भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 639

* उमासंहिता * ६२५

करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें देवीके धामको जाता है।

श्रावण और भाद्रपदमासकी शुक्ला तृतीयाको जो विधिपूर्वक अम्बाका व्रत और पूजन करता है, वह इस लोकमें पुत्र, पौत्र एवं धन आदिसे सम्पन्न होकर सुख भोगता है तथा अन्तमें सब लोकोंसे ऊपर विराजमान उमालोकमें जाता है।

आश्विनमासके शुक्लपक्षमें नवरात्रव्रत करना चाहिये। उसके करनेपर सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो ही जाती हैं, इसमें संशय नहीं है। इस नवरात्र-व्रतके प्रभावका वर्णन करनेमें चतुरानन ब्रह्मा, पंचानन महादेव तथा षडानन कार्तिकेय भी समर्थ नहीं हैं; फिर दूसरा कौन समर्थ हो सकता है। मुनि-श्रेष्ठ! नवरात्र-व्रतका अनुष्ठान करके विरथके पुत्र राजा सुरथने अपने खोये हुए राज्यको प्राप्त कर लिया। अयोध्याके बुद्धिमान् नरेश ध्रुवसंधिकुमार सुदर्शनने इस नवरात्रके प्रभावसे ही राज्य प्राप्त किया, जो पहले उनके हाथसे छिन गया था। इस व्रतराजका अनुष्ठान और महेश्वरीकी आराधना करके समाधि वैश्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो मोक्षके भागी हुए थे। जो मनुष्य आश्विनमासके शुक्लपक्षमें विधिपूर्वक व्रत करके तृतीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी एवं चतुर्दशी तिथियोंको देवीका पूजन करता है, देवी शिवा निरन्तर उसके सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करती रहती हैं। जो कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुनमासके शुक्लपक्षमें तृतीयाको व्रत करता तथा लाल कनेर आदिके फूलों एवं सुगन्धित धूपोंसे मंगलमयी देवीकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मंगलको प्राप्त कर लेता है। स्त्रियोंको अपने सौभाग्यकी प्राप्ति एवं रक्षाके लिये सदा इस महान् व्रतका आचरण करना चाहिये तथा पुरुषोंको भी विद्या, धन एवं पुत्रकी प्राप्तिके लिये इसका अनुष्ठान करना चाहिये। इनके सिवा अन्य भी जो देवीको प्रिय लगनेवाले उमा-महेश्वर आदिके व्रत हैं, मुमुक्षु पुरुषोंको उनका भक्तिभावसे आचरण करना चाहिये।

यह उमासंहिता परम पुण्यमयी तथा शिवभक्तिको बढ़ानेवाली है। इसमें नाना प्रकारके उपाख्यान हैं। यह कल्याणमयी संहिता भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली है। जो इसे भक्तिभावसे सुनता या एकाग्रचित्त होकर सुनाता अथवा पढ़ता या पढ़ाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। जिसके घरमें सुन्दर अक्षरोंमें लिखी गयी यह संहिता विधिवत् पूजित होती है, वह सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेता है। उसे भूत, प्रेत और पिशाचादि दुष्टोंसे कभी भय नहीं होता। वह पुत्र-पौत्र आदि सम्पत्तिको अवश्य पाता है, इसमें संशय नहीं है। अतः शिवाकी भक्ति चाहनेवाले पुरुषोंको सदा इस परम पुण्यमयी रमणीय उमासंहिताका श्रवण एवं पाठ करना चाहिये।

(अध्याय ५१)

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॥ उमासंहिता सम्पूर्ण ॥
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