शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६०६ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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है। इसका क्या कारण है? बताइये। समझदार होनेपर भी हम दोनोंका मन मोहसे व्याकुल हो गया, यह तो बड़ी भारी मूर्खता है।
ऋषि बोले—राजन्! सनातन शक्ति-स्वरूपा जगदम्बा महामाया कही गयी हैं। वे ही सबके मनको खींचकर मोहमें डाल देती हैं। प्रभो! उनकी मायासे मोहित होनेके कारण ब्रह्मा आदि समस्त देवता भी परम तत्त्वको नहीं जान पाते, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? वे परमेश्वरी ही रज, सत्त्व और तम—इन तीनों गुणोंका आश्रय ले समयानुसार सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि, पालन और संहार करती हैं। नृपश्रेष्ठ! जिसके ऊपर वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वरदायिनी जगदम्बा प्रसन्न होती हैं, वही मोहके घेरेको लाँघ पाता है।
राजाने पूछा—मुने! जो सबको मोहित करती हैं, वे देवी महामाया कौन हैं? और किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ है? यह कृपा करके मुझे बताइये।
ऋषि बोले—जब सारा जगत् एकार्णवके जलमें निमग्न था और योगेश्वर भगवान् केशव शेषकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले शयन कर रहे थे, उन्हीं दिनों भगवान् विष्णुके कानोंके मलसे दो असुर उत्पन्न हुए, जो भूतलपर मधु और कैटभके नामसे विख्यात हैं। वे दोनों विशालकाय घोर असुर प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी थे। उनके जबड़े बहुत बड़े थे। उनके मुख दाढ़ोंके कारण ऐसे विकराल दिखायी देते थे, मानो वे सम्पूर्ण जगत्को खा जानेके लिये उद्यत हों। उन दोनोंने भगवान् विष्णुकी नाभिसे प्रकट हुए कमलके ऊपर विराजमान ब्रह्माको देखकर पूछा—'अरे, तू कौन है?' ऐसा कहते हुए वे उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हो गये।