शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उपभोग करता हूँ। मैं मानता हूँ कि तुम स्त्रियोंमें रत्न हो, सब रत्नोंके ऊपर स्थित हो। इसलिये तुम कामजनित रसके साथ मुझको अथवा मेरे भाईको अंगीकार करो।'
दूतके मुँहसे शुम्भका यह संदेश सुनकर भूतनाथ भगवान् शिवकी प्राणवल्लभा महामायाने इस प्रकार कहा।
देवी बोलीं—दूत! तुम सच कहते हो। तुम्हारे कथनमें थोड़ा-सा भी असत्य नहीं है।
परंतु मैंने पहलेसे एक प्रतिज्ञा कर ली है; उसे सुनो। जो मेरा घमंड चूर कर दे, जो मुझे युद्धमें जीत ले, उसीको मैं पति बना सकती हूँ, दूसरेको नहीं। यह मेरी अटल प्रतिज्ञा है। इसलिये तुम शुम्भ और निशुम्भको मेरी यह प्रतिज्ञा बता दो। फिर इस विषयमें जैसा उचित हो, वैसा वे करें।
देवीकी यह बात सुनकर दानव सुग्रीव लौट गया। वहाँ जाकर उसने विस्तारपूर्वक राजाको सब बातें बतायीं। दूतकी बात सुनकर उग्र शासन करनेवाला शुम्भ कुपित हो उठा और बलवानोंमें श्रेष्ठ सेनापति धूम्राक्षसे बोला—'धूम्राक्ष! हिमालयपर कोई सुन्दरी रहती है। तुम शीघ्र वहाँ जाकर जैसे भी वह यहाँ आये, उसी तरह उसे ले आओ। असुरप्रवर! उसे लानेमें तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये। यदि वह युद्ध करना चाहे तो तुम्हें प्रयत्नपूर्वक उसके साथ युद्ध भी करना चाहिये।'
शुम्भकी ऐसी आज्ञा पाकर दैत्य धूम्रलोचन हिमालयपर गया और उमाके अंशसे प्रकट हुई भगवती भुवनेश्वरीसे कहा—'नितम्बिनि! मेरे स्वामीके पास चलो, नहीं तो तुम्हें मरवा डालूँगा। मेरे साथ साठ हजार असुरोंकी सेना है।'
देवी बोलीं—वीर! तुम्हें दैत्यराजने भेजा है। यदि मुझे मार ही डालोगे तो क्या करूँगी। परंतु युद्धके बिना मेरा वहाँ जाना असम्भव है। मेरी ऐसी ही मान्यता है।
देवीके ऐसा कहनेपर दानव धूम्रलोचन उन्हें पकड़नेके लिये दौड़ा। परंतु महेश्वरीने 'हूं' के उच्चारणमात्रसे उसको भस्म कर दिया। तभीसे वे देवी इस भूतलपर धूमावती कहलाने लगीं। उनकी आराधना करनेपर वे अपने भक्तोंके शत्रुओंका संहार कर डालती हैं। धूम्राक्षके मारे जानेपर अत्यन्त कुपित हुए देवीके वाहन सिंहने उसके साथ आये हुए समस्त असुरगणोंको चबा डाला। जो मरनेसे बचे, वे भाग खड़े हुए। इस प्रकार देवीने दैत्य धूम्रलोचनको मार डाला। इस समाचारको सुनकर प्रतापी शुम्भने बड़ा क्रोध किया। वह अपने दोनों ओठोंको दाँतोंसे दबाकर रह गया। उसने क्रमशः चण्ड, मुण्ड तथा रक्तबीज नामक असुरोंको
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