भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

६०० * संक्षिप्त शिवपुराण *

होकर सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है। जैसे आकाशमें वर्षासे युक्त बादल गरजता है, उसी प्रकार उस शब्दको सुनकर योगी तत्काल संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। तदनन्तर योगियोंद्वारा प्रतिदिन चिन्तन किया जाता हुआ वह शब्द क्रमशः सूक्ष्मसे सूक्ष्मतर हो जाता है। देवि! इस प्रकार मैंने तुम्हें शब्दब्रह्मके चिन्तनका क्रम बताया है। जैसे धान चाहनेवाला पुरुष पुआलको छोड़ देता है, उसी तरह मोक्षकी इच्छावाला योगी सारे बन्धनोंको त्याग देता है।

इस शब्दब्रह्मको पाकर भी जो दूसरी वस्तुकी अभिलाषा करते हैं, वे मुक्केसे आकाशको मारते और भूख-प्यासकी कामना करते हैं। यह शब्दब्रह्म ही सुखद, मोक्षका कारण, बाहर-भीतरके भेदसे रहित, अविनाशी और समस्त उपाधियोंसे रहित परब्रह्म है। इसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं। जो लोग कालपाशसे मोहित हो शब्दब्रह्मको नहीं जानते, वे पापी और कुबुद्धि मनुष्य मौतके फंदेमें फँसे रहते हैं। मनुष्य तभीतक संसारमें जन्म लेते हैं, जबतक सबके आश्रयभूत परमतत्त्व (परब्रह्म परमात्मा)-की प्राप्ति नहीं होती। परमतत्त्वका ज्ञान हो जानेपर मनुष्य जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। निद्रा और आलस्य साधनाका बहुत बड़ा विघ्न है। इस शत्रुको यत्नपूर्वक जीतकर सुखद आसनपर आसीन हो प्रतिदिन शब्दब्रह्मका अभ्यास करना चाहिये। सौ वर्षकी अवस्थावाला वृद्ध पुरुष आजीवन इसका अभ्यास करे तो उसका शरीररूपी स्तम्भ मृत्युको जीतनेवाला हो जाता है और उसे प्राणवायुकी शक्तिको बढ़ानेवाला आरोग्य प्राप्त होता है। वृद्ध पुरुषमें भी ब्रह्मके अभ्याससे होनेवाले लाभका विश्वास देखा जाता है, फिर तरुण मनुष्यको इस साधनासे पूर्ण लाभ हो इसके लिये तो कहना ही क्या है। यह शब्दब्रह्म न ओंकार है, न मन्त्र है, न बीज है, न अक्षर है। यह अनाहत नाद (बिना आघातके अथवा बिना बजाये ही प्रकट होनेवाला शब्द) है। इसका उच्चारण किये बिना ही चिन्तन होता है। यह शब्दब्रह्म परम कल्याणमय है। प्रिये! शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष यत्नपूर्वक निरन्तर इसका अनुसंधान करते हैं। अतः नौ प्रकारके शब्द बताये गये हैं, जिन्हें प्राणवेत्ता पुरुषोंने लक्षित किया है। मैं उन्हें प्रयत्न करके बता रहा हूँ। उन शब्दोंको नादसिद्धि भी कहते हैं। वे शब्द क्रमशः इस प्रकार हैं—

घोष, कांस्य (झाँझ आदि), शृंग (सिंगा आदि), घण्टा, वीणा आदि, बाँसुरी, दुन्दुभि, शंख और नवाँ मेघगर्जन—इन नौ प्रकारके शब्दोंको त्यागकर तुंकारका अभ्यास करे। इस प्रकार सदा ही ध्यान करनेवाला योगी पुण्य और पापोंसे लिप्त नहीं होता है। देवि! योगाभ्यासके द्वारा सुननेका प्रयत्न करनेपर भी जब योगी उन शब्दोंको नहीं सुनता और अभ्यास करते-करते मरणासन्न हो जाता है, तब भी वह दिन-रात उस अभ्यासमें ही लगा रहे। ऐसा करनेसे सात दिनोंमें वह शब्द प्रकट होता है, जो मृत्युको जीतनेवाला है। देवि! वह शब्द नौ प्रकारका है। उसका मैं यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ। पहले तो घोषात्मक नाद प्रकट होता है, जो आत्मशुद्धिका उत्कृष्ट साधन है। वह उत्तम नाद सब रोगोंको हर लेनेवाला तथा मनको