भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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६३६* संक्षिप्त शिवपुराण *

'ॐ अन्तरात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ ज्ञानात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ परमात्मने नमः स्वाहा', 'ॐ प्रजापतये नमः स्वाहा' इति। तदनन्तर पृथक्-पृथक् प्रणवमन्त्रसे$^१$ ही दूध-दही मिले हुए घीको (अथवा केवल जलको) तीन बार चाटकर पुनः दो बार आचमन करे। इसके बाद मनको स्थिर करके सुस्थिर आसनपर पूर्वाभिमुख बैठकर शास्त्रोक्त विधिसे तीन बार प्राणायाम करे।
(अध्याय १२)


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संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि—गणपति-पूजन, होम, तत्त्व-शुद्धि, सावित्री-प्रवेश, सर्वसंन्यास और दण्ड-धारण आदिका प्रकार

स्कन्द कहते हैं—वामदेव! तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्नान करके साधक अपने मनको वशमें रखते हुए गन्ध, पुष्प और अक्षत आदि पूजा-द्रव्योंको ले आये और नैर्ऋत्यकोणमें देवपूजित विघ्नराज गणेशकी पूजा करे। 'गणानां त्वा' इत्यादि मन्त्रसे विधिपूर्वक गणेशजीका आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् उनके स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये। उनकी अंगकान्ति लाल है, शरीर विशाल है। सब प्रकारके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने करकमलोंमें क्रमशः पाश, अंकुश, अक्षमाला तथा वर नामक मुद्राएँ धारण कर रखी हैं। इस प्रकार आवाहन और ध्यान करनेके पश्चात् शम्भुपुत्र गजाननकी पूजा करके खीर, पूआ, नारियल और गुड़ आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदन करे। तत्पश्चात् ताम्बूल आदि दे उन्हें संतुष्ट करके नमस्कार करे और अपने अभीष्ट कार्यकी निर्विघ्न पूर्तिके लिये प्रार्थना करे।

तदनन्तर अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार औपासनाग्निमें आज्यभागान्त$^२$ हवन करके अग्निदेवतासम्बन्धी यज्ञविषयक स्थालीपाक होम करना चाहिये। इसके बाद 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे पूर्णाहुति होम करके हवनका कार्य समाप्त करे। तत्पश्चात् आलस्यरहित हो अपराह्नकालतक गायत्री-मन्त्रका जप करता रहे। तदनन्तर स्नान करके सायंकालकी संध्योपासना तथा सायंकालिक उपासनासम्बन्धी नित्य-होम आदि करके मौन हो गुरुकी आज्ञा ले चरु पकाये। फिर अग्निमें समिधा, चरु और घीकी रुद्रसूक्तसे और सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् आहुति दे। अग्निमें उमासहित महेश्वरकी भावना करे और गौरीदेवीका चिन्तन करते हुए


$^१$-धर्मसिन्धुकारने इसके लिये तीन मन्त्र लिखे हैं। प्रथम बार चाटकर कहे 'त्रिवृदसि', द्वितीय बार 'प्रवृदसि' और तृतीय बार 'विवृदसि'।
$^२$-कुशकण्डिकाके अनन्तर अग्निमें जो चार आहुतियाँ दी जाती हैं, उनमें प्रथम दो को 'आघार' और अन्तिम दोको 'आज्यभाग' कहते हैं। प्रजापति और इन्द्रके उद्देश्यसे 'आघार' तथा अग्नि और सोमके उद्देश्यसे 'आज्यभाग' दिया जाता है।