भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

* उमासंहिता * ५९९

कालको जीतनेका उपाय, नवधा शब्दब्रह्म एवं तुंकारके अनुसंधान और उससे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन

देवी पार्वती ने कहा—प्रभो! कालसे आकाशका भी नाश होता है। वह भयंकर काल बड़ा विकराल है। वह स्वर्गका भी एकमात्र स्वामी है। आपने उसे दग्ध कर दिया था, परंतु अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा जब उसने आपकी स्तुति की, तब आप फिर संतुष्ट हो गये और वह काल पुनः अपनी प्रकृतिको प्राप्त हुआ—पूर्णतः स्वस्थ हो गया। आपने उससे बातचीतमें कहा—'काल! तुम सर्वत्र विचरोगे, किन्तु लोग तुम्हें देख नहीं सकेंगे।' आप प्रभुकी कृपादृष्टि होने और वर मिलनेसे वह काल जी उठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया। अतः महेश्वर! क्या यहाँ ऐसा कोई साधन है, जिससे उस कालको नष्ट किया जा सके? यदि हो तो मुझे बताइये; क्योंकि आप योगियोंमें शिरोमणि और स्वतन्त्र प्रभु हैं। आप परोपकारके लिये ही शरीर धारण करते हैं।

शिव बोले—देवि! श्रेष्ठ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, नाग और मनुष्य—किसीके द्वारा भी कालका नाश नहीं किया जा सकता; परंतु जो ध्यानपरायण योगी हैं, वे शरीरधारी होनेपर भी सुखपूर्वक कालको नष्ट कर देते हैं। वरारोहे! यह पांचभौतिक शरीर सदा उन भूतोंके गुणोंसे युक्त ही उत्पन्न होता है और उन्हींमें इसका लय होता है। मिट्टीकी देह मिट्टीमें ही मिल जाती है। आकाशसे वायु उत्पन्न होती है, वायुसे तेजस्तत्त्व प्रकट होता है, तेजसे जलका प्राकट्य बताया गया है और जलसे पृथ्‍वीका आविर्भाव होता है। पृथ्वी आदि भूत क्रमशः अपने कारणमें लीन होते हैं। पृथ्वीके पाँच, जलके चार, तेजके तीन और वायुके दो गुण होते हैं। आकाशका एकमात्र शब्द ही गुण है। पृथ्वी आदिमें जो गुण बताये गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। जब भूत अपने गुणको त्याग देता है, तब नष्ट हो जाता है और जब गुणको ग्रहण करता है, तब उसका प्रादुर्भाव हुआ बताया जाता है। देवेश्वरि! इस प्रकार तुम पाँचों भूतोंके यथार्थ स्वरूपको समझो। देवि! इस कारण कालको जीतनेकी इच्छावाले योगीको चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने कालमें उसके अंशभूत गुणोंका चिन्तन करे।

योगवेत्ता पुरुषको चाहिये कि सुखद आसनपर बैठकर विशुद्ध श्वास (प्राणायाम)-द्वारा योगाभ्यास करे। रातमें जब सब लोग सो जायें, उस समय दीपक बुझाकर अन्धकारमें योग धारण करे। तर्जनी अँगुलीसे दोनों कानोंको बंद करके दो घड़ीतक दबाये रखे। उस अवस्थामें अग्निप्रेरित शब्द सुनायी देता है। इससे संध्याके बादका खाया हुआ अन्न क्षणभरमें पच जाता है और सम्पूर्ण रोगों तथा ज्वर आदि बहुत-से उपद्रवोंका शीघ्र नाश कर देता है। जो साधक प्रतिदिन इसी प्रकार दो घड़ीतक शब्दब्रह्मका साक्षात्कार करता है, वह मृत्यु तथा कामको जीतकर इस जगत्में स्वच्छन्द विचरता है और सर्वज्ञ एवं समदर्शी