शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ही गति होती है। जो पुरुष देवता, ब्राह्मण और पितृगणसे द्वेष करनेवाला है तथा जो रत्नको दूषित (उसमें मिलावट) करता है, वह कृमिभक्ष नामक नरकमें पड़ता है। जो दूषित यज्ञ (दूसरोंको हानि पहुँचानेके लिये आभिचारिक प्रयोग या हिंसाप्रधान तामस यज्ञ) करता है, वह कृमीश नामक नरकमें पड़ता है। जो नराधम पितृगण, देवगण और अतिथियोंको छोड़कर (बलिवैश्वदेवके द्वारा देवता आदिका भाग उन्हें अर्पण किये बिना ही) भोजन कर लेता है, वह उग्र लालाभक्ष नरकमें गिरता है। जो शस्त्र-समूहोंका निर्माण करता है, वह भी उसीमें जाता है। जो द्विज अन्त्यजसे सेवा लेता है, असत् दान ग्रहण करता है, यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ कराता है और अभक्ष्य-भक्षण करता है, ये सब-के-सब रुधिरौघ (पूयवह) नामक नरकमें गिरते हैं। जो सोमरसको बेचनेवाले हैं, उनकी भी यही गति होती है। यज्ञ और ग्रामको नष्ट करनेवाला घोर वैतरणी नदीमें पड़ता है।
जो नयी जवानीसे मतवाले हो धर्मकी मर्यादाको तोड़ते हैं, अपवित्र आचार-विचारसे रहते हैं और छल-कपटसे जीविका चलाते हैं, वे कृत्य नामक नरकमें जाते हैं। जो अकारण ही वृक्षोंको काटता है, वह असि-पत्रवन नामक नरकमें जाता है। भेड़ोंको बेचकर जीविका चलानेवाले तथा पशुओंकी हिंसा करनेवाले कसाई वह्निज्वाल नामक नरकमें गिरते हैं। भ्रष्टाचारी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा जो कच्चे खपड़ों अथवा ईंट आदिको पकानेके लिये पजावेमें आग देता है, वे सब उसी वह्निज्वाल नरकमें गिरते हैं। जो व्रतोंका लोप करनेवाले तथा अपने आश्रमसे गिरे हुए हैं, वे दोनों ही प्रकारके पुरुष अत्यन्त दारुण संदंश नामक नरककी यातनामें पड़ते हैं। जो ब्रह्मचारी होकर भी स्वप्नमें वीर्यस्खलन करते हैं तथा जो पुत्रोंसे विद्या पढ़ते हैं, वे श्वभोजन नामक नरकमें गिरते हैं। इस तरह ये तथा और भी सैकड़ों, हजारों नरक हैं, जिनमें पापकर्मी प्राणी यातनाओंकी आगमें डालकर पकाये जाते हैं। इन उपर्युक्त पापोंके समान और भी सहस्रों पापकर्म हैं, जिन्हें नरकोंमें पड़कर मनुष्य भोगा करते हैं। जो लोग मन, वाणी और क्रियाद्वारा अपने वर्ण और आश्रमके विरुद्ध कर्म करते हैं, वे नरकमें गिरते हैं। नरकमें सिर नीचे करके लटकाये गये प्राणी स्वर्गलोकमें रहनेवाले देवताओंको देखा करते हैं और देवतालोग भी नीचे दृष्टि डालनेपर उन सभी अधोमुख नारकी जीवोंको देखते हैं। पापीलोग नरक-भोगके अनन्तर क्रमशः उन्नति करते हुए स्थावर, कृमि, जलचर, पक्षी, पशु, मनुष्य, धर्मात्मा मानव-देवता तथा मुमुक्षु होते और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। जितने जीव स्वर्गमें हैं, उतने ही नरकमें हैं। जो पापी पुरुष अपने पापका प्रायश्चित्त नहीं करता वही नरकमें जाता है।
कालीन्न्दन! स्वायम्भुव मनुने महान् पापोंके लिये महान् और लघु पापोंके लिये लघु प्रायश्चित्त बताये हैं। उन अशेष पापकर्मोंके लिये जो-जो प्रायश्चित्त-सम्बन्धी कर्म बताये गये हैं, उन सबमें भगवान् शंकरका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ प्रायश्चित्त है। जिस पुरुषके चित्तमें पापकर्म करनेके अनन्तर पश्चात्ताप होता है, उसके लिये तो