भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 618

६०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

इतिहासोंसे युक्त रमणीय कथा सुनी, जो उनके नानावतारोंसे सम्बन्ध रखती है तथा मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। अब हम आपसे जगज्जननी भगवती उमाका मनोहर चरित्र सुनना चाहते हैं। परब्रह्म परमात्मा महेश्वरकी जो आद्या सनातनी शक्ति हैं, वे उमा नामसे विख्यात हैं। वे ही त्रिलोकीको उत्पन्न करनेवाली पराशक्ति हैं। महामते! दक्षकन्या सती और हिमवान्‌की पुत्री पार्वती—ये उमाके दो अवतार हमने सुने। सूतजी! अब उनके दूसरे अवतारोंका वर्णन कीजिये। लक्ष्मीजननी जगदम्बा उमाके गुणोंको सुननेसे कौन बुद्धिमान् पुरुष विरत हो सकता है। ज्ञानी पुरुष भी कभी उनके कथा-श्रवणके शुभ अवसरको नहीं छोड़ते।

सूतजीने कहा—महात्माओ! तुमलोग धन्य हो और सर्वदा कृतकृत्य हो; क्योंकि परा अम्बा उमाके महान् चरित्रके विषयमें पूछ रहे हो। जो इस कथाको सुनते, पूछते और बाँचते हैं, उनके चरणकमलोंकी धूलिको ही ऋषियोंने तीर्थ माना है। जिनका चित्त परम संवित्-स्वरूपा श्रीउमादेवीके चिन्तनमें लीन है, वे पुरुष धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, उनकी माता और कुल भी धन्य हैं। जो समस्त कारणोंकी भी कारणरूपा देवेश्वरी उमाकी स्तुति नहीं करते, वे मायाके गुणोंसे मोहित तथा भाग्यहीन हैं—इसमें संशय नहीं है। जो करुणारसकी सिन्धुस्वरूपा महादेवीका भजन नहीं करते, वे संसाररूपी घोर अन्धकूपमें पड़ते हैं। जो देवी उमाको छोड़कर दूसरे देवी-देवताओंकी शरण लेता है, वह मानो गंगाजीको छोड़कर प्यास बुझानेके लिये मरुस्थलके जलाशयके पास जाता है। जिनके स्मरणमात्रसे धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंकी अनायास प्राप्ति होती है, उन देवी उमाकी आराधना कौन श्रेष्ठ पुरुष छोड़ सकता है।

पूर्वकालमें महामना सुरथने महर्षि मेधासे यही बात पूछी थी। उस समय मेधाने जो उत्तर दिया, मैं वही बता रहा हूँ; तुमलोग सुनो। पहले स्वारोचिष मन्वन्तरमें विरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनके पुत्र सुरथ हुए, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे दाननिपुण, सत्यवादी, स्वधर्मकुशल, विद्वान्, देवीभक्त, दयासागर तथा प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करनेवाले थे। इन्द्रके समान तेजस्वी राजा सुरथके पृथ्वीपर शासन करते समय नौ ऐसे राजा हुए, जो उनके हाथसे भूमण्डलका राज्य छीन लेनेके प्रयत्नमें लगे थे। उन्होंने भूपाल सुरथकी राजधानी कोलापुरीको चारों ओरसे घेर लिया। उनके साथ राजाका बड़ा भयानक युद्ध हुआ। उनके शत्रुगण बड़े प्रबल थे। अतः युद्धमें भूपाल सुरथकी पराजय हुई। शत्रुओंने सारा राज्य अपने अधिकारमें करके सुरथको कोलापुरीसे निकाल दिया। राजा अपनी दूसरी पुरीमें आये और वहाँ मन्त्रियोंके साथ रहकर राज्य करने लगे। परंतु प्रबल विपक्षियोंने वहाँ भी आक्रमण करके उन्हें पराजित कर दिया। दैवयोगसे राजाके मन्त्री आदि गण भी उनके शत्रु बन बैठे और खजानेमें जो धन संचित था, वह सब उन विरोधी मन्त्री आदिने अपने हाथमें कर लिया।

तब राजा सुरथ शिकारके बहाने अकेले ही घोड़ेपर सवार हो नगरसे बाहर