शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कैलाससंहिता * ६३५
तरह शेष स्थानोंपर भी करे।)। अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार सभी पिण्ड पृथक्-पृथक् देने चाहिये। फिर पितरोंके साद्गुण्यके लिये जल-अक्षत अर्पित करे। तत्पश्चात् अपने हृदयकमलमें सदा शिवदेवका ध्यान करे और पूर्वोक्त 'यत्पादपद्मस्मरणात्…………' इत्यादि श्लोकका पुनः पाठ करके ब्राह्मणोंको नमस्कारपूर्वक यथाशक्ति दक्षिणा दे। फिर त्रुटियोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करके देवता-पितरोंका विसर्जन करे। पिण्डोंका उत्सर्ग करके उन्हें गौओंको खानेके लिये दे दे अथवा जलमें डाल दे। तत्पश्चात् पुण्याह-वाचन करके स्वजनोंके साथ भोजन करे।
दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर शुद्ध बुद्धिवाला साधक उपवासपूर्वक व्रत रखे। काँख और उपस्थके बालोंको छोड़कर शेष सभी बाल मुँड़वा दे, परंतु शिखाके सात-आठ बाल अवश्य बचा ले। फिर स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहनकर शुद्ध हो दो बार आचमन करके मौन हो विधिवत् भस्म धारण करे। पुण्याहवाचन करके उससे अपने-आपका प्रोक्षण कर बाहर-भीतरसे शुद्ध हो होम, द्रव्य और आचार्यकी दक्षिणाके द्रव्यको छोड़कर शेष सभी द्रव्य महेश्वरार्पणबुद्धिसे ब्राह्मणों और विशेषतः शिवभक्तोंको बाँट दे। तदनन्तर गुरुरूपधारी शिवके लिये वस्त्र आदिकी दक्षिणा दे, पृथ्वीपर दण्डवत् प्रणाम करके डोरा, कौपीन, वस्त्र तथा दण्ड आदि जो धोकर पवित्र किये गये हों, धारण करे। तदनन्तर होमद्रव्य और समिधा आदि लेकर समुद्र या नदीके तटपर, पर्वतपर, शिवालयमें, वनमें अथवा गोशालामें किसी उत्तम स्थानका विचार करके वहाँ बैठ जाय और आचमन करके पहले मानसिक जप करे। फिर 'ॐ नमो ब्रह्मणे' इस मन्त्रका तीन बार जप करके 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इस मन्त्रका पाठ करे। इसके बाद 'अथ महाव्रतम्', 'अग्निर्वै देवानाम़्', 'एतस्य समाम्नायम्', 'ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ', 'अग्न आयाहि वीतये' तथा 'शं नो देवी रभीष्टये' इत्यादिका पाठ करे। तत्पश्चात् 'म य र स त ज भ न ल ग' 'पञ्चसंवत्सरमयम्', 'समाम्नायः समाम्नातः', 'अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि', 'वृद्धिरादैच्', 'अथातो धर्मजिज्ञासा,' 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'—इन सबका पाठ करे। तदनन्तर यथासम्भव वेद, पुराण आदिका स्वाध्याय करे। इसके बाद ॐ ब्रह्मणे नमः', 'ॐ इन्द्राय नमः', 'ॐ सूर्याय नमः', 'ॐ सोमाय नमः', 'ॐ प्रजापतये नमः', 'ॐ आत्मने नमः', 'ॐ अन्तरात्मने नमः', 'ॐ ज्ञानात्मने नमः', 'ॐ परमात्मने नमः' इत्यादि रूपसे ब्रह्मा आदि शब्दोंके आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'नमः' लगाकर उनके चतुर्थ्यन्त रूपका जप करे। इसके बाद तीन मुट्ठी सत्तू लेकर प्रणवके उच्चारणपूर्वक तीन बार खाय और प्रणवसे ही दो बार आचमन करके नाभिका स्पर्श करे। उस समय आगे बताये जानेवाले शब्दोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः स्वाहा' जोड़कर उनका उच्चारण करे। यथा—'ॐ आत्मने नमः स्वाहा',
धर्मसिन्धुकारने प्रत्येक देवताके लिये दो-दो पिण्डका विधान किया है, अतः नौ स्थानोंके २७ देवताओंके लिये ५४ पिण्ड होंगे।