भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 651, कुल 850 में से

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पृष्ठ 651

* कैलाससंहिता * ६३७

‘गौरीर्मिमाय’$^१$ इस मन्त्रसे एक सौ आठ बार होम करके ‘अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा’ इस मन्त्रसे एक बार आहुति दे।

इस प्रकार मन्त्रसे हवन करनेके पश्चात् विद्वान् पुरुष अग्निसे उत्तरमें एक आसनपर बैठे, जिसमें नीचे कुशा, उसके ऊपर मृगचर्म और उसके ऊपर वस्त्र बिछा हुआ हो। ऐसे सुखद आसनपर बैठकर मौन-भावसे सुस्थिरचित्त हो जागरणपूर्वक ब्राह्ममुहूर्त्त आनेतक गायत्रीका जप करता रहे। इसके बाद स्नान करे। जो जलसे स्नान करनेमें असमर्थ हो, वह भस्मसे ही विधि-पूर्वक स्नान करे फिर उस अग्निपर ही चरु पकाकर उसे घीसे तर करे। उसे उतारकर अग्निसे उत्तर दिशामें कुशपर रखे। पुनः घीसे चरुको मिश्रित करे। इसके बाद व्याहृति-मन्त्र, रुद्रसूक्त तथा सद्योजातादि पाँच मन्त्रोंका जप करे और इनके द्वारा एक-एक आहुति भी दे। चित्तको भगवान् शिवके चरणारविन्दमें लगाकर प्रजापति, इन्द्र, विश्वेदेव और ब्रह्माके लिये भी एक-एक आहुति दे। इन सबके नामके आदिमें ॐ और अन्तमें ‘नमः स्वाहा’ जोड़कर चतुर्थ्यन्त उच्चारण करे (यथा—ॐ प्रजापतये नमः स्वाहा—इत्यादि)। तत्पश्चात् पुण्याहवाचन कराकर ‘अग्नये स्वाहा’ इस मन्त्रसे अग्निके मुखमें आहुति देनेतकका कार्य सम्पन्न करे। फिर ‘प्राणाय स्वाहा’ इत्यादि पाँच मन्त्रोंद्वारा घृतसहित चरुकी आहुति दे। इसके बाद ‘अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा’ बोलकर एक आहुति और दे। तदनन्तर फिर रुद्रसूक्त तथा ईशानादि पाँच मन्त्रोंका जप करे। महेशादि चतुर्व्यूह मन्त्रोंका भी पाठ करे। इस प्रकार तन्त्र-होम करके अपनी गृह्यशाखामें बतायी हुई पद्धतिके अनुसार उन-उन देवताओंके उद्देश्यसे बुद्धिमान् पुरुष सांग होम करे। इस तरह जो अग्निमुख आदि कर्मतन्त्रको प्रवर्तित किया गया है, उसका निर्वाह करके विरजा होम करे। छब्बीस तत्त्वरूप इस शरीरमें छिपे हुए तत्त्व-समुदायकी शुद्धिके लिये विरजा होम करना चाहिये।

उस समय यह कहे कि ‘मेरे शरीरमें जो ये तत्त्व हैं, इन सबकी शुद्धि हो।’ उस प्रसंगमें आत्मतत्त्वकी शुद्धिके लिये आरुणकेतुक मन्त्रोंका पाठ करते हुए पृथ्‍वी आदि तत्त्वसे लेकर पुरुषतत्त्वपर्यन्त क्रमशः सभी तत्त्वोंकी शुद्धिके निमित्त घृतयुक्त चरुका होम करे तथा शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए मौन रहे$^२$। पृथ्‍वी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पृथिव्यादिपंचक कहलाते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये शब्दादिपंचक हैं। वाक्, पाणि, पाद, पायु तथा उपस्थ— ये वागादिपंचक हैं। श्रोत्र, नेत्र, नासिका, रसना, और त्वक्—ये श्रोत्रादिपंचक हैं।


१-पूरा मन्त्र इस प्रकार है—गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् स्वाहा। (ऋग्वेद मं० १ सू० १६४। ४१)
२-तत्त्वशुद्धिके लिये पृथक्-पृथक् वाक्य-योजना करनी चाहिये, जैसे पृथ्‍वी आदिके लिये— ‘पृथिव्यापस्तेजो वाय्वाकाशो मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासँस्वाहा’ इतना बोलकर समिधा, चरु और आज्यकी चालीस-चालीस आहुतियाँ दे। इसी तरह सभी तत्त्वोंके नाम लेकर वाक्य-योजना करे।

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