भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 621

* उमासंहिता * ६०७

ब्रह्माजीने देखा—ये दोनों दैत्य आक्रमण करना चाहते हैं और भगवान् जनार्दन समुद्रके जलमें सो रहे हैं, तब उन्होंने परमेश्वरीका स्तवन किया और उनसे प्रार्थना की—‘अम्बिके! तुम इन दोनों दुर्जय असुरोंको मोहित करो और अजन्मा भगवान् नारायणको जगा दो।’

ऋषि कहते हैं—इस प्रकार मधु और कैटभके नाशके लिये ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिदेवी जगज्जननी महाविद्या फाल्गुन शुक्ला द्वादशीको त्रैलोक्य-मोहिनी शक्तिके रूपमें प्रकट हो महाकालीके नामसे विख्यात हुईं। तदनन्तर आकाशवाणी हुई—‘कमलासन! डरो मत। आज युद्धमें मधु-कैटभको मारकर मैं तुम्हारे कण्टकका नाश करूँगी।’ यों कहकर वे महामाया श्रीहरिके नेत्र और मुख आदिसे निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके दृष्टिपथमें आ खड़ी हो गयीं। फिर तो देवाधिदेव हृषीकेश जनार्दन जाग उठे। उन्होंने अपने सामने दोनों दैत्य मधु और कैटभको देखा। उन दैत्योंके साथ अतुल तेजस्वी विष्णुका पाँच हजार वर्षोंतक बाहुयुद्ध हुआ। तब महामायाके प्रभावसे मोहित हुए उन श्रेष्ठ दानवोंने लक्ष्मीपतिसे कहा—‘तुम हमसे मनोवांछित वर ग्रहण करो।’

नारायण बोले—यदि तुमलोग प्रसन्न हो तो मेरे हाथसे मारे जाओ। यही मेरा वर है। इसे दो। मैं तुम दोनोंसे दूसरा वर नहीं माँगता।

ऋषि कहते हैं—उन असुरोंने देखा, सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबी हुई है; तब वे केशवसे बोले—‘हम दोनोंको ऐसी जगह मारो, जहाँ जलसे भीगी हुई धरती न हो।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् विष्णुने अपना परम तेजस्वी चक्र उठाया और अपनी जाँघपर उनके मस्तक रखकर काट डाला। राजन्! यह कालिकाकी उत्पत्तिका प्रसंग कहा गया है। महामते! अब महालक्ष्मीके प्रादुर्भावकी कथा सुनो। देवी उमा निर्विकार और निराकार होकर भी देवताओंका दुःख दूर करनेके लिये युग-युगमें साकाररूप धारण करके प्रकट होती हैं। उनका शरीरग्रहण उनकी इच्छाका वैभव कहा गया है। वे लीलासे इसलिये प्रकट होती हैं कि भक्तजन उनके गुणोंका गान करते रहें।

(अध्याय २८—४५)


सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे देवीका महालक्ष्मीरूपमें अवतार और उनके द्वारा महिषासुरका वध

ऋषि कहते हैं—राजन्! रम्भ नामसे प्रसिद्ध एक असुर था, जो दैत्यवंशका शिरोमणि माना जाता था। उससे महातेजस्वी महिष नामक दानवका जन्म हुआ था। दानवराज महिष समस्त देवताओंको युद्धमें पराजित करके देवराज इन्द्रके सिंहासनपर जा बैठा और स्वर्गलोकमें रहकर त्रिलोकीका राज्य करने लगा। तब पराजित हुए देवता ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजी भी उन सबको साथ ले उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् शिव और विष्णु विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर सब