भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 850 में से

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पृष्ठ 623

* उमासंहिता *
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अँगूठियाँ भी दीं। विश्वकर्माने उन्हें मनोहर फरसा भेंट किया। साथ ही अनेक प्रकारके अस्त्र और अभेद्य कवच दिये। समुद्रने सदा सुरम्य एवं सरस रहनेवाली माला दी और एक कमलका फूल भेंट किया। हिमवान्ने सवारीके लिये सिंह तथा आभूषणके लिये नाना प्रकारके रत्न दिये। कुबेरने उन्हें मधुसे भरा पात्र अर्पित किया तथा सर्पोंके नेता शेषनागने विचित्र रचनाकौशलसे सुशोभित एक नागहार भेंट किया, जिसमें नाना प्रकारकी सुन्दर मणियाँ गूँथी हुई थीं। इन सबने तथा दूसरे देवताओंने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवीका सम्मान किया। तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार अट्टहास करके उच्चस्वरसे गर्जना की। उनके उस भयंकर नादसे सम्पूर्ण आकाश गूँज उठा। उससे बड़े जोरकी प्रतिध्वनि हुई, जिससे तीनों लोकोंमें हलचल मच गयी। चारों समुद्रोंने अपनी मर्यादा छोड़ दी। पृथ्वी डोलने लगी। उस समय महिषासुरसे पीड़ित हुए देवताओंने देवीकी जय-जयकार की।

तदनन्तर सब देवताओंने उन महालक्ष्मीस्वरूपा पराशक्ति जगदम्बाका भक्ति-गद्गद वाणीद्वारा स्तवन किया। सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षोभग्रस्त देख देववैरी दैत्य अपनी समस्त सेनाको कवच आदिसे सुसज्जित कर हाथोंमें हथियार ले सहसा उठ खड़े हुए। रोषसे भरा हुआ महिषासुर भी उस शब्दकी ओर लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवीको देखा, जो अपनी प्रभासे तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रही थीं। इस समय महिषासुरके द्वारा पालित करोड़ों शस्त्रधारी महावीर वहाँ आ पहुँचे। चिक्षुर, चामर, उदग्र, कराल, उद्धत, बाष्कल, ताम्र, उग्रास्य, उग्रवीर्य, बिडाल, अन्धक, दुर्धर, दुर्मुख, त्रिनेत्र और महानु—ये तथा अन्य बहुत-से युद्धकुशल शूरवीर समरांगणमें देवीके साथ युद्ध करने लगे। वे सब-के-सब अस्त्र-शस्त्रोंकी विद्यामें पारंगत थे। इस प्रकार देवी और दैत्यगण दोनों परस्पर जूझने लगे। उनका वह भीषण समय मार-काटमें ही बीतने लगा। इस तरह भयानक युद्ध होनेके बाद महिषासुर देवीके साथ मायायुद्ध करने लगा।

तब देवीने कहा—रे मूढ़! तेरी बुद्धि मारी गयी है। तू व्यर्थ हठ क्यों करता है? तीनों लोकोंमें कोई भी असुर युद्धमें मेरे सामने टिक नहीं सकते।

यों कहकर सर्वकलामयी देवी कूदकर महिषासुरपर चढ़ गयीं और अपने पैरसे उसे दबाकर उन्होंने भयंकर शूलसे उसके कण्ठमें आघात किया। उनके पैरसे दबा होनेपर भी महिषासुर अपने मुखसे दूसरे रूपमें बाहर निकलने लगा। अभी आधे शरीरसे ही वह बाहर निकलने पाया था कि देवीने अपने प्रभावसे उसे रोक दिया। आधा निकला होनेपर भी वह महा-अधम दैत्य देवीके साथ युद्ध करने लगा। तब देवीने बहुत बड़ी तलवारसे उसका सिर काटकर उस असुरको धराशायी कर दिया। फिर तो उसके सैनिक-गण 'हाय! हाय!' करके नीचे मुख किये भयभीत हो रणभूमिसे भागने और त्राहि-त्राहिकी पुकार करने लगे। उस समय


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