भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 622

६०८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

देवताओंने शिव और केशवको नमस्कार किया तथा अपना सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे ब्योरेवार कह सुनाया। वे बोले—'भगवन्! दुरात्मा महिषासुरने हम सबको समरांगणमें जीतकर स्वर्गलोकसे निकाल दिया है। इसलिये हम इस मर्त्यलोकमें भटक रहे हैं और कहीं भी हमें शान्ति नहीं मिल रही है। उस असुरने इन्द्र आदि देवताओंकी कौन-कौन-सी दुर्दशा नहीं की है। सूर्य, चन्द्रमा, वरुण, कुबेर, यम, इन्द्र, अग्नि, वायु, गन्धर्व, विद्याधर और चारण—इन सबके तथा अन्य लोगोंके भी जो कर्तव्यकर्म हैं, उन सबको वह पापात्मा असुर स्वयं ही करता है। उसने दैत्यपक्षको अभय-दान कर दिया है। इसलिये हम सब देवता आपकी शरणमें आये हैं। आप दोनों हमारी रक्षा करें और उस असुरके वधका उपाय शीघ्र ही सोचें; क्योंकि आप दोनों ऐसा करनेमें समर्थ हैं।'

देवताओंकी यह बात सुनकर भगवान् शिव और विष्णुने अत्यन्त क्रोध किया। रोषके मारे उनके नेत्र घूमने लगे। तब अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए भगवान् शिव और विष्णुके मुखसे तथा अन्य देवताओंके शरीरसे तेज प्रकट हुआ। तेजका वह महान् पुंज अत्यन्त प्रज्वलित हो दसों दिशाओंमें प्रकाशित हो उठा। दुर्गाजीके ध्यानमें लगे हुए सब देवताओंने उस तेजको प्रत्यक्ष देखा। सम्पूर्ण देवताओंके शरीरोंसे निकला हुआ वह अत्यन्त भीषण तेज एकत्र हो एक नारीके रूपमें परिणत हो गया। वह नारी साक्षात् महिषमर्दिनी देवी थीं। उनका प्रकाशमान मुख भगवान् शिवके तेजसे प्रकट हुआ था। भुजाएँ विष्णुके तेजसे उत्पन्न हुई थीं। केश यमराजके तेजसे आविर्भूत हुए थे। उनके दोनों स्तन चन्द्रमाके तेजसे प्रकट हुए थे। कटिभाग इन्द्रके तेजसे तथा जंघा और ऊरु वरुणके तेजसे पैदा हुए थे। पृथ्वीके तेजसे नितम्बका और ब्रह्माजीके तेजसे दोनों चरणोंका आविर्भाव हुआ था। पैरोंकी अँगुलियाँ सूर्यके तेजसे और हाथकी अँगुलियाँ वसुओंके तेजसे उत्पन्न हुई थीं। नासिका कुबेरके, दाँत प्रजापतिके, तीनों नेत्र अग्निके, दोनों भौंहें साध्यगणके, दोनों कान वायुके तथा अन्य देवताओंके तेजसे प्रकट हुए थे। इस प्रकार देवताओंके तेजसे प्रकट हुई कमलालया लक्ष्मी ही वह परमेश्वरी थीं। सम्पूर्ण देवताओंकी तेजोराशिसे प्रकट हुई उन देवीको देखकर सब देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। परंतु उनके पास कोई अस्त्र नहीं था। यह देख ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंने शिवा देवीको अस्त्र-शस्त्रसे सम्पन्न करनेका विचार किया। तब महेश्वरने महेश्वरीको शूल समर्पित किया। भगवान् विष्णुने चक्र, वरुणने पाश, अग्निदेवने शक्ति, वायु देवताने धनुष तथा बाणोंसे भरे दो तरकश और शचीपति इन्द्रने वज्र एवं घण्टा प्रदान किये। यमराजने कालदण्ड, प्रजापतिने अक्षमाला, ब्रह्माने कमण्डलु एवं सूर्यदेवने समस्त रोमकूपोंमें अपनी किरणें अर्पित कीं। कालने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी, क्षीरसागरने सुन्दर हार तथा कभी पुराने न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होंने दिव्य चूडामणि, दो कुण्डल, बहुत-से कड़े, अर्धचन्द्र, केयूर, मनोहर नूपुर, गलेकी हँसुली और सब अँगुलियोंमें पहननेके लिये रत्नोंकी बनी