भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

* उमासंहिता * ६११

वरदायिनी एवं कल्याणरूपिणी गौरी देवी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने समस्त देवताओंसे पूछा—'आपलोग यहाँ किसकी स्तुति करते हैं?' तब उन्हीं गौरीके शरीरसे एक कुमारी प्रकट हुई। वह सब देवताओंके देखते-देखते शिवशक्तिसे आदरपूर्वक बोली—'माँ! ये समस्त स्वर्गवासी देवता निशुम्भ और शुम्भ नामक प्रबल दैत्योंसे अत्यन्त पीड़ित हो अपनी रक्षाके लिये मेरी स्तुति करते हैं।' पार्वतीके शरीरकोशसे वह कुमारी निकली थी, इसलिये कौशिकी नामसे प्रसिद्ध हुई। कौशिकी ही साक्षात् शुम्भासुरका नाश करनेवाली सरस्वती हैं। उन्हींको उग्रतारा और महोग्रतारा भी कहा गया है। माताके शरीरसे स्वतः प्रकट होनेके कारण वे इस भूतलपर मातंगी भी कहलाती हैं। उन्होंने समस्त देवताओंसे कहा—'तुमलोग निर्भय रहो। मैं स्वतन्त्र हूँ। अतः किसीका सहारा लिये बिना ही तुम्हारा कार्य सिद्ध कर दूँगी।' ऐसा कहकर वे देवी तत्काल वहाँ अदृश्य हो गयीं।

एक दिन शुम्भ और निशुम्भके सेवक चण्ड और मुण्डने देवीको देखा। उनका मनोहर रूप नेत्रोंको सुख प्रदान करनेवाला था। उसे देखते ही वे मोहित हो सुध-बुध खोकर पृथ्वीपर गिर पड़े, फिर होशमें आनेपर वे अपने राजाके पास गये और आरम्भसे ही सारा वृत्तान्त बताकर बोले—'महाराज! हम दोनोंने एक अपूर्व सुन्दरी नारी देखी है, जो हिमालयके रमणीय शिखरपर रहती है और सिंहपर सवारी करती है।' चण्ड-मुण्डकी यह बात सुनकर महान् असुर शुम्भने देवीके पास सुग्रीव नामका अपना दूत भेजा और कहा—'दूत! हिमालयपर कोई अपूर्व सुन्दरी रहती है। तुम वहाँ जाओ और उससे मेरा संदेश कहकर उसे प्रयत्नपूर्वक यहाँ ले आओ।' यह आज्ञा पाकर दानवशिरोमणि सुग्रीव हिमालयपर गया और जगदम्बा महेश्वरीसे इस प्रकार बोला।

दूतने कहा—देवि! दैत्य शुम्भासुर अपने महान् बल और विक्रमके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसका छोटा भाई निशुम्भ भी वैसा ही है। शुम्भने मुझे तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा है। इसलिये मैं यहाँ आया हूँ। सुरेश्वरि! उसने जो संदेश दिया है, उसे इस समय सुनो! 'मैंने समरांगणमें इन्द्र आदि देवताओंको जीतकर उनके समस्त रत्नोंका अपहरण कर लिया है। यज्ञमें देवता आदिके दिये हुए देवभागका मैं स्वयं ही


नमो मुक्तिप्रदायिन्यै पराम्बायै नमो नमः। नमः समस्तसंसारोत्पत्तिस्थित्यन्तकारिके॥
कालिकारूपसम्पन्ने नमस्ताराकृते नमः। छिन्नमस्तास्वरूपायै श्रीविद्यायै नमोऽस्तु ते॥
भुवनेशि नमस्तुभ्यं नमस्ते भैरवाकृते। नमोऽस्तु बगलामुख्यै धूमावत्यै नमो नमः॥
नमस्त्रिपुरसुन्दर्यै मातङ्ग्यै ते नमो नमः। अजितायै नमस्तुभ्यं विजयायै नमो नमः॥
जयायै मङ्गलायै ते विलासिन्यै नमो नमः। दोग्ध्रीरूपे नमस्तुभ्यं नमो घोराकृतेऽस्तु ते॥
नमोऽपराजिताकारे नित्याकारे नमो नमः। शरणागतपालिन्यै रुद्राण्यै ते नमो नमः॥
नमो वेदान्तवेद्यायै नमस्ते परमात्मने। अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिकायै नमो नमः॥
(शि० पु० उ० सं० ४७। ३—१०)

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