भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 648

६३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पात्रम्'१ इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। वहाँ स्थित हुए देवता आदिका चतुर्थ्यन्त उच्चारण करके अक्षतसहित जल ले 'स्वाहा' बोलकर उनके लिये अन्न अर्पित करे और अन्तमें 'न मम' इस वाक्यका उच्चारण करे।२ सर्वत्र—माता आदिके लिये भी अन्न-अर्पणकी यही विधि है।

अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करे—
यत्पादपद्मस्मरणाद् यस्य नामजपादपि।
न्यूनं कर्म भवेत् पूर्णं तं वन्दे साम्बमीश्वरम्॥
'जिनके चरणारविन्दोंके चिन्तन एवं नाम-जपसे न्यूनतापूर्ण अथवा अधूरा कर्म भी पूरा हो जाता है, उन साम्ब सदाशिव (उमामहेश्वर)-की मैं वन्दना करता हूँ।'

इसका पाठ करके कहे—'ब्राह्मणो ! मेरे द्वारा किया हुआ यह नान्दीमुख श्राद्ध यथोक्तरूपसे परिपूर्ण हो, यह आप कहें।' ऐसी प्रार्थनाके साथ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद ले और अपने हाथमें लिया हुआ जल छोड़ दे। फिर पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर प्रणाम करे और उठकर ब्राह्मणोंसे कहे—'यह अन्न अमृतरूप हो।' फिर उदारचेता साधक हाथ जोड़ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रार्थना करे। श्रीरुद्रसूक्तका चमकाध्यायसहित पाठ करे। पुरुषसूक्तकी भी विधिवत् आवृत्ति करे। मनमें भगवान् सदाशिवका ध्यान करते हुए 'ईशानः सर्वविद्यानाम्' इत्यादि पाँच मन्त्रोंका जप करे। जब ब्राह्मणलोग भोजन कर चुकें, तब रुद्रसूक्तका पाठ समाप्तकर क्षमा-प्रार्थनापूर्वक उन ब्राह्मणोंको पुनः 'अमृतापिधानमसि स्वाहा' यह मन्त्र पढ़कर उत्तरापोशनके लिये जल दे।

तदनन्तर हाथ-पैर धो आचमन करके पिण्डदानके स्थानपर जाय। वहाँ पूर्वाभिमुख बैठकर मौनभावसे तीन बार प्राणायाम करे। इसके बाद 'मैं 'नान्दीमुख' श्राद्धका अंगभूत पिण्डदान करूँगा' ऐसा संकल्प करके दक्षिणसे लेकर उत्तरकी ओर नौ रेखाएँ खींचे और उन रेखाओंपर क्रमशः बारह-बारह पूर्वाग्र कुश बिछाये। फिर दक्षिणकी ओरसे देवता आदिके पाँच३ स्थानोंपर चुपचाप अक्षत और जल छोड़े। पितृवर्गके तीनों४ स्थानोंपर क्रमशः अक्षत, जल छोड़कर नवें मातामहादिके स्थानपर भी मार्जन करे५। तत्पश्चात् 'अत्र पितरो मादयध्वम्' कहकर देवादिके पाँचों स्थानोंपर क्रमशः अक्षत, जल छोड़े। इस प्रकार अवनेजन दे पाँचों स्थानोंपर प्रत्येकके लिये तीन-तीन पिण्ड दे६। (इसी


१-पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखेऽमृतेऽमृतं जुहोमि स्वाहा' यह पूरा मन्त्र है।
२-वाक्यका प्रयोग इस प्रकार है—'ॐ सत्यवसुसंज्ञकेभ्यो विश्वेभ्यो देवेभ्यो नान्दीमुखेभ्यः स्वाहा न मम' इत्यादि।
३-देव, ऋषि, दिव्य मनुष्य और भूत—इनके पाँच स्थान समझने चाहिये।
४-पिता आदि, माता आदि तथा आत्मा आदि—ये तीन स्थान हैं।
५-उस समय इस प्रकार कहे—'शुन्धन्तां ब्रह्माणो नान्दीमुखाः शुन्धन्तां विष्णवो नान्दीमुखाः शुन्धन्तां महेश्वरा नान्दीमुखाः।' यह प्रथम रेखापर मार्जन करते समय कहे। इस प्रकार अन्य रेखाओंपर भी कहता चले।
६-पिण्डदान-वाक्य इस प्रकार है—'ब्रह्मणे नान्दीमुखाय स्वाहा', 'विष्णवे नान्दीमुखाय स्वाहा।' इत्यादि।