भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 640, कुल 850 में से

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पृष्ठ 640

कैलाससंहिता

ऋषियोंका सूतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्दसे प्रश्न—प्रणवार्थ-निरूपणके लिये अनुरोध

नमः शिवाय साम्बाय सगणाय ससूनवे।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे॥

जो प्रधान (प्रकृति) और पुरुषके नियन्ता तथा सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं, उन पार्वतीसहित शिवको उनके पार्षदों और पुत्रोंके साथ प्रणाम है।

ऋषि बोले—सूतजी! हमने अनेक आख्यानोंसे युक्त परम मनोहर उमासंहिता सुनी। अब आप शिवतत्त्वका ज्ञान बढ़ानेवाली कैलाससंहिताका वर्णन कीजिये।

व्यासजीने कहा—पुत्रो! शिवतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली दिव्य कैलास-संहिताका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमपूर्वक सुनो। तुम्हारे प्रति स्नेह होनेके कारण ही मैं तुम्हें यह प्रसंग सुना रहा हूँ।

इतना कहकर व्यासजीने काशीमें मुनियोंके तथा सूतजीके संवाद, व्यास-मुनि-संवाद, शिव-पार्वती-संवाद, शिवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति संन्यास-पद्धति, संन्यासाचार, संन्यास-मण्डल, संन्यास-पद्धतिन्यास, वर्णपूजन, प्रणवार्थ-पद्धति आदि प्रसंगोंका वर्णन करके पुनः ऋषिगण तथा सूतजीके मिलन एवं संवादकी अवतारणा करते हुए सूतजीके प्रति ऋषियोंके प्रश्नका यों वर्णन किया।

ऋषि बोले—महाभाग सूतजी! आप हमारे श्रेष्ठ गुरु हैं। अतः यदि आपका हमपर अनुग्रह हो तो हम आपसे एक प्रश्न पूछते हैं। श्रद्धालु शिष्योंपर आप-जैसे गुरुजन सदा स्नेह रखते हैं, इस बातको आपने इस समय हमें प्रत्यक्ष दिखा दिया। मुने! विरजाहोमके समय पहले आपने जो वामदेवका मत सूचित किया था, उसे हमने विस्तारपूर्वक नहीं सुना। अब हम बड़े आदर और श्रद्धाके साथ उसे सुनना चाहते हैं। कृपासिन्धो! आप प्रसन्नतापूर्वक उसका वर्णन करें।

ऋषियोंकी यह बात सुनकर सूतके शरीरमें रोमांच हो आया। उन्होंने गुरुके भी परम उत्कृष्ट गुरु महादेवजीको, त्रिभुवन-जननी महादेवी उमाको तथा गुरु व्यासको भी भक्तिपूर्वक नमस्कार करके मुनियोंको आह्लादित करते हुए गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहा।

सूतजी बोले—मुनियो! तुम्हारा कल्याण हो, तुम सब लोग सदा सुखी रहो। महाभाग महात्माओ! तुम भगवान् शिवके

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