रीसे सम्भोग करनेवाला है, वे सब-के-सब लवण नामक नरकमें जाते हैं। चोर विलोहित नामक नरकमें गिरता है। मर्यादाको दूषित करनेवाले पुरुषकी भी ऐसी