भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

लक्ष्मी और सरस्वती आदि सम्पूर्ण शक्तियाँ तथा ये सकल कलाएँ मेरे अंशसे ही प्रकट हुई हैं। मेरे ही प्रभावसे तुमलोगोंने सम्पूर्ण दैत्योंपर विजय पायी है। मुझ सर्वविजयिनीको न जानकर तुमलोग व्यर्थ ही अपनेको सर्वेश्वर मान रहे हो। जैसे इन्द्रजाल करनेवाला सूत्रधार कठपुतलीको नचाता है, उसी प्रकार मैं ईश्वरी ही समस्त प्राणियोंको नचाती हूँ। मेरे भयसे हवा चलती है, मेरे भयसे ही अग्निदेव सबको जलाते हैं तथा मेरा भय मानकर ही लोकपालगण निरन्तर अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं। मैं सर्वथा स्वतन्त्र हूँ और अपनी लीलासे ही कभी देवसमुदायको विजयी बनाती हूँ तथा कभी दैत्योंको। मायासे परे जिस अविनाशी परात्पर धामका श्रुतियाँ वर्णन करती हैं, वह मेरा ही रूप है। सगुण और निर्गुण—ये मेरे दो प्रकारके रूप माने गये हैं। इनमेंसे प्रथम तो मायायुक्त है और दूसरा मायारहित। देवताओ! ऐसा जानकर गर्व छोड़ो और मुझ सनातनी प्रकृतिकी प्रेमपूर्वक आराधना करो।*

देवीका यह करुणायुक्त वचन सुन देवता भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरीकी स्तुति करने लगे—'जगदीश्वरि! क्षमा करो। परमेश्वरि! प्रसन्न होओ। मातः! ऐसी कृपा करो, जिससे फिर कभी हमें गर्व न हो।'

तबसे सब देवता गर्व छोड़ एकाग्रचित्त हो पूर्ववत् विधिपूर्वक उमादेवीकी आराधना करने लगे। ब्राह्मणो ! इस प्रकार मैंने तुमसे उमाके प्रादुर्भावका वर्णन किया है, जिसके श्रवणमात्रसे परमपदकी प्राप्ति होती है।

(अध्याय ४९)

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* उमोवाच—परं ब्रह्म परं ज्योतिः प्रणवद्वन्द्वरूपिणी। अहमेवास्मि सकलं मदन्यो नास्ति कश्चन॥
निराकारापि साकारा सर्वतत्त्वस्वरूपिणी। अप्रतर्क्यगुणा नित्या कार्यकारणरूपिणी॥
कदाचिद्दयिताकारा कदाचित्पुरुषाकृतिः। कदाचिदुभयाकारा सर्वाकाराहमीश्वरी॥
विरञ्चिः सृष्टिकर्ताहं जगन्माताहमच्युतः। रुद्रः संहारकर्ताहं सर्वविश्वविमोहिनी॥
कालिकाकमलावाणीमुखाः सर्वा हि शक्तयः। मदंशादेव संजातास्तथेमाः सकलाः कलाः॥
मत्प्रभावाज्जिताः सर्वे युष्माभिर्दितिनन्दनाः। तामविज्ञाय मां यूयं वृथा सर्वेशमानिनः॥
यथा दारुमयीं योषां नर्तयत्यैन्द्रजालिकः। तथैव सर्वभूतानि नर्तयाम्यहमीश्वरी॥
मद्भयाद् वाति पवनः सर्वं दहति हव्यभुक्। लोकपालाः प्रकुर्वन्ति स्वस्वकर्माण्यनारतम्॥
कदाचिद्देववर्गाणां कदाचिद्दितिजन्मनाम्। करोमि विजयं सम्यक् स्वतन्त्रा निजलीलया॥
अविनाशिपरं धाम मायातीतं परात्परम्। श्रुतयो वर्ण्यन्ते यत्तद्रूपं तु ममैव हि॥
सगुणं निर्गुणं चेति मद्रूपं द्विविधं मतम्। मायाशवलितं चैकं द्वितीयं तदनाश्रितम्॥
एवं विज्ञाय मां देवाः स्वं स्वं गर्वं विहाय च। भजत प्रणयोपेताः प्रकृतिं मां सनातनीम्॥
(शि० पु० उ० सं० ४९। २७—३८)