शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ६०५
निकले और गहन वनमें चले गये। वहाँ इधर-उधर घूमते हुए राजाने एक श्रेष्ठ मुनिका आश्रम देखा, जो चारों ओर फूलोंके बगीचे लगे होनेसे बड़ी शोभा पा रहा था। वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँज रही थी। सब जीव-जन्तु शान्तभावसे रहते थे। मुनिके शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्योंने उस आश्रमको सब ओरसे घेर रखा था। महामते! विप्रवर मेधाके प्रभावसे उस आश्रममें महाबली व्याघ्र आदि अल्प शक्तिवाले गौ आदि पशुओंको पीड़ा नहीं देते थे। वहाँ जानेपर मुनीश्वर मेधाने मीठे वचन, भोजन और आसनद्वारा उन परम दयालु विद्वान् नरेशका आदरसत्कार किया।
एक दिन राजा सुरथ बहुत ही चिन्तित तथा मोहके वशीभूत होकर अनेक प्रकारसे विचार कर रहे थे। इतनेमें ही वहाँ एक वैश्य आ पहुँचा। राजाने उससे पूछा—'भैया! तुम कौन हो और किसलिये यहाँ आये हो? क्या कारण है कि दुःखी दिखायी दे रहे हो? यह मुझे बताओ।' राजाके मुखसे यह मधुर वचन सुनकर वैश्यप्रवर समाधिने दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए प्रेम और नम्रतापूर्ण वाणीमें इस प्रकार उत्तर दिया।
वैश्य बोला—राजन्! मैं वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है। मैं धनीके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। परंतु मेरे पुत्रों और स्त्री आदिने धनके लोभसे मुझे घरसे निकाल दिया है। अतः अपने प्रारब्धकर्मसे दुःखी हो मैं वनमें चला आया हूँ। करुणासागर प्रभो! यहाँ आकर मैं पुत्रों, पौत्रों, पत्नी, भाई-भतीजे तथा अन्य सुहृदोंका कुशल-समाचार नहीं जान पाता।
राजा बोले—जिन दुराचारी तथा धनके लोभी पुत्र आदिने तुम्हें निकाल दिया है, उन्हींके प्रति मूर्ख जीवकी भाँति तुम प्रेम क्यों करते हो?
वैश्यने कहा—राजन्! आपने उत्तम बात कही है। आपकी वाणी सारगर्भित है, तथापि स्नेहपाशसे बँधा हुआ मेरा मन अत्यन्त मोहको प्राप्त हो रहा है।
इस तरह मोहसे व्याकुल हुए वैश्य और राजा दोनों मुनिवर मेधाके पास गये। वैश्यसहित राजाने हाथ जोड़कर मुनिको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'भगवन्! आप हम दोनोंके मोहपाशको काट दीजिये। मुझे राज्यलक्ष्मीने छोड़ दिया और मैंने गहन वनकी शरण ली; तथापि राज्य छिन जानेके कारण मुझे संतोष नहीं है। और यह वैश्य है, जिसे स्त्री आदि स्वजनोंने घरसे निकाल दिया है; तथापि उनकी ओरसे इसकी ममता दूर नहीं हो रही