भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 616

६०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्थित रहे; क्योंकि योगपरायण योगीको भलीभाँति धारणा और ध्यानमें तत्पर रहना चाहिये। जैसे लुहार मुखसे धौंकनीको फूँक-फूँककर उस वायुके द्वारा अपने सब कार्यको सिद्ध करता है, उसी प्रकार योगीको प्राणायामका अभ्यास करना चाहिये। प्राणायामके समय जिनका ध्यान किया जाता है, वे आराध्यदेव परमेश्वर सहस्रों मस्तक, नेत्र, पैर और हाथोंसे युक्त हैं तथा समस्त ग्रन्थियोंको आवृत करके उनसे भी दस अंगुल आगे स्थित हैं। आदिमें व्याहृति और अन्तमें शिरोमन्त्रसहित गायत्रीका तीन बार जप करे और प्राणवायुको रोके रहे। प्राणोंके इस आयामका नाम प्राणायाम है। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह जा-जाकर लौट आते हैं। परंतु प्राणायामपूर्वक ध्यानपरायण योगी जानेपर आजतक नहीं लौटे हैं (अर्थात् मुक्त हो गये हैं)। देवि! जो द्विज सौ वर्षोंतक तपस्या करके कुशोंके अग्रभागसे एक बूँद जल पीता है वह जिस फलको पाता है, वही ब्राह्मणोंको एकमात्र धारणा अथवा प्राणायामके द्वारा मिल जाता है। जो द्विज सबेरे उठकर एक प्राणायाम करता है, वह अपने सम्पूर्ण पापको शीघ्र ही नष्ट कर देता और ब्रह्मलोकको जाता है। जो आलस्यरहित हो सदा एकान्तमें प्राणायाम करता है, वह जरा और मृत्युको जीतकर वायुके समान गतिशील हो आकाशमें विचरता है। वह सिद्धोंके स्वरूप, कान्ति, मेधा, पराक्रम और शौर्यको प्राप्त कर लेता है। उसकी गति वायुके समान हो जाती है तथा उसे स्पृहणीय सौख्य एवं परम सुखकी प्राप्ति होती है।

देवेश्वरि! योगी जिस प्रकार वायुसे सिद्धि प्राप्त करता है, वह सब विधान मैंने बता दिया। अब तेजसे जिस तरह वह सिद्धि-लाभ करता है, उसे भी बता रहा हूँ। जहाँ दूसरे लोगोंकी बातचीतका कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शान्त—एकान्त स्थानमें अपने सुखद आसनपर बैठकर चन्द्रमा और सूर्य (वाम और दक्षिण नेत्र)-की कान्तिसे प्रकाशित मध्यवर्ती देश भ्रूमध्य-भागमें जो अग्निका तेज अव्यक्तरूपसे प्रकाशित होता है, उसे आलस्यरहित योगी दीपरहित अन्धकारपूर्ण स्थानमें चिन्तन करनेपर निश्चय ही देख सकता है—इसमें संशय नहीं है। योगी हाथकी अँगुुलियोंसे यत्नपूर्वक दोनों नेत्रोंको कुछ-कुछ दबाये रखे और उनके तारोंको देखता हुआ एकाग्रचित्तसे आधे मुहूर्त्ततक उन्हींका चिन्तन करे। तदनन्तर अन्धकारमें भी ध्यान करनेपर वह उस ईश्वरीय ज्योतिको देख सकता है। वह ज्योति सफेद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुषके समान रंगवाली होती है। भौंहोंके बीचमें ललाटवर्ती बालसूर्यके समान तेजवाले उन अग्निदेवका साक्षात्कार करके योगी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला हो जाता है तथा मनोवांछित शरीर धारण करके क्रीड़ा करता है। वह योगी कारण-तत्त्वको शान्त करके उसमें आविष्ट होना, दूसरेके शरीरमें प्रवेश करना, अणिमा आदि गुणोंको पा लेना, मनसे ही सब कुछ देखना, दूरकी बातोंको सुनना और जानना, अदृश्य हो जाना, बहुत-से रूप धारण कर लेना तथा आकाशमें विचरना इत्यादि सिद्धियोंको निरन्तर अभ्यासके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है। जो अन्धकारसे परे और सूर्यके समान तेजस्वी है, उसी इस