शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ६०३
महान् ज्योतिर्मय पुरुष (परमात्मा)-को मैं जानता हूँ। उन्हींको जानकर मनुष्य काल या मृत्युको लाँघ जाता है। मोक्षके लिये इसके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है।* देवि! इस प्रकार मैंने तुमसे तेजस्तत्त्वके चिन्तनकी उत्तम विधिका वर्णन किया है, जिससे योगी कालपर विजय पाकर अमरत्वको प्राप्त कर लेता है।
देवि! अब पुनः दूसरा श्रेष्ठ उपाय बताता हूँ, जिससे मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती।
देवि! ध्यान करनेवाले योगियोंकी चौथी गति (साधना) बतायी जाती है। योगी अपने चित्तको वशमें करके यथायोग्य स्थानमें सुखद आसनपर बैठे। वह शरीरको ऊँचा करके अंजलि बाँधकर चोंचकी-सी आकृतिवाले मुखके द्वारा धीरे-धीरे वायुका पान करे। ऐसा करनेसे क्षणभरमें तालुके भीतर स्थित जीवनदायी जलकी बूँदें टपकने लगती हैं। उन बूँदोंको वायुके द्वारा लेकर सूँघे। वह शीतल जल अमृतस्वरूप है। जो योगी उसे प्रतिदिन पीता है, वह कभी मृत्युके अधीन नहीं होता। उसे भूख-प्यास नहीं लगती। उसका शरीर दिव्य और तेज महान् हो जाता है। वह बलमें हाथी और वेगमें घोड़ेकी समानता करता है। उसकी दृष्टि गरुड़की समान तेज हो जाती है और उसे दूरकी भी बातें सुनायी देने लगती हैं। उसके केश काले-काले और घुँघराले हो जाते हैं तथा अंगकान्ति गन्धर्व एवं विद्याधरोंकी समानता करती है। वह मनुष्य देवताओंके वर्षसे सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तथा अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा बृहस्पतिके तुल्य हो जाता है। उसमें इच्छानुसार विचरनेकी शक्ति आ जाती है और वह सदा ही सुखी रहकर आकाशमें विचरणकी शक्ति प्राप्त कर लेता है।
वरानने! अब मृत्युपर विजय पानेकी पुनः दूसरी विधि बता रहा हूँ, जिसे देवताओंने भी प्रयत्नपूर्वक छिपा रखा है; तुम उसे सुनो। योगी पुरुष अपनी जिह्वाको मोड़कर तालुमें लगानेका प्रयत्न करे। कुछ कालतक ऐसा करनेसे वह क्रमशः लम्बी होकर गलेकी घाँटीतक पहुँच जाती है। तदनन्तर जब जिह्वासे गलेकी घाँटी सटती है, तब शीतल सुधाका स्राव करती है। उस सुधाको जो योगी सदा पीता है, वह अमरत्वको प्राप्त होता है।
(अध्याय २७)
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भगवती उमाके कालिका-अवतारकी कथा—समाधि और सुरथके समक्ष मेधाका देवीकी कृपासे मधुकैटभके वधका प्रसंग सुनाना
इसके अनन्तर छाया पुरुष, सर्ग, कश्यपवंश, मन्वन्तर, मनुवंश, सत्यव्रतादि-वंश, पितृकल्प तथा व्यासोत्पत्ति आदिका वर्णन सुननेके पश्चात् मुनियोंने सूतजीसे कहा—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! हमने आपके मुखसे भगवान् शिवकी अनेक
* वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते प्रायणाय ॥
(शि० पु० उ० सं० २७। २५)