भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 643

* कैलाससंहिता *
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उनकी परिक्रमा की और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर नतमस्तक हो बारंबार साष्टांग प्रणाम और परिक्रमा करनेके अनन्तर वे विनीतभावसे उनके पास खड़े हो गये। वामदेवजीके द्वारा किये गये इस परमार्थपूर्ण स्तोत्रको सुनकर महेश्वरपुत्र भगवान् स्कन्द बड़े प्रसन्न हुए। उस समय वे महासेन वामदेवजीसे बोले—'मुने! मैं तुम्हारी की हुई पूजा, स्तुति और भक्तिसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। आज मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ? तुम योगियोंमें प्रधान, सर्वथा परिपूर्ण और निःस्पृह हो। इस जगत्में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसके लिये तुम-जैसे वीतराग महर्षि याचना करें; तथापि धर्मकी रक्षा और सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये तुम-जैसे साधु-संत भूतलपर विचरते रहते हैं। ब्रह्मन्! यदि इस समय मुझसे कुछ सुनना हो तो कहो; मैं लोकपर अनुग्रह करनेके लिये उस विषयका वर्णन करूँगा।'

स्कन्दकी वह बात सुनकर महामुनि वामदेवने विनयावनत हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।

वामदेव बोले—भगवन्! आप परमेश्वर हैं। अलौकिक और लौकिक—सब प्रकारकी विभूतियोंके दाता हैं। सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सम्पूर्ण शक्तियोंको धारण करनेवाले और सबके स्वामी हैं। हम साधारण जीव हैं। आप परमेश्वरके समीप बोलनेकी शक्ति या बात करनेकी योग्यता हममें नहीं है; तथापि यह आपका अनुग्रह है कि आप मुझसे बात करते हैं। महाप्राज्ञ! मैं कृतार्थ हूँ। कणमात्र विज्ञानसे प्रेरित हो आपके समक्ष अपना प्रश्न रख रहा हूँ। मेरे इस अपराधको आप क्षमा करेंगे! प्रणव सबसे उत्तम मन्त्र है। वह साक्षात् परमेश्वरका वाचक है। पशुओं (जीवों)-के पाश (बन्धन)-को छुड़ानेवाले भगवान् पशुपति ही उसके वाच्यार्थ हैं। 'ओमितीदं सर्वम्' (तै० उ० १।८।१)—ओंकार ही यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला समस्त जगत् है, यह सनातन श्रुतिका कथन है। 'ओमिति ब्रह्म' (तै० उ० १।८।१) अर्थात् 'ॐ यह ब्रह्म है' तथा 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म' (माण्डू० २)—'यह सब-का-सब ब्रह्म ही है।' इत्यादि बातें भी श्रुतियोंद्वारा कही गयी हैं। इस प्रकार मैंने समष्टि तथा व्यष्टिभावसे प्रणवार्थका श्रवण किया है। तात्पर्य यह है कि समष्टि और व्यष्टि—सभी पदार्थ प्रणवके ही अर्थ हैं, प्रणवके द्वारा सबका प्रतिपादन होता है—यह बात मैंने सुन रखी है। महासेन! मुझे कभी आप-जैसा गुरु नहीं मिला है, अतः कृपा करके आप प्रणवके अर्थका प्रतिपादन कीजिये। उपदेशकी विधिसे तथा सदाचारपरम्पराको ध्यानमें रखकर आप हमें प्रणवार्थका उपदेश दें।

मुनिके इस प्रकार पूछनेपर स्कन्दने प्रणवस्वरूप, अड़तीस श्रेष्ठ कलाओंद्वारा


ब्रह्मादिदेवमुनिकिन्नरगीयमानगाथाविशेषशुचिचिन्तितकीर्तिधाम्ने। वृन्दारकामलकिरीटविभूषणस्रक्पूज्याभिरामपदपङ्कज ते नमोऽस्तु॥
इति स्कन्दस्तवं दिव्यं वामदेवेन भाषितम्। यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम्॥
महाप्रज्ञाकरं ह्येतच्छिवभक्तिविवर्धनम्। आयुरारोग्यधनकृत्सर्वकामप्रदं सदा॥
(शि० पु० कै० सं० ११। २२–३५)