शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* उमासंहिता * ६०५
निकले और गहन वनमें चले गये। वहाँ इधर-उधर घूमते हुए राजाने एक श्रेष्ठ मुनिका आश्रम देखा, जो चारों ओर फूलोंके बगीचे लगे होनेसे बड़ी शोभा पा रहा था। वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँज रही थी। सब जीव-जन्तु शान्तभावसे रहते थे। मुनिके शिष्यों, प्रशिष्यों तथा उनके भी शिष्योंने उस आश्रमको सब ओरसे घेर रखा था। महामते! विप्रवर मेधाके प्रभावसे उस आश्रममें महाबली व्याघ्र आदि अल्प शक्तिवाले गौ आदि पशुओंको पीड़ा नहीं देते थे। वहाँ जानेपर मुनीश्वर मेधाने मीठे वचन, भोजन और आसनद्वारा उन परम दयालु विद्वान् नरेशका आदरसत्कार किया।
एक दिन राजा सुरथ बहुत ही चिन्तित तथा मोहके वशीभूत होकर अनेक प्रकारसे विचार कर रहे थे। इतनेमें ही वहाँ एक वैश्य आ पहुँचा। राजाने उससे पूछा—'भैया! तुम कौन हो और किसलिये यहाँ आये हो? क्या कारण है कि दुःखी दिखायी दे रहे हो? यह मुझे बताओ।' राजाके मुखसे यह मधुर वचन सुनकर वैश्यप्रवर समाधिने दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए प्रेम और नम्रतापूर्ण वाणीमें इस प्रकार उत्तर दिया।
वैश्य बोला—राजन्! मैं वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है। मैं धनीके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ। परंतु मेरे पुत्रों और स्त्री आदिने धनके लोभसे मुझे घरसे निकाल दिया है। अतः अपने प्रारब्धकर्मसे दुःखी हो मैं वनमें चला आया हूँ। करुणासागर प्रभो! यहाँ आकर मैं पुत्रों, पौत्रों, पत्नी, भाई-भतीजे तथा अन्य सुहृदोंका कुशल-समाचार नहीं जान पाता।
राजा बोले—जिन दुराचारी तथा धनके लोभी पुत्र आदिने तुम्हें निकाल दिया है, उन्हींके प्रति मूर्ख जीवकी भाँति तुम प्रेम क्यों करते हो?
वैश्यने कहा—राजन्! आपने उत्तम बात कही है। आपकी वाणी सारगर्भित है, तथापि स्नेहपाशसे बँधा हुआ मेरा मन अत्यन्त मोहको प्राप्त हो रहा है।
इस तरह मोहसे व्याकुल हुए वैश्य और राजा दोनों मुनिवर मेधाके पास गये। वैश्यसहित राजाने हाथ जोड़कर मुनिको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'भगवन्! आप हम दोनोंके मोहपाशको काट दीजिये। मुझे राज्यलक्ष्मीने छोड़ दिया और मैंने गहन वनकी शरण ली; तथापि राज्य छिन जानेके कारण मुझे संतोष नहीं है। और यह वैश्य है, जिसे स्त्री आदि स्वजनोंने घरसे निकाल दिया है; तथापि उनकी ओरसे इसकी ममता दूर नहीं हो रही
| ६०६ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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है। इसका क्या कारण है? बताइये। समझदार होनेपर भी हम दोनोंका मन मोहसे व्याकुल हो गया, यह तो बड़ी भारी मूर्खता है।
ऋषि बोले—राजन्! सनातन शक्ति-स्वरूपा जगदम्बा महामाया कही गयी हैं। वे ही सबके मनको खींचकर मोहमें डाल देती हैं। प्रभो! उनकी मायासे मोहित होनेके कारण ब्रह्मा आदि समस्त देवता भी परम तत्त्वको नहीं जान पाते, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? वे परमेश्वरी ही रज, सत्त्व और तम—इन तीनों गुणोंका आश्रय ले समयानुसार सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करती हैं। नृपश्रेष्ठ! जिसके ऊपर वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वरदायिनी जगदम्बा प्रसन्न होती हैं, वही मोहके घेरेको लाँघ पाता है।
राजाने पूछा—मुने! जो सबको मोहित करती हैं, वे देवी महामाया कौन हैं? और किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ है? यह कृपा करके मुझे बताइये।
ऋषि बोले—जब सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न था और योगेश्वर भगवान् केशव शेषकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले शयन कर रहे थे, उन्हीं दिनों भगवान् विष्णुके कानोंके मलसे दो असुर उत्पन्न हुए, जो भूतलपर मधु और कैटभके नामसे विख्यात हैं। वे दोनों विशालकाय घोर असुर प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी थे। उनके जबड़े बहुत बड़े थे। उनके मुख दाढ़ोंके कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण जगत्को खा जानेके लिये उद्यत हों। उन दोनोंने भगवान् विष्णुकी नाभिसे प्रकट हुए कमलके ऊपर विराजमान ब्रह्माको देखकर पूछा—'अरे, तू कौन है?' ऐसा कहते हुए वे उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हो गये।
* उमासंहिता * ६०७
ब्रह्माजीने देखा—ये दोनों दैत्य आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान् जनार्दन समुद्रके जलमें सो रहे हैं, तब उन्होंने परमेश्वरीका स्तवन किया और उनसे प्रार्थना की—‘अम्बिके! तुम इन दोनों दुर्जय असुरोंको मोहित करो और अजन्मा भगवान् नारायणको जगा दो।’
ऋषि कहते हैं—इस प्रकार मधु और कैटभके नाशके लिये ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या फाल्गुन शुक्ला द्वादशीको त्रैलोक्य-मोहिनी शक्तिके रूपमें प्रकट हो महाकालीके नामसे विख्यात हुईं। तदनन्तर आकाशवाणी हुई—‘कमलासन! डरो मत। आज युद्धमें मधु-कैटभको मारकर मैं तुम्हारे कण्टकका नाश करूँगी।’ यों कहकर वे महामाया श्रीहरिके नेत्र और मुख आदिसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके दृष्टिपथमें आ खड़ी हो गयीं। फिर तो देवाधिदेव हृषीकेश जनार्दन जाग उठे। उन्होंने अपने सामने दोनों दैत्य मधु और कैटभको देखा। उन दैत्योंके साथ अतुल तेजस्वी विष्णुका पाँच हजार वर्षोंतक बाहुयुद्ध हुआ। तब महामायाके प्रभावसे मोहित हुए उन श्रेष्ठ दानवोंने लक्ष्मीपतिसे कहा—‘तुम हमसे मनोवांछित वर ग्रहण करो।’
नारायण बोले—यदि तुमलोग प्रसन्न हो तो मेरे हाथसे मारे जाओ। यही मेरा वर है। इसे दो। मैं तुम दोनोंसे दूसरा वर नहीं माँगता।
ऋषि कहते हैं—उन असुरोंने देखा, सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबी हुई है; तब वे केशवसे बोले—‘हम दोनोंको ऐसी जगह मारो, जहाँ जलसे भीगी हुई धरती न हो।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् विष्णुने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघपर उनके मस्तक रखकर काट डाला। राजन्! यह कालिकाकी उत्पत्तिका प्रसंग कहा गया है। महामते! अब महालक्ष्मीके प्रादुर्भावकी कथा सुनो। देवी उमा निर्विकार और निराकार होकर भी देवताओंका दुःख दूर करनेके लिये युग-युगमें साकाररूप धारण करके प्रकट होती हैं। उनका शरीरग्रहण उनकी इच्छाका वैभव कहा गया है। वे लीलासे इसलिये प्रकट होती हैं कि भक्तजन उनके गुणोंका गान करते रहें।
(अध्याय २८—४५)
सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे देवीका महालक्ष्मीरूपमें अवतार और उनके द्वारा महिषासुरका वध
ऋषि कहते हैं—राजन्! रम्भ नामसे प्रसिद्ध एक असुर था, जो दैत्यवंशका शिरोमणि माना जाता था। उससे महातेजस्वी महिष नामक दानवका जन्म हुआ था। दानवराज महिष समस्त देवताओंको युद्धमें पराजित करके देवराज इन्द्रके सिंहासनपर जा बैठा और स्वर्गलोकमें रहकर त्रिलोकीका राज्य करने लगा। तब पराजित हुए देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजी भी उन सबको साथ ले उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शिव और विष्णु विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर सब
६०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
देवताओंने शिव और केशवको नमस्कार किया तथा अपना सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे ब्योरेवार कह सुनाया। वे बोले—'भगवन्! दुरात्मा महिषासुरने हम सबको समरांगणमें जीतकर स्वर्गलोकसे निकाल दिया है। इसलिये हम इस मर्त्यलोकमें भटक रहे हैं और कहीं भी हमें शान्ति नहीं मिल रही है। उस असुरने इन्द्र आदि देवताओंकी कौन-कौन-सी दुर्दशा नहीं की है। सूर्य, चन्द्रमा, वरुण, कुबेर, यम, इन्द्र, अग्नि, वायु, गन्धर्व, विद्याधर और चारण—इन सबके तथा अन्य लोगोंके भी जो कर्तव्यकर्म हैं, उन सबको वह पापात्मा असुर स्वयं ही करता है। उसने दैत्यपक्षको अभय-दान कर दिया है। इसलिये हम सब देवता आपकी शरणमें आये हैं। आप दोनों हमारी रक्षा करें और उस असुरके वधका उपाय शीघ्र ही सोचें; क्योंकि आप दोनों ऐसा करनेमें समर्थ हैं।'
देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् शिव और विष्णुने अत्यन्त क्रोध किया। रोषके मारे उनके नेत्र घूमने लगे। तब अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए भगवान् शिव और विष्णुके मुखसे तथा अन्य देवताओंके शरीरसे तेज प्रकट हुआ। तेजका वह महान् पुंज अत्यन्त प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें प्रकाशित हो उठा। दुर्गाजीके ध्यानमें लगे हुए सब देवताओंने उस तेजको प्रत्यक्ष देखा। सम्पूर्ण देवताओंके शरीरोंसे निकला हुआ वह अत्यन्त भीषण तेज एकत्र हो एक नारीके रूपमें परिणत हो गया। वह नारी साक्षात् महिषमर्दिनी देवी थीं। उनका प्रकाशमान मुख भगवान् शिवके तेजसे प्रकट हुआ था। भुजाएँ विष्णुके तेजसे उत्पन्न हुई थीं। केश यमराजके तेजसे आविर्भूत हुए थे। उनके दोनों स्तन चन्द्रमाके तेजसे प्रकट हुए थे। कटिभाग इन्द्रके तेजसे तथा जंघा और ऊरु वरुणके तेजसे पैदा हुए थे। पृथ्वीके तेजसे नितम्बका और ब्रह्माजीके तेजसे दोनों चरणोंका आविर्भाव हुआ था। पैरोंकी अँगुलियाँ सूर्यके तेजसे और हाथकी अँगुलियाँ वसुओंके तेजसे उत्पन्न हुई थीं। नासिका कुबेरके, दाँत प्रजापतिके, तीनों नेत्र अग्निके, दोनों भौंहें साध्यगणके, दोनों कान वायुके तथा अन्य देवताओंके तेजसे प्रकट हुए थे। इस प्रकार देवताओंके तेजसे प्रकट हुई कमलालया लक्ष्मी ही वह परमेश्वरी थीं। सम्पूर्ण देवताओंकी तेजोराशिसे प्रकट हुई उन देवीको देखकर सब देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। परंतु उनके पास कोई अस्त्र नहीं था। यह देख ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंने शिवा देवीको अस्त्र-शस्त्रसे सम्पन्न करनेका विचार किया। तब महेश्वरने महेश्वरीको शूल समर्पित किया। भगवान् विष्णुने चक्र, वरुणने पाश, अग्निदेवने शक्ति, वायु देवताने धनुष तथा बाणोंसे भरे दो तरकश और शचीपति इन्द्रने वज्र एवं घण्टा प्रदान किये। यमराजने कालदण्ड, प्रजापतिने अक्षमाला, ब्रह्माने कमण्डलु एवं सूर्यदेवने समस्त रोमकूपोंमें अपनी किरणें अर्पित कीं। कालने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी, क्षीरसागरने सुन्दर हार तथा कभी पुराने न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूडामणि, दो कुण्डल, बहुत-से कड़े, अर्धचन्द्र, केयूर, मनोहर नूपुर, गलेकी हँसुली और सब अँगुलियोंमें पहननेके लिये रत्नोंकी बनी
* उमासंहिता *
६०९
अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्माने उन्हें मनोहर फरसा भेंट किया। साथ ही अनेक प्रकारके अस्त्र और अभेद्य कवच दिये। समुद्रने सदा सुरम्य एवं सरस रहनेवाली माला दी और एक कमलका फूल भेंट किया। हिमवान्ने सवारीके लिये सिंह तथा आभूषणके लिये नाना प्रकारके रत्न दिये। कुबेरने उन्हें मधुसे भरा पात्र अर्पित किया तथा सर्पोंके नेता शेषनागने विचित्र रचनाकौशलसे सुशोभित एक नागहार भेंट किया, जिसमें नाना प्रकारकी सुन्दर मणियाँ गूँथी हुई थीं। इन सबने तथा दूसरे देवताओंने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवीका सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार अट्टहास करके उच्चस्वरसे गर्जना की। उनके उस भयंकर नादसे सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा। उससे बड़े जोरकी प्रतिध्वनि हुई, जिससे तीनों लोकोंमें हलचल मच गयी। चारों समुद्रोंने अपनी मर्यादा छोड़ दी। पृथ्वी डोलने लगी। उस समय महिषासुरसे पीड़ित हुए देवताओंने देवीकी जय-जयकार की।
तदनन्तर सब देवताओंने उन महालक्ष्मीस्वरूपा पराशक्ति जगदम्बाका भक्ति-गद्गद वाणीद्वारा स्तवन किया। सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षोभग्रस्त देख देववैरी दैत्य अपनी समस्त सेनाको कवच आदिसे सुसज्जित कर हाथोंमें हथियार ले सहसा उठ खड़े हुए। रोषसे भरा हुआ महिषासुर भी उस शब्दकी ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवीको देखा, जो अपनी प्रभासे तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रही थीं। इस समय महिषासुरके द्वारा पालित करोड़ों शस्त्रधारी महावीर वहाँ आ पहुँचे। चिक्षुर, चामर, उदग्र, कराल, उद्धत, बाष्कल, ताम्र, उग्रास्य, उग्रवीर्य, बिडाल, अन्धक, दुर्धर, दुर्मुख, त्रिनेत्र और महानु—ये तथा अन्य बहुत-से युद्धकुशल शूरवीर समरांगणमें देवीके साथ युद्ध करने लगे। वे सब-के-सब अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें पारंगत थे। इस प्रकार देवी और दैत्यगण दोनों परस्पर जूझने लगे। उनका वह भीषण समय मार-काटमें ही बीतने लगा। इस तरह भयानक युद्ध होनेके बाद महिषासुर देवीके साथ मायायुद्ध करने लगा।
तब देवीने कहा—रे मूढ़! तेरी बुद्धि मारी गयी है। तू व्यर्थ हठ क्यों करता है? तीनों लोकोंमें कोई भी असुर युद्धमें मेरे सामने टिक नहीं सकते।
यों कहकर सर्वकलामयी देवी कूदकर महिषासुरपर चढ़ गयीं और अपने पैरसे उसे दबाकर उन्होंने भयंकर शूलसे उसके कण्ठमें आघात किया। उनके पैरसे दबा होनेपर भी महिषासुर अपने मुखसे दूसरे रूपमें बाहर निकलने लगा। अभी आधे शरीरसे ही वह बाहर निकलने पाया था कि देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया। आधा निकला होनेपर भी वह महा-अधम दैत्य देवीके साथ युद्ध करने लगा। तब देवीने बहुत बड़ी तलवारसे उसका सिर काटकर उस असुरको धराशायी कर दिया। फिर तो उसके सैनिक-गण 'हाय! हाय!' करके नीचे मुख किये भयभीत हो रणभूमिसे भागने और त्राहि-त्राहिकी पुकार करने लगे। उस समय
789 संक्षिप्त शिवपुराण—20 A
६१० * संक्षिप्त शिवपुराण *
इन्द्र आदि सब देवताओंने देवीकी स्तुति की। गन्धर्व गीत गाने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे देवीके महालक्ष्मी-अवतारकी कथा कही है। अब तुम सुस्थिर-चित्तसे सरस्वतीके प्रादुर्भावका प्रसंग सुनो। (अध्याय ४६)
देवी उमाके शरीरसे सरस्वतीका आविर्भाव, उनके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत भेजना, दूतके निराश लौटनेपर शुम्भका क्रमशः धूम्रलोचन, चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीजको भेजना और देवीके द्वारा उन सबका मारा जाना
ऋषि कहते हैं—पूर्वकालमें शुम्भ और निशुम्भ नामके दो प्रतापी दैत्य थे, जो आपसमें भाई-भाई थे। उन दोनोंने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके राज्यपर बलपूर्वक आक्रमण किया। उनसे पीड़ित हुए देवताओंने हिमालय पर्वतकी शरण ली और सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाली सर्वभूतजननी देवी उमाका स्तवन किया।
देवता बोले—महेश्वरि दुर्गे! आपकी जय हो। अपने भक्तजनोंका प्रिय करनेवाली देवि! आपकी जय हो। आप तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली शिवा हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही मोक्ष प्रदान करनेवाली परा अम्बा हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आप समस्त संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाली हैं। आपको नमस्कार है। कालिका और तारा-रूप धारण करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है। छिन्नमस्ता आपका ही स्वरूप है। आप ही श्रीविद्या हैं। आपको नमस्कार है। भुवनेश्वरि! आपको नमस्कार है। भैरवरूपिणि! आपको नमस्कार है। आप ही बगलामुखी और धूमावती हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही त्रिपुरसुन्दरी और मातंगी हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। अजिता, विजया, जया, मंगला और विलासिनी—ये सभी आपके ही विभिन्न रूपोंकी संज्ञाएँ हैं। इन सभी रूपोंमें आपको नमस्कार है। दोग्ध्री (माता अथवा कामधेनु)-रूपमें आपको नमस्कार है। घोर आकार धारण करनेवाली आपको नमस्कार है। अपराजितारूपमें आपको प्रणाम है। नित्या महाविद्याके रूपमें आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही शरणागतोंका पालन करनेवाली रुद्राणी हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। वेदान्तके द्वारा आपके ही स्वरूपका बोध होता है। आपको नमस्कार है। आप परमात्मा हैं। आपको मेरा प्रणाम है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका संचालन करनेवाली आप जगदम्बाको बारंबार नमस्कार है।*
देवताओंके इस प्रकार स्तुति करनेपर
* देवा ऊचुः—
जय दुर्गे महेशानि जयात्मीयजनप्रिये। त्रैलोक्यत्राणकारिण्यै शिवायै ते नमो नमः॥
789 संक्षिप्त शिवपुराण—20 B
* उमासंहिता * ६११
वरदायिनी एवं कल्याणरूपिणी गौरी देवी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने समस्त देवताओंसे पूछा—'आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं?' तब उन्हीं गौरीके शरीरसे एक कुमारी प्रकट हुई। वह सब देवताओंके देखते-देखते शिवशक्तिसे आदरपूर्वक बोली—'माँ! ये समस्त स्वर्गवासी देवता निशुम्भ और शुम्भ नामक प्रबल दैत्योंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी रक्षाके लिये मेरी स्तुति करते हैं।' पार्वतीके शरीरकोशसे वह कुमारी निकली थी, इसलिये कौशिकी नामसे प्रसिद्ध हुई। कौशिकी ही साक्षात् शुम्भासुरका नाश करनेवाली सरस्वती हैं। उन्हींको उग्रतारा और महोग्रतारा भी कहा गया है। माताके शरीरसे स्वतः प्रकट होनेके कारण वे इस भूतलपर मातंगी भी कहलाती हैं। उन्होंने समस्त देवताओंसे कहा—'तुमलोग निर्भय रहो। मैं स्वतन्त्र हूँ। अतः किसीका सहारा लिये बिना ही तुम्हारा कार्य सिद्ध कर दूँगी।' ऐसा कहकर वे देवी तत्काल वहाँ अदृश्य हो गयीं।
एक दिन शुम्भ और निशुम्भके सेवक चण्ड और मुण्डने देवीको देखा। उनका मनोहर रूप नेत्रोंको सुख प्रदान करनेवाला था। उसे देखते ही वे मोहित हो सुध-बुध खोकर पृथ्वीपर गिर पड़े, फिर होशमें आनेपर वे अपने राजाके पास गये और आरम्भसे ही सारा वृत्तान्त बताकर बोले—'महाराज! हम दोनोंने एक अपूर्व सुन्दरी नारी देखी है, जो हिमालयके रमणीय शिखरपर रहती है और सिंहपर सवारी करती है।' चण्ड-मुण्डकी यह बात सुनकर महान् असुर शुम्भने देवीके पास सुग्रीव नामका अपना दूत भेजा और कहा—'दूत! हिमालयपर कोई अपूर्व सुन्दरी रहती है। तुम वहाँ जाओ और उससे मेरा संदेश कहकर उसे प्रयत्नपूर्वक यहाँ ले आओ।' यह आज्ञा पाकर दानवशिरोमणि सुग्रीव हिमालयपर गया और जगदम्बा महेश्वरीसे इस प्रकार बोला।
दूतने कहा—देवि! दैत्य शुम्भासुर अपने महान् बल और विक्रमके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसका छोटा भाई निशुम्भ भी वैसा ही है। शुम्भने मुझे तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा है। इसलिये मैं यहाँ आया हूँ। सुरेश्वरि! उसने जो संदेश दिया है, उसे इस समय सुनो! 'मैंने समरांगणमें इन्द्र आदि देवताओंको जीतकर उनके समस्त रत्नोंका अपहरण कर लिया है। यज्ञमें देवता आदिके दिये हुए देवभागका मैं स्वयं ही
नमो मुक्तिप्रदायिन्यै पराम्बायै नमो नमः। नमः समस्तसंसारोत्पत्तिस्थित्यन्तकारिके॥
कालिकारूपसम्पन्ने नमस्ताराकृते नमः। छिन्नमस्तास्वरूपायै श्रीविद्यायै नमोऽस्तु ते॥
भुवनेशि नमस्तुभ्यं नमस्ते भैरवाकृते। नमोऽस्तु बगलामुख्यै धूमावत्यै नमो नमः॥
नमस्त्रिपुरसुन्दर्यै मातङ्ग्यै ते नमो नमः। अजितायै नमस्तुभ्यं विजयायै नमो नमः॥
जयायै मङ्गलायै ते विलासिन्यै नमो नमः। दोग्ध्रीरूपे नमस्तुभ्यं नमो घोराकृतेऽस्तु ते॥
नमोऽपराजिताकारे नित्याकारे नमो नमः। शरणागतपालिन्यै रुद्राण्यै ते नमो नमः॥
नमो वेदान्तवेद्यायै नमस्ते परमात्मने। अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिकायै नमो नमः॥
(शि० पु० उ० सं० ४७। ३—१०)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—20 C
६१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उपभोग करता हूँ। मैं मानता हूँ कि तुम स्त्रियोंमें रत्न हो, सब रत्नोंके ऊपर स्थित हो। इसलिये तुम कामजनित रसके साथ मुझको अथवा मेरे भाईको अंगीकार करो।'
दूतके मुँहसे शुम्भका यह संदेश सुनकर भूतनाथ भगवान् शिवकी प्राणवल्लभा महामायाने इस प्रकार कहा।
देवी बोलीं—दूत! तुम सच कहते हो। तुम्हारे कथनमें थोड़ा-सा भी असत्य नहीं है।
परंतु मैंने पहलेसे एक प्रतिज्ञा कर ली है; उसे सुनो। जो मेरा घमंड चूर कर दे, जो मुझे युद्धमें जीत ले, उसीको मैं पति बना सकती हूँ, दूसरेको नहीं। यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है। इसलिये तुम शुम्भ और निशुम्भको मेरी यह प्रतिज्ञा बता दो। फिर इस विषयमें जैसा उचित हो, वैसा वे करें।
देवीकी यह बात सुनकर दानव सुग्रीव लौट गया। वहाँ जाकर उसने विस्तारपूर्वक राजाको सब बातें बतायीं। दूतकी बात सुनकर उग्र शासन करनेवाला शुम्भ कुपित हो उठा और बलवानोंमें श्रेष्ठ सेनापति धूम्राक्षसे बोला—'धूम्राक्ष! हिमालयपर कोई सुन्दरी रहती है। तुम शीघ्र वहाँ जाकर जैसे भी वह यहाँ आये, उसी तरह उसे ले आओ। असुरप्रवर! उसे लानेमें तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये। यदि वह युद्ध करना चाहे तो तुम्हें प्रयत्नपूर्वक उसके साथ युद्ध भी करना चाहिये।'
शुम्भकी ऐसी आज्ञा पाकर दैत्य धूम्रलोचन हिमालयपर गया और उमाके अंशसे प्रकट हुई भगवती भुवनेश्वरीसे कहा—'नितम्बिनि! मेरे स्वामीके पास चलो, नहीं तो तुम्हें मरवा डालूँगा। मेरे साथ साठ हजार असुरोंकी सेना है।'
देवी बोलीं—वीर! तुम्हें दैत्यराजने भेजा है। यदि मुझे मार ही डालोगे तो क्या करूँगी। परंतु युद्धके बिना मेरा वहाँ जाना असम्भव है। मेरी ऐसी ही मान्यता है।
देवीके ऐसा कहनेपर दानव धूम्रलोचन उन्हें पकड़नेके लिये दौड़ा। परंतु महेश्वरीने 'हूं' के उच्चारणमात्रसे उसको भस्म कर दिया। तभीसे वे देवी इस भूतलपर धूमावती कहलाने लगीं। उनकी आराधना करनेपर वे अपने भक्तोंके शत्रुओंका संहार कर डालती हैं। धूम्राक्षके मारे जानेपर अत्यन्त कुपित हुए देवीके वाहन सिंहने उसके साथ आये हुए समस्त असुरगणोंको चबा डाला। जो मरनेसे बचे, वे भाग खड़े हुए। इस प्रकार देवीने दैत्य धूम्रलोचनको मार डाला। इस समाचारको सुनकर प्रतापी शुम्भने बड़ा क्रोध किया। वह अपने दोनों ओठोंको दाँतोंसे दबाकर रह गया। उसने क्रमशः चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीज नामक असुरोंको
789 संक्षिप्त शिवपुराण—20 D
* उमासंहिता * | ६१३
भेजा। आज्ञा पाकर वे दैत्य उस स्थानपर गये, जहाँ देवी विराजमान थीं। अणिमा आदि सिद्धियोंसे सेवित तथा अपनी प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करती हुई भगवती सिंहवाहिनीको देखकर वे श्रेष्ठ दानव वीर बोले—‘देवि! तुम शीघ्र ही शुम्भ और निशुम्भके पास चलो, अन्यथा तुम्हें गण और वाहनसहित मरवा डालेंगे। वामे! शुम्भको अपना पति बना लो। लोकपाल आदि भी उनकी स्तुति करते हैं। शुम्भको पति बना लेनेपर तुम्हें उस महान् आनन्दकी प्राप्ति होगी, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है।'
उनकी ऐसी बात सुनकर परमेश्वरी अम्बा मुसकराकर सरस मधुर वाणीमें बोलीं।
देवीने कहा—अद्वितीय महेश्वर परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र विराजमान हैं, जो सदाशिव कहलाते हैं। वेद भी उनके तत्त्वको नहीं जानते, फिर विष्णु आदिकी तो बात ही क्या है। उन्हीं सदाशिवकी मैं सूक्ष्म प्रकृति हूँ। फिर दूसरेको पति कैसे बना सकती हूँ। सिंहिनी कितनी ही कामातुर क्यों न हो जाय, वह गीदड़को कभी अपना पति नहीं बनायेगी। हथिनी गदहेको और बाघिन खरगोशको नहीं वरेगी। दैत्यो! तुम सब लोग झूठ बोलते हो; क्योंकि कालरूपी सर्पके फंदेमें फँसे हुए हो। तुम या तो पातालको लौट जाओ या शक्ति हो तो युद्ध करो।
देवीका यह क्रोध पैदा करनेवाला वचन सुनकर वे दैत्य बोले—'हमलोग अपने मनमें तुम्हें अबला समझकर मार नहीं रहे थे। परंतु यदि तुम्हारे मनमें युद्धकी ही इच्छा है तो सिंहपर सुस्थिर होकर बैठ जाओ और युद्धके लिये आगे बढ़ो।' इस तरह वाद-विवाद करते हुए उनमें कलह बढ़ गया और समरांगणमें दोनों दलोंपर तीखे बाणोंकी वर्षा होने लगी। इस तरह उनके साथ लीलापूर्वक युद्ध करके परमेश्वरीने चण्ड-मुण्डसहित महान् असुर रक्तबीजको मार डाला। वे देववैरी असुर द्वेष बुद्धि करके आये थे, तो भी अन्तमें उन्हें उस उत्तम लोककी प्राप्ति हुई, जिसमें देवीके भक्त जाते हैं। (अध्याय ४७)
देवीके द्वारा सेना और सेनापतियोंसहित निशुम्भ एवं शुम्भका संहार
ऋषि कहते हैं—राजन्! प्रशंसनीय पराक्रमशाली महान् असुर शुम्भने इन श्रेष्ठ दैत्योंका मारा जाना सुनकर अपने उन दुर्जय गणोंको युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी, जो संग्रामका नाम सुनते ही हर्षसे खिल उठते थे। उसने कहा—'आज मेरी आज्ञासे कालक, कालकेय, मौर्य, दौर्हद तथा अन्य असुरगण बड़ी भारी सेनाके साथ संगठित हो विजयकी आशा रखकर शीघ्र युद्धके लिये प्रस्थान करें।' निशुम्भ और शुम्भ दोनों भाई उन दैत्योंको पूर्वोक्त आदेश देकर रथपर आरूढ़ हो स्वयं भी नगरसे बाहर निकले। उन महाबली वीरोंकी आज्ञासे उनकी सेनाएँ उसी तरह युद्धके लिये आगे बढ़ीं, मानो मरणोन्मुख पतंग आगमें कूदनेके लिये उठ खड़े हुए हों। उस समय असुरराजने युद्ध-
६१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
स्थलमें मृदंग, मर्दल, भेरी, डिण्डिम, झाँझ और ढोल आदि बाजे बजवाये। उन जुझारू बाजोंकी आवाज सुनकर युद्धप्रेमी वीर हर्ष एवं उत्साहसे भर गये; परंतु जिन्हें अपने प्राण ही अधिक प्यारे थे, वे उस रणभूमिसे भाग चले। युद्धसम्बन्धी वस्त्रों तथा कवच आदिसे आच्छादित अंगवाले वे योद्धा विजयकी अभिलाषासे अस्त्र-शस्त्र धारण किये युद्धस्थलमें आ पहुँचे। कितने ही सैनिक हाथियोंपर सवार थे, बहुत-से दैत्य घोड़ोंकी पीठपर बैठे थे और अन्य असुर रथोंपर चढ़कर जा रहे थे। उस समय उन्हें अपने-परायेकी पहचान नहीं होती थी। उन्होंने असुरराजके साथ समरांगणमें पहुँचकर सब ओरसे युद्ध आरम्भ कर दिया। बारंबार शतघ्नी (तोप)-की आवाज होने लगी, जिसे सुनकर देवता काँप उठे। धूल और धूँएँसे आकाशमें महान् अन्धकार छा गया। सूर्यका रथ नहीं दिखायी देता था। अत्यन्त अभिमानी करोड़ों पैदल योद्धा विजयकी अभिलाषा लिये युद्धस्थलमें आकर डट गये थे। घुड़सवार, हाथीसवार तथा अन्य रथारूढ़ असुर भी बड़ी प्रसन्नताके साथ करोड़ोंकी संख्यामें वहाँ आये थे। उस महासमरमें काले पर्वतोंके समान विशाल मदमत्त गजराज जोर-जोरसे चिग्घाड़ रहे थे, छोटे-छोटे शैल-शिखरोंके समान ऊँट भी अपने गलेसे गल्गल् ध्वनिका विस्तार करने लगे। अच्छी भूमिमें उत्पन्न हुए घोड़े गलेमें विशाल कण्ठहार धारण किये जोर-जोरसे हिनहिना रहे थे। वे अनेक प्रकारकी चालें जानते थे और हाथियोंके मस्तकपर पैर रखते हुए आकाशमार्गसे पक्षियोंकी भाँति उड़ जाते थे। शत्रुको ऐसी सेनाको आक्रमण करती देख जगदम्बाने अपने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी। साथ ही शत्रुओंको हतोत्साह करनेवाले घंटेको भी बजाया। यह देख सिंह भी अपनी गर्दन और मस्तकके केशोंको कँपाता हुआ जोर-जोरसे गर्जना करने लगा।
उस समय हिमालय पर्वतपर खड़ी हुई रमणीय आभूषणों और अस्त्रोंसे सुशोभित शिवा देवीकी ओर देखकर निशुम्भ विलासिनी रमणियोंके मनोभावको समझनेमें निपुण पुरुषकी भाँति सरस वाणीमें बोला—‘महेश्वरि! तुम-जैसी सुन्दरियोंके रमणीय शरीरपर मालतीके फूलका एक दल भी डाल दिया जाय तो वह व्यथा उत्पन्न कर देता है। ऐसे मनोहर शरीरसे तुम विकराल युद्धका विस्तार कैसे कर रही हो?’ यह बात कहकर वह महान् असुर चुप हो गया। तब चण्डिका देवीने कहा—‘मूढ़ असुर! व्यर्थकी बातें क्यों बकता है? युद्ध कर, अन्यथा पातालको चला जा।’ यह सुनकर वह महारथी वीर अत्यन्त रुष्ट हो समरभूमिमें बाणोंकी अद्भुत वृष्टि करने लगा, मानो बादल जलकी धारा बरसा रहे हों। उस समय उस रणक्षेत्रमें वर्षा-ऋतुका आगमन हुआ-सा जान पड़ता था। मदसे उद्धत हुआ वह असुर तीखे बाण, शूल, फरसे, भिन्दिपाल, परिघ, धनुष, भुशुण्डि, प्रास, क्षुरप्र तथा बड़ी-बड़ी तलवारोंसे युद्ध करने लगा। काले पर्वतोंके समान बड़े-बड़े गजराज कुम्भस्थल विदीर्ण हो जानेके कारण समरांगणमें चक्कर काटने लगे। उनकी पीठपर फहराती हुई शुम्भ-निशुम्भकी पताकाएँ, जो उड़ती
* उमासंहिता * ६१५
हुई बलाकाओं (बगुलों)-की पंक्तियोंके समान श्वेत दिखायी देती थीं, अपने स्थानसे खण्डित होकर नीचे गिरने लगीं। क्षत-विक्षत शरीरवाले दैत्य पृथ्वीपर गिरकर मछलियोंके समान तड़प रहे थे। गर्दन कट जानेके कारण घोड़ोंके समूह बड़े भयंकर दिखायी देते थे। कालिकाने कितने ही दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया तथा देवीके वाहन सिंहने अन्य बहुत-से असुरोंको अपना आहार बना लिया। उस समय दैत्योंके मारे जानेसे उस रणभूमिमें रक्तकी धारा बहानेवाली कितनी ही नदियाँ बह चलीं। सैनिकोंके केश पानीमें सेवारकी भाँति दिखायी देते थे और उनकी चादरें सफेद फेनका भ्रम उत्पन्न करती थीं।
इस तरह घोर युद्ध होने तथा राक्षसोंका महान् संहार हो जानेके पश्चात् देवी अम्बिकाने विषमें बुझे हुए तीखे बाणोंद्वारा निशुम्भको मारकर धराशायी कर दिया। अपने असीम शक्तिशाली छोटे भाईके मारे जानेपर शुम्भ रोषसे भर गया और रथपर बैठकर आठ भुजाओंसे युक्त हो महेश्वरप्रिया अम्बिकाके पास गया। उसने जोर-जोरसे शंख बजाया और शत्रुओंका दमन करनेवाले धनुषकी दुस्सह टंकारध्वनि की तथा देवीका सिंह भी अपने अयालोंको हिलाता हुआ दहाड़ने लगा। इन तीन प्रकारकी ध्वनियोंसे आकाशमण्डल गूँज उठा।
तदनन्तर जगदम्बाने अट्टहास किया, जिससे समस्त असुर संत्रस्त हो उठे। जब देवीने शुम्भसे कहा कि 'तुम युद्धमें स्थिरतापूर्वक खड़े रहो' तब देवता बोल उठे—'जय हो, जय हो जगदम्बाकी।'
इस समय दैत्यराज शुम्भने बड़ी भारी शक्ति छोड़ी, जिसकी शिखासे आगकी ज्वाला निकल रही थी। परंतु देवीने एक उल्काके द्वारा उसे मार गिराया। शुम्भके चलाये हुए बाणोंके देवीने और देवीके चलाये हुए बाणोंके शुम्भने सहस्रों टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् चण्डिकाने त्रिशूल उठाकर उस महान् असुरपर आघात किया। त्रिशूलकी चोटसे मूर्च्छित हो वह इन्द्रके द्वारा पंख काट दिये जानेपर गिरनेवाले पर्वतकी भाँति आकाश, पृथ्वी तथा समुद्रको कम्पित करता हुआ धरतीपर गिर पड़ा। तदनन्तर शूलके आघातसे होनेवाली व्यथाको सहकर उस महाबली असुरने दस हजार बाँहें धारण कर लीं और देवताओंका भी नाश करनेमें समर्थ चक्रोंद्वारा सिंहसहित महेश्वरी शिवापर आघात करना आरम्भ किया। उसके चलाये हुए चक्रोंको खेल-खेलमें ही विदीर्ण करके देवीने त्रिशूल उठाया और उस असुरपर घातक प्रहार किया। शिवाके लोकपावन पाणिपंकजसे मृत्युको प्राप्त होकर वे दोनों असुर परम पदके भागी हुए।
उस महापराक्रमी निशुम्भ और भयानक बलशाली शुम्भके मारे जानेपर समस्त दैत्य पातालमें घुस गये, अन्य बहुत-से असुरोंको काली और सिंह आदिने खा लिया तथा शेष दैत्य भयसे व्याकुल हो दसों दिशाओंमें भाग गये। नदियोंका जल स्वच्छ हो गया। वे ठीक मार्गसे बहने लगीं। मन्द-मन्द वायु बहने लगी, जिसका स्पर्श सुखद प्रतीत होता था; आकाश निर्मल हो गया। देवताओं और ब्रह्मर्षियोंने फिर यज्ञ-यागादि आरम्भ कर दिये। इन्द्र आदि सब देवता सुखी हो गये। प्रभो! दैत्यराजके
६१६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
वध-प्रसंगसे युक्त इस परम पवित्र उमाचरित्रका जो श्रद्धापूर्वक बारंबार श्रवण या पाठ करता है, वह इस लोकमें देव-दुर्लभ भोगोंका उपभोग करके परलोकमें महामायाके प्रसादसे उमाधामको जाता है। राजन्! इस प्रकार शुम्भासुरका संहार करनेवाली देवी सरस्वतीके चरित्रका वर्णन किया गया, जो साक्षात् उमाके अंशसे प्रकट हुई थीं।
(अध्याय ४८) $$\sim\sim\circ\sim\sim$$
देवताओंका गर्व दूर करनेके लिये तेजःपुंजरूपिणी उमाका प्रादुर्भाव
मुनियोंने कहा—सम्पूर्ण पदार्थोंके पूर्ण ज्ञाता सूतजी! भुवनेश्वरी उमाके, जिनसे सरस्वती प्रकट हुई थीं, अवतारका पुनः वर्णन कीजिये। वे देवी परब्रह्म, मूलप्रकृति, ईश्वरी, निराकार होती हुई भी साकार तथा नित्यानन्दमयी सती कही जाती हैं।
सूतजीने कहा—तपस्वी मुनियो! आपलोग देवीके उत्तम एवं महान् चरित्रको प्रेमपूर्वक सुनें, जिसके जाननेमात्रसे मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। एक समय देवताओं और दानवोंमें परस्पर युद्ध हुआ। उसमें महामायाके प्रभावसे देवताओंकी जीत हो गयी। इससे देवताओंको अपनी शूरवीरतापर बड़ा गर्व हुआ। वे आत्म-प्रशंसा करते हुए इस बातका प्रचार करने लगे कि 'हमलोग धन्य हैं, धन्यवादके योग्य हैं। असुर हमारा क्या कर लेंगे। वे हमलोगोंका अत्यन्त दुस्सह प्रभाव देखकर भयभीत हो 'भाग चलो! भाग चलो!' कहते हुए पाताललोकमें घुस गये। हमारा बल अद्भुत है! हममें आश्चर्यजनक तेज है। हमारा बल और तेज दैत्यकुलका विनाश करनेमें समर्थ है! अहो! देवताओंका कैसा सौभाग्य है।' इस प्रकार वे जहाँ-तहाँ डींग हाँकने लगे।
तदनन्तर उसी समय उनके समक्ष तेजका एक महान् पुंज प्रकट हुआ, जो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था। उसे देखकर सब देवता विस्मयसे भर गये। वे रूँधे हुए गलेसे परस्पर पूछने लगे—'यह क्या है? यह क्या है?' उन्हें यह पता नहीं था कि यह श्यामा (भगवती उमा)-का उत्कृष्ट प्रभाव है, जो देवताओंका अभिमान चूर्ण करनेवाला है।
उस समय देवराज इन्द्रने देवताओंको आज्ञा दी—'तुमलोग जाओ और यथार्थ-रूपसे परीक्षा करो कि यह कौन है।' देवेन्द्रके भेजनेसे वायुदेव उस तेजःपुंजके निकट गये। तब उस तेजोरशिने उन्हें सम्बोधित करके पूछा—'अजी! तुम कौन हो?' उस महान् तेजके इस प्रकार पूछनेपर वायुदेवता अभिमानपूर्वक बोले—'मैं वायु हूँ, सम्पूर्ण जगत्का प्राण हूँ; मुझ सर्वाधार परमेश्वरमें ही यह स्थावर-जंगमरूप सारा जगत् ओतप्रोत है। मैं ही समस्त विश्वका संचालन करता हूँ।' तब उस महातेजने कहा—'वायो! यदि तुम जगत्के संचालनमें समर्थ हो तो यह तृण रखा हुआ है। इसे अपनी इच्छाके अनुसार चलाओ तो सही।' तब वायुदेवताने सभी उपाय करके अपनी सारी शक्ति लगा दी। परंतु वह
* उमासंहिता * ६१७
तिनका अपने स्थानसे तिलभर भी न हटा। इससे वायुदेव लज्जित हो गये। वे चुप हो इन्द्रकी सभामें लौट गये और अपनी पराजयके साथ वहाँका सारा वृत्तान्त उन्होंने सुनाया। वे बोले—‘देवेन्द्र! हम सब लोग झूठे ही अपनेमें सर्वेश्वर होनेका अभिमान रखते हैं; क्योंकि किसी छोटी-सी वस्तुका भी हम कुछ नहीं कर सकते।’ तब इन्द्रने बारी-बारीसे समस्त देवताओंको भेजा। जब वे उसे जाननेमें समर्थ न हो सके, तब इन्द्र स्वयं गये। इन्द्रको आते देख वह अत्यन्त दुस्सह तेज तत्काल अदृश्य हो गया। इससे इन्द्र बड़े विस्मित हुए और मन-ही-मन बोले—‘जिसका ऐसा चरित्र है, उसी सर्वेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ।’ सहस्र-नेत्रधारी इन्द्र बारंबार इसी भावका चिन्तन करने लगे। इसी समय निश्च्छल करुणामय शरीर धारण करनेवाली सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी शिवप्रिया उमा उन देवताओंपर दया करने और उनका गर्व हरनेके लिये चैत्रशुक्ला नवमीको दोपहरमें वहाँ प्रकट हुईं। वे उस तेजःपुंजके बीचमें विराज रही थीं, अपनी कान्तिसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रही थीं और समस्त देवताओंको सुस्पष्टरूपसे यह जता रही थीं कि ‘मैं साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ही हूँ।’ वे चार हाथोंमें क्रमशः वर, पाश, अंकुश और अभय धारण किये थीं। श्रुतियाँ साकार होकर उनकी सेवा करती थीं। वे बड़ी रमणीय दीखती थीं तथा अपने नूतन यौवनपर उन्हें गर्व था। वे लाल रंगकी साड़ी पहने हुए थीं। लाल फूलोंकी माला तथा लाल चन्दनसे उनका श्रृंगार किया गया था। वे कोटि-कोटि कन्दर्पोंके समान मनोहारिणी तथा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान चटकीली चाँदनीसे सुशोभित थीं। सबकी अन्तर्यामिणी, समस्त भूतोंकी साक्षिणी तथा परब्रह्मस्वरूपिणी उन महामायाने इस प्रकार कहा।
उमा बोलीं—मैं ही परब्रह्म, परम ज्योति, प्रणवरूपिणी तथा युगलरूपधारिणी हूँ। मैं ही सब कुछ हूँ। मुझसे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है। मैं निराकार होकर भी साकार हूँ, सर्वतत्त्वस्वरूपिणी हूँ। मेरे गुण अतर्क्य हैं। मैं नित्यस्वरूपा तथा कार्यकारणरूपिणी हूँ। मैं ही कभी प्राणवल्लभाका आकार धारण करती हूँ और कभी प्राणवल्लभ पुरुषका। कभी स्त्री और पुरुष दोनों रूपोंमें एक साथ प्रकट होती हूँ (यही मेरा अर्धनारीश्वररूप है)। मैं सर्वरूपिणी ईश्वरी हूँ, मैं ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हूँ। मैं ही जगत्पालक विष्णु हूँ तथा मैं ही संहारकर्ता रुद्र हूँ। सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली महामाया मैं ही हूँ। काली,
६१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
लक्ष्मी और सरस्वती आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ तथा ये सकल कलाएँ मेरे अंशसे ही प्रकट हुई हैं। मेरे ही प्रभावसे तुमलोगोंने सम्पूर्ण दैत्योंपर विजय पायी है। मुझ सर्वविजयिनीको न जानकर तुमलोग व्यर्थ ही अपनेको सर्वेश्वर मान रहे हो। जैसे इन्द्रजाल करनेवाला सूत्रधार कठपुतलीको नचाता है, उसी प्रकार मैं ईश्वरी ही समस्त प्राणियोंको नचाती हूँ। मेरे भयसे हवा चलती है, मेरे भयसे ही अग्निदेव सबको जलाते हैं तथा मेरा भय मानकर ही लोकपालगण निरन्तर अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं। मैं सर्वथा स्वतन्त्र हूँ और अपनी लीलासे ही कभी देवसमुदायको विजयी बनाती हूँ तथा कभी दैत्योंको। मायासे परे जिस अविनाशी परात्पर धामका श्रुतियाँ वर्णन करती हैं, वह मेरा ही रूप है। सगुण और निर्गुण—ये मेरे दो प्रकारके रूप माने गये हैं। इनमेंसे प्रथम तो मायायुक्त है और दूसरा मायारहित। देवताओ! ऐसा जानकर गर्व छोड़ो और मुझ सनातनी प्रकृतिकी प्रेमपूर्वक आराधना करो।*
देवीका यह करुणायुक्त वचन सुन देवता भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरीकी स्तुति करने लगे—'जगदीश्वरि! क्षमा करो। परमेश्वरि! प्रसन्न होओ। मातः! ऐसी कृपा करो, जिससे फिर कभी हमें गर्व न हो।'
तबसे सब देवता गर्व छोड़ एकाग्रचित्त हो पूर्ववत् विधिपूर्वक उमादेवीकी आराधना करने लगे। ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने तुमसे उमाके प्रादुर्भावका वर्णन किया है, जिसके श्रवणमात्रसे परमपदकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय ४९)
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* उमोवाच—परं ब्रह्म परं ज्योतिः प्रणवद्वन्द्वरूपिणी। अहमेवास्मि सकलं मदन्यो नास्ति कश्चन॥
निराकारापि साकारा सर्वतत्त्वस्वरूपिणी। अप्रतर्क्यगुणा नित्या कार्यकारणरूपिणी॥
कदाचिद्दयिताकारा कदाचित्पुरुषाकृतिः। कदाचिदुभयाकारा सर्वाकाराहमीश्वरी॥
विरञ्चिः सृष्टिकर्ताहं जगन्माताहमच्युतः। रुद्रः संहारकर्ताहं सर्वविश्वविमोहिनी॥
कालिकाकमलावाणीमुखाः सर्वा हि शक्तयः। मदंशादेव संजातास्तथेमाः सकलाः कलाः॥
मत्प्रभावाज्जिताः सर्वे युष्माभिर्दितिनन्दनाः। तामविज्ञाय मां यूयं वृथा सर्वेशमानिनः॥
यथा दारुमयीं योषां नर्तयत्यैन्द्रजालिकः। तथैव सर्वभूतानि नर्तयाम्यहमीश्वरी॥
मद्भयाद् वाति पवनः सर्वं दहति हव्यभुक्। लोकपालाः प्रकुर्वन्ति स्वस्वकर्माण्यनारतम्॥
कदाचिद्देववर्गाणां कदाचिद्दितिजन्मनाम्। करोमि विजयं सम्यक् स्वतन्त्रा निजलीलया॥
अविनाशिपरं धाम मायातीतं परात्परम्। श्रुतयो वर्ण्यन्ते यत्तद्रूपं तु ममैव हि॥
सगुणं निर्गुणं चेति मद्रूपं द्विविधं मतम्। मायाशवलितं चैकं द्वितीयं तदनाश्रितम्॥
एवं विज्ञाय मां देवाः स्वं स्वं गर्वं विहाय च। भजत प्रणयोपेताः प्रकृतिं मां सनातनीम्॥
(शि० पु० उ० सं० ४९। २७—३८)
* उमासंहिता * ६१९
देवीके द्वारा दुर्गमासुरका वध तथा उनके दुर्गा, शताक्षी, शाकम्भरी और भ्रामरी आदि नाम पड़नेका कारण
मुनियोंने कहा—महाप्राज्ञ सूतजी! हम सब लोग प्रतिदिन दुर्गाजीका चरित्र सुनना चाहते हैं। अतः आप और किसी अद्भुत लीलातत्त्वका हमारे समक्ष वर्णन कीजिये। सर्वज्ञशिरोमणे सूत! आपके मुखारविन्दसे नाना प्रकारकी सुधासदृश मधुर कथाएँ सुनते-सुनते हमारा मन कभी तृप्त नहीं होता।
सूतजी बोले—मुनियो! दुर्गम नामसे विख्यात एक असुर था, जो रुरुका महाबलवान् पुत्र था। उसने ब्रह्माजीके वरदानसे चारों वेदोंको अपने हाथमें कर लिया था तथा देवताओंके लिये अजेय बल पाकर उसने भूतलपर बहुत-से ऐसे उत्पात किये, जिन्हें सुनकर देवलोकमें देवता भी कम्पित हो उठे। वेदोंके अदृश्य हो जानेपर सारी वैदिक क्रिया नष्ट हो चली। उस समय ब्राह्मण और देवता भी दुराचारी हो गये। न कहीं दान होता था, न अत्यन्त उग्र तप किया जाता था; न यज्ञ होता था और न होम ही किया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीपर सौ वर्षोंतकके लिये वर्षा बंद हो गयी। तीनों लोकोंमें हाहाकार मच गया। सब लोग दुःखी हो गये। सबको भूख-प्यासका महान् कष्ट सताने लगा। कुँआ, बावड़ी, सरोवर, सरिताएँ और समुद्र भी जलसे रहित हो गये। समस्त वृक्ष और लताएँ भी सूख गयीं। इससे समस्त प्रजाओंके चित्तमें बड़ी दीनता आ गयी। उनके महान् दुःखको देखकर सब देवता महेश्वरी योगमायाकी शरणमें गये।
देवताओंने कहा—महामाये! अपनी सारी प्रजाकी रक्षा करो, रक्षा करो। अपने क्रोधको रोको, अन्यथा सब लोग निश्चय ही नष्ट हो जायेंगे। कृपासिन्धो! दीनबन्धो! जैसे शुम्भ नामक दैत्य, महाबली निशुम्भ, धूम्राक्ष, चण्ड, मुण्ड, महान् शक्तिशाली रक्तबीज, मधु, कैटभ तथा महिषासुरका तुमने वध किया था, उसी प्रकार इस दुर्गमासुरका शीघ्र ही संहार करो। बालकोंसे पग-पगपर अपराध बनता ही रहता है। केवल माताके सिवा संसारमें दूसरा कौन है, जो उस अपराधको सहन करता हो। देवताओं और ब्राह्मणोंपर जब-जब दुःख आता है, तब-तब शीघ्र ही अवतार लेकर तुम सब लोगोंको सुखी बनाती हो।
देवताओंकी यह व्याकुल प्रार्थना
६२० * संक्षिप्त शिवपुराण *
सुनकर कृपामयी देवीने उस समय अपने अनन्त नेत्रोंसे युक्त रूपका दर्शन कराया। उनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था और वे अपने चारों हाथोंमें क्रमशः धनुष, बाण, कमल तथा नाना प्रकारके फल-मूल लिये हुए थीं। उस समय प्रजाजनोंको कष्ट उठाते देख उनके सभी नेत्रोंमें करुणाके आँसू छलक आये। वे व्याकुल होकर लगातार नौ दिन और नौ रात रोती रहीं। उन्होंने अपने नेत्रोंसे अश्रु-जलकी सहस्रों धाराएँ प्रवाहित कीं। उन धाराओंसे सब लोग तृप्त हो गये और समस्त ओषधियाँ भी सिंच गयीं। सरिताओं और समुद्रोंमें अगाध जल भर गया। पृथ्वीपर साग और फल-मूलके अंकुर उत्पन्न होने लगे। देवी शुद्ध हृदयवाले महात्मा पुरुषोंको अपने हाथमें रखे हुए फल बाँटने लगीं। उन्होंने गौओंके लिये सुन्दर घास और दूसरे प्राणियोंके लिये यथायोग्य भोजन प्रस्तुत किये। देवता, ब्राह्मण और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणी संतुष्ट हो गये। तब देवीने देवताओंसे पूछा—'तुम्हारा और कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?' उस समय सब देवता एकत्र होकर बोले—'देवि! आपने सब लोगोंको संतुष्ट कर दिया। अब कृपा करके दुर्गमासुरके द्वारा अपहृत हुए वेद लाकर हमें दीजिये।' तब देवीने 'तथास्तु' कहकर कहा—'देवताओ! अपने घरको जाओ, जाओ। मैं शीघ्र ही सम्पूर्ण वेद लाकर तुम्हें अर्पित करूँगी।'
यह सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। वे प्रफुल्ल नीलकमलके समान नेत्रोंवाली जगद्योनि जगदम्बाको भलीभाँति प्रणाम करके अपने-अपने धामको चले गये। फिर तो स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर बड़ा भारी कोलाहल मच गया, उसे सुनकर उस भयानक दैत्यने चारों ओरसे देवपुरीको घेर लिया। तब शिवा देवताओंकी रक्षाके लिये चारों ओरसे तेजोमय मण्डलका निर्माण करके स्वयं उस घेरेसे बाहर आ गयीं। फिर तो देवी और दैत्य दोनोंमें घोर युद्ध आरम्भ हो गया। समरांगणमें दोनों ओरसे कवचको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले तीखे बाणोंकी वर्षा होने लगी। इसी बीचमें देवीके शरीरसे सुन्दर रूपवाली काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमा, श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी और मातंगी—ये दस महाविद्याएँ अस्त्र-शस्त्र लिये निकलीं। तत्पश्चात् दिव्य मूर्तिवाली असंख्य मातृकाएँ प्रकट हुईं। उन सबने अपने मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट धारण कर रखा था और वे सब-की-सब विद्युत्के समान दीप्तिमती दिखायी देती थीं। इसके बाद उन मातृगणोंके साथ दैत्योंका भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ। उन सबने मिलकर उस रौरव अथवा दुर्गम दैत्यकी सौ अक्षौहिणी सेनाएँ नष्ट कर दीं। इसके बाद देवीने त्रिशूलकी धारसे उस दुर्गम दैत्यको मार डाला। वह दैत्य जड़से खोदे गये वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। इस प्रकार ईश्वरीने उस समय दुर्गमासुर नामक दैत्यको मारकर चारों वेद वापस ले देवताओंको दे दिये।
तब देवता बोले—अम्बिके! आपने हमलोगोंके लिये असंख्य नेत्रोंसे युक्त रूप धारण कर लिया था, इसलिये मुनिजन आपको 'शताक्षी' कहेंगे। अपने शरीरसे उत्पन्न हुए शाकोंद्वारा आपने समस्त लोकोंका भरण-पोषण किया है, इसलिये
* उमासंहिता * ६२१
'शाकम्भरी' के नामसे आपकी ख्याति होगी। शिवे ! आपने दुर्गम नामक महादैत्यका वध किया है, इसलिये लोग आप कल्याणमयी भगवतीको 'दुर्गा' कहेंगे। योगनिद्रे ! आपको नमस्कार है। महाबले ! आपको नमस्कार है। ज्ञानदायिनि ! आपको नमस्कार है। आप जगन्माताको बारंबार नमस्कार है। तत्त्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा जिन परमेश्वरीका ज्ञान होता है, उन अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका संचालन करनेवाली भगवती दुर्गाको बारंबार नमस्कार है। मातः ! आपतक मन, वाणी और शरीरकी पहुँच होनी कठिन है। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि—ये तीनों आपके नेत्र हैं। हम आपके प्रभावको नहीं जानते, इसलिये आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। सुरेश्वरी माता शताक्षीको छोड़कर दूसरा कौन है, जो हम-जैसे अमरोंपर दृष्टिपात करके ऐसी दया करे। देवि ! आपको सदा ऐसा ही यत्न करना चाहिये, जिससे तीनों लोक निरन्तर विघ्न-बाधाओंसे तिरस्कृत न हों। आप हमारे शत्रुओंका नाश करती रहें।
देवीने कहा—देवताओ ! जैसे बछड़ोंको देखकर गौएँ व्यग्र हो उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़ती हैं, उसी तरह मैं तुम सबको देखकर व्याकुल हो दौड़ी आती हूँ। तुम्हें न देखनेसे मेरा एक क्षण भी युगके समान बीतता है। मैं तुम्हें अपने बच्चोंके समान समझती हूँ और तुम्हारे लिये अपने प्राण भी दे सकती हूँ। तुमलोग मेरे प्रति भक्तिभावसे सुशोभित हो, अतः तुम्हें कोई भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं तुम्हारी सारी आपत्तियोंका निवारण करनेके लिये सदैव उद्यत हूँ। जैसे पूर्वकालमें तुम्हारी रक्षाके लिये मैंने दैत्योंको मारा है, उसी प्रकार आगे भी असुरोंका संहार करूँगी—इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये। यह मैं सत्य-सत्य कहती हूँ। भविष्यमें जब पुनः शुम्भ और निशुम्भ नामके दूसरे दैत्य होंगे, उस समय मैं यशोमयी देवी नन्दपत्नी यशोदाके गर्भसे योनिजस्वरूप धारण करके गोकुलमें उत्पन्न होऊँगी और यथासमय उन असुरोंका वध करूँगी। नन्दकी पुत्री होनेके कारण उस समय मुझे लोग 'नन्दजा' कहेंगे। जब मैं भ्रमरका रूप धारण करके अरुण नामक असुरका वध करूँगी, तब संसारके मनुष्य मुझे 'भ्रामरी' कहेंगे। फिर मैं भीम (भयंकर)-रूप धारण करके राक्षसोंको खाने लगूँगी, उस समय मेरा 'भीमादेवी' नाम प्रसिद्ध होगा। जब-जब पृथ्वीपर असुरोंकी ओरसे बाधा उत्पन्न होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर प्रजाजनोंका कल्याण करूँगी—इसमें संशय नहीं है। जो देवी शताक्षी कही गयी हैं, वे ही शाकम्भरी मानी गयी हैं तथा उन्हींको दुर्गा कहा गया है। तीनों नामोंद्वारा एक ही व्यक्तिका प्रतिपादन होता है। इस पृथ्वीपर महेश्वरी शताक्षीके समान दूसरा कोई दयालु देवता नहीं है; क्योंकि वे देवी समस्त प्रजाओंको संतप्त देख नौ दिनोंतक रोती रह गयी थीं।
(अध्याय ५०)
६२२
* संक्षिप्त शिवपुराण *
देवीके क्रियायोगका वर्णन—देवीकी मूर्ति एवं मन्दिरके निर्माण, स्थापन और पूजनका महत्त्व, परा अम्बाकी श्रेष्ठता, विभिन्न मासों और तिथियोंमें देवीके व्रत, उत्सव और पूजन आदिके फल तथा इस संहिताके श्रवण एवं पाठकी महिमा
व्यासजी बोले—महामते, ब्रह्मपुत्र, सर्वज्ञ सनत्कुमार! मैं उमाके परम अद्भुत क्रिया-योगका वर्णन सुनना चाहता हूँ। उस क्रियायोगका लक्षण क्या है? उसका अनुष्ठान करनेपर किस फलकी प्राप्ति होती है तथा जो परा अम्बा उमाको अधिक प्रिय है, वह क्रियायोग क्या है? ये सब बातें मुझे बताइये।
सनत्कुमारजीने कहा—महाबुद्धिमान् द्वैपायन! तुम जिस रहस्यकी बात पूछ रहे हो, वह सब मैं बताता हूँ; ध्यान देकर सुनो। ज्ञानयोग, क्रियायोग, भक्तियोग—ये श्रीमाताकी उपासनाके तीन मार्ग कहे गये हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। चित्तका जो आत्माके साथ संयोग होता है, उसका नाम ‘ज्ञानयोग’ है; उसका बाह्य वस्तुओंके साथ जो संयोग होता है, उसे ‘क्रियायोग’ कहते हैं। देवीके साथ आत्माकी एकताकी भावनाको भक्तियोग माना गया है। तीनों योगोंमें जो क्रियायोग है, उसका प्रतिपादन किया जाता है। कर्मसे भक्ति उत्पन्न होती है, भक्तिसे ज्ञान होता है और ज्ञानसे मुक्ति होती है—ऐसा शास्त्रोंमें निश्चय किया गया है। मुनिश्रेष्ठ! मोक्षका प्रधान कारण योग है, परंतु योगके ध्येयका उत्तम साधन क्रियायोग है। प्रकृतिको माया जाने और सनातन ब्रह्मको मायावी अथवा मायाका स्वामी समझे। उन दोनोंके स्वरूपको एक-दूसरेसे अभिन्न जानकर मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।*
कालीनन्दन! जो मनुष्य देवीके लिये पत्थर, लकड़ी अथवा मिट्टीका मन्दिर बनाता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। प्रतिदिन योगके द्वारा आराधना करनेवालेको जिस महान् फलकी प्राप्ति होती है, वह सारा फल उस पुरुषको मिल जाता है, जो देवीके लिये मन्दिर बनवाता है। श्रीमाताका मन्दिर बनवानेवाला धर्मात्मा पुरुष अपनी पहले बीती हुई तथा आगे आनेवाली हजार-हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। करोड़ों जन्मोंमें किये हुए थोड़े या बहुत जो पाप शेष रहते हैं, वे श्रीमाताके मन्दिरका निर्माण आरम्भ करते ही क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। जैसे नदियोंमें गंगा, सम्पूर्ण नदोंमें शोणभद्र, क्षमामें पृथ्वी, गहराईमें समुद्र और समस्त ग्रहोंमें सूर्यदेवका विशिष्ट स्थान है, उसी प्रकार समस्त देवताओंमें श्रीपरा अम्बा श्रेष्ठ मानी गयी हैं। वे समस्त देवताओंमें मुख्य हैं। जो उनके लिये मन्दिर बनवाता है, वह जन्म-जन्ममें प्रतिष्ठा पाता है। काशी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, पुष्कर, गंगासागर-तट, नैमिषारण्य, अमरकण्टक-
* मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायावि ब्रह्म शाश्वतम्। अभिन्नं तद्वपुर्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात्॥
(शि० पु० उ० सं० ५१। १२)
* उमासंहिता * ६२३
पर्वत, परम पुण्यमय श्रीपर्वत, ज्ञानपर्वत, गोकर्ण, मथुरा, अयोध्या और द्वारका इत्यादि पुण्य प्रदेशोंमें अथवा जिस किसी भी स्थानमें माताका मन्दिर बनवानेवाला मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। मन्दिरमें ईंटोंका जोड़ जबतक या जितने वर्ष रहता है, उतने हजार वर्षोंतक वह पुरुष मणिद्वीपमें प्रतिष्ठित होता है। जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न उमाकी प्रतिमा बनवाता है, वह निर्भय होकर अवश्य उनके परम धाममें जाता है। शुभ ऋतु, शुभ ग्रह और शुभ नक्षत्रमें देवीकी मूर्तिकी स्थापना करके योगमायाके प्रसादसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। कल्पके आरम्भसे लेकर अन्ततक कुलमें जितनी पीढ़ियाँ बीत गयी हैं और जितनी आनेवाली हैं, उन सबको मनुष्य सुन्दर देवीमूर्तिकी स्थापना करके तार देता है।
जो केवल जगद्योनि परा अम्बाकी शरण लेते हैं, उन्हें मनुष्य नहीं मानना चाहिये। वे साक्षात् देवीके गण हैं। जो चलते-फिरते, सोते-जागते अथवा खड़े होते समय 'उमा' इस दो अक्षरके नामका उच्चारण करते हैं, वे शिवाके ही गण हैं। जो नित्य-नैमित्तिक कर्ममें पुष्प, धूप और दीपोंद्वारा देवी परा शिवाका पूजन करते हैं, वे शिवाके धाममें जाते हैं। जो प्रतिदिन गोबर या मिट्टीसे देवीके मन्दिरको लीपते हैं अथवा उसमें झाडू देते हैं, वे भी उमाके धाममें जाते हैं। जिन्होंने देवीके परम उत्तम एवं रमणीय मन्दिरका निर्माण कराया है, उनके कुलके लोगोंको माता उमा सदा आशीर्वाद देती हैं। वे कहती हैं, 'ये लोग मेरे हैं। अतः मुझमें प्रेमके भागी बने रहकर सौ वर्षोंतक जीयें और इनपर कभी कोई आपत्ति न आये।' इस प्रकार श्रीमाता रात-दिन आशीर्वाद देती हैं। जिसने महादेवी उमाकी शुभ मूर्तिका निर्माण कराया है, उसके कुलके दस हजार पीढ़ियोंतकके लोग मणिद्वीपमें सम्मानपूर्वक रहते हैं। महामायाकी मूर्तिको स्थापित करके उसकी भलीभाँति पूजा करनेके पश्चात् साधक जिस-जिस मनोरथके लिये प्रार्थना करता है, उस-उसको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
जो श्रीमाताकी स्थापित की हुई उत्तम मूर्तिको मधुमिश्रित घीसे नहलाता है, उसके पुण्यफलकी गणना कौन कर सकता है? चन्दन, अगुरु, कपूर, जटामांसी तथा नागरमोथा आदिसे युक्त जल तथा एक रंगकी गौओंके दूधसे परमेश्वरीको नहलाये। तत्पश्चात् अष्टादशांगधूपके द्वारा अग्निमें उत्तम आहुति दे तथा घृत और कर्पूरसहित बत्तियोंद्वारा देवीकी आरती उतारे। कृष्णपक्षकी अष्टमी, नवमी, अमावास्यामें अथवा शुक्लपक्षकी पंचमी और दशमी तिथियोंमें गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा जगदम्बाकी विशेष पूजा करनी चाहिये। रात्रिसूक्त, श्रीसूक्त अथवा देवीसूक्तको पढ़ते या मूलमन्त्रका जप करते हुए देवीकी आराधना करनी चाहिये। विष्णुक्रान्ता और तुलसीको छोड़कर शेष सभी पुष्प देवीके लिये प्रीतिकारक जानने चाहिये। कमलका पुष्प उनके लिये विशेष प्रीतिकारक होता है। जो देवीको सोने-चाँदीके फूल चढ़ाता है, वह करोड़ों सिद्धोंसे युक्त उनके परम धाममें जाता है। देवीके उपासकोंको पूजनके अन्तमें सदा अपने अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिये। 'जगत्को आनन्द
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प्रदान करनेवाली परमेश्वरि ! प्रसन्न होओ।' इत्यादि वाक्योंद्वारा स्तुति एवं मन्त्रपाठ करता हुआ देवीके भजनमें लगा रहनेवाला उपासक उनका इस प्रकार ध्यान करे। देवी सिंहपर सवार हैं। उनके हाथोंमें अभय एवं वरकी मुद्राएँ हैं तथा वे भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली हैं। इस प्रकार महेश्वरीका ध्यान करके उन्हें नैवेद्यके रूपमें नाना प्रकारके पके हुए फल अर्पित करे। जो परात्मा शम्भुशक्तिका नैवेद्य भक्षण करता है; वह मनुष्य अपने सारे पापपंकको धोकर निर्मल हो जाता है। जो चैत्र शुक्ला तृतीयाको भवानीकी प्रसन्नताके लिये व्रत करता है, वह जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो परमपदको प्राप्त होता है। विद्वान् पुरुष इसी तृतीयाको दोलोत्सव करे। उसमें शंकर-सहित जगदम्बा उमाकी पूजा करे। फूल, कुंकुम, वस्त्र, कपूर, अगुरु, चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पहार तथा अन्य गन्ध-द्रव्योंद्वारा शिवसहित सर्वकल्याणकारिणी महामाया महेश्वरी श्रीगौरीदेवीका पूजन करके उन्हें झूलेमें झुलाये। जो प्रतिवर्ष नियमपूर्वक उक्त तिथिको देवीका व्रत और दोलोत्सव करता है, उसे शिवादेवी सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थ देती हैं।
वैशाखमासके शुक्लपक्षमें जो अक्षय तृतीया तिथि आती है, उसमें आलस्यरहित हो जो जगदम्बाका व्रत करता है तथा बेला, मालती, चम्पा, जपा (अढ़उल), बन्धूक (दुपहरिया) और कमलके फूलोंसे शंकरसहित गौरीदेवीकी पूजा करता है, वह करोड़ों जन्मोंमें किये गये मानसिक, वाचिक और शारीरिक पापोंका नाश करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको अक्षयरूपमें प्राप्त करता है।
ज्येष्ठ शुक्ला तृतीयाको व्रत करके जो अत्यन्त प्रसन्नताके साथ महेश्वरीका पूजन करता है, उसके लिये कुछ भी असाध्य नहीं होता। आषाढ़के शुक्लपक्षकी तृतीयाको अपने वैभवके अनुसार रथोत्सव करे। यह उत्सव देवीको अत्यन्त प्रिय है। पृथ्वीको रथ समझे, चन्द्रमा और सूर्यको उसके पहिये जाने, वेदोंको घोड़े और ब्रह्माजीको सारथि माने। इस भावनासे मणिजटित रथकी कल्पना करके उसे पुष्पमालाओंसे सुशोभित करे। फिर उसके भीतर शिवादेवीको विराजमान करे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष यह भावना करे कि परा अम्बा उमादेवी सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये उसकी देखभाल करनेके निमित्त रथके भीतर बैठी हैं। जब रथ धीरे-धीरे चले, तब जय-जयकार करते हुए प्रार्थना करे—'देवि ! दीनवत्सले ! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये। (पाहि देवि जनान्स्मान् प्रपन्नान् दीनवत्सले ।') इन वाक्योंद्वारा देवीको संतुष्ट करे और यात्राके समय नाना प्रकारके बाजे बजवाये। ग्राम या नगरकी सीमाके अन्ततक रथको ले जाकर वहाँ उस रथपर देवीकी पूजा करे और नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करके फिर उन्हें वहाँसे अपने घर ले आये। तदनन्तर सैकड़ों बार प्रणाम करके जगदम्बासे प्रार्थना करे। जो विद्वान् इस प्रकार देवीका पूजन, व्रत एवं रथोत्सव