शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 633, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* उमासंहिता * ६१९
देवीके द्वारा दुर्गमासुरका वध तथा उनके दुर्गा, शताक्षी, शाकम्भरी और भ्रामरी आदि नाम पड़नेका कारण
मुनियोंने कहा—महाप्राज्ञ सूतजी! हम सब लोग प्रतिदिन दुर्गाजीका चरित्र सुनना चाहते हैं। अतः आप और किसी अद्भुत लीलातत्त्वका हमारे समक्ष वर्णन कीजिये। सर्वज्ञशिरोमणे सूत! आपके मुखारविन्दसे नाना प्रकारकी सुधासदृश मधुर कथाएँ सुनते-सुनते हमारा मन कभी तृप्त नहीं होता।
सूतजी बोले—मुनियो! दुर्गम नामसे विख्यात एक असुर था, जो रुरुका महाबलवान् पुत्र था। उसने ब्रह्माजीके वरदानसे चारों वेदोंको अपने हाथमें कर लिया था तथा देवताओंके लिये अजेय बल पाकर उसने भूतलपर बहुत-से ऐसे उत्पात किये, जिन्हें सुनकर देवलोकमें देवता भी कम्पित हो उठे। वेदोंके अदृश्य हो जानेपर सारी वैदिक क्रिया नष्ट हो चली। उस समय ब्राह्मण और देवता भी दुराचारी हो गये। न कहीं दान होता था, न अत्यन्त उग्र तप किया जाता था; न यज्ञ होता था और न होम ही किया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीपर सौ वर्षोंतकके लिये वर्षा बंद हो गयी। तीनों लोकोंमें हाहाकार मच गया। सब लोग दुःखी हो गये। सबको भूख-प्यासका महान् कष्ट सताने लगा। कुँआ, बावड़ी, सरोवर, सरिताएँ और समुद्र भी जलसे रहित हो गये। समस्त वृक्ष और लताएँ भी सूख गयीं। इससे समस्त प्रजाओंके चित्तमें बड़ी दीनता आ गयी। उनके महान् दुःखको देखकर सब देवता महेश्वरी योगमायाकी शरणमें गये।
देवताओंने कहा—महामाये! अपनी सारी प्रजाकी रक्षा करो, रक्षा करो। अपने क्रोधको रोको, अन्यथा सब लोग निश्चय ही नष्ट हो जायेंगे। कृपासिन्धो! दीनबन्धो! जैसे शुम्भ नामक दैत्य, महाबली निशुम्भ, धूम्राक्ष, चण्ड, मुण्ड, महान् शक्तिशाली रक्तबीज, मधु, कैटभ तथा महिषासुरका तुमने वध किया था, उसी प्रकार इस दुर्गमासुरका शीघ्र ही संहार करो। बालकोंसे पग-पगपर अपराध बनता ही रहता है। केवल माताके सिवा संसारमें दूसरा कौन है, जो उस अपराधको सहन करता हो। देवताओं और ब्राह्मणोंपर जब-जब दुःख आता है, तब-तब शीघ्र ही अवतार लेकर तुम सब लोगोंको सुखी बनाती हो।
देवताओंकी यह व्याकुल प्रार्थना