शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ६०१
वशीभूत करके अपनी ओर खींचनेवाला है। दूसरा कांस्य-नाद है, जो प्राणियोंकी गतिको स्तम्भित कर देता है। वह विष, भूत और ग्रह आदि सबको बाँधता है—इसमें संशय नहीं है। तीसरा शृंग-नाद है, जो अभिचारसे सम्बन्ध रखनेवाला है। उसका शत्रुके उच्चाटन और मारणमें नियोग एवं प्रयोग करे। चौथा घण्टा-नाद है; जिसका साक्षात् परमेश्वर शिव उच्चारण करते हैं। वह नाद सम्पूर्ण देवताओंको आकृष्ट कर लेता है, फिर भूतलके मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। यक्षों और गन्धर्वोंकी कन्याएँ उस नादसे आकृष्ट हो योगीको उसकी इच्छाके अनुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं तथा उसकी अन्य कामनाएँ भी पूर्ण करती हैं। पाँचवाँ नाद वीणा है, जिसे योगी पुरुष ही सदा सुनते हैं। देवि! उस वीणा-नादसे दूर-दर्शनकी शक्ति प्राप्त होती है। वंशीनादका ध्यान करनेवाले योगीको सम्पूर्ण तत्त्व प्राप्त हो जाता है। दुन्दुभिका चिन्तन करनेवाला साधक जरा और मृत्युके कष्टसे छूट जाता है। देवेश्वरि! शंखनादका अनुसंधान होनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है। मेघनादके चिन्तनसे योगीको कभी विपत्तिका सामना नहीं करना पड़ता। वरानने! जो प्रतिदिन एकाग्रचित्तसे ब्रह्मरूपी तुंकारका ध्यान करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता। उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और इच्छानुसार रूपधारी होकर सर्वत्र विचरण करता है, कभी विकारोंके वशीभूत नहीं होता। वह साक्षात् शिव ही है, इसमें संशय नहीं है। परमेश्वरि! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष शब्दब्रह्मके नवधा स्वरूपका पूर्णतया वर्णन किया है। अब और क्या सुनना चाहती हो?
(अध्याय २६)
काल या मृत्युको जीतकर अमरत्व प्राप्त करनेकी चार यौगिक साधनाएँ—
प्राणायाम, भ्रूमध्यमें अग्निका ध्यान, मुखसे वायुपान तथा मुड़ी हुई जिह्वाद्वारा गलेकी घाँटीका स्पर्श
पार्वती बोलीं—प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं तो योगी योगाकाशजनित वायुपदको जिस प्रकार प्राप्त होता है, वह सब मुझे बताइये।
भगवान् शिवने कहा—सुन्दरि! पहले मैंने योगियोंके हितकी कामनासे सब कुछ बताया है, जिसके अनुसार योगियोंने कालपर विजय प्राप्त की थी। योगी जिस प्रकार वायुका स्वरूप धारण करता है, उसके विषयमें भी कहा गया है। इसलिये योगशक्तिके द्वारा मृत्यु-दिवसको जानकर प्राणायाममें तत्पर हो जाय। ऐसा करनेपर आधे मासमें ही वह आये हुए कालको जीत लेता है। हृदयमें स्थित हुई प्राणवायु सदा अग्निको उद्दीप्त करनेवाली है। उसे अग्निका सहायक बताया गया है। यह वायु बाहर और भीतर सर्वत्र व्याप्त और महान् है। ज्ञान, विज्ञान और उत्साह—सबकी प्रवृत्ति वायुसे ही होती है। जिसने यहाँ वायुको जीत लिया, उसने इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय पा ली।
साधकको चाहिये कि वह जरा और मृत्युको जीतनेकी इच्छासे सदा धारणामें