भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 652

६३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शिर, पार्श्व, पृष्ठ और उदर—ये चार हैं। इन्हींमें जंघाको भी जोड़ ले। फिर त्वक् आदि सात धातुएँ हैं। प्राण, अपान आदि पाँच वायुओंको प्राणादिपंचक कहा गया है। अन्नमयादि पाँचों कोशोंको कोशपंचक कहते हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय।) इनके सिवा मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, ख्याति, संकल्प, गुण, प्रकृति और पुरुष हैं। भोक्तापनको प्राप्त हुए पुरुषके लिये भोगकालमें जो पाँच अन्तरंग साधन हैं, उन्हें तत्त्वपंचक कहा गया है। उनके नाम ये हैं—नियति, काल, राग, विद्या और कला। ये पाँचों मायासे उत्पन्न हैं। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्'। इस श्रुतिमें प्रकृति ही माया कही गयी है। उसीसे ये तत्त्व उत्पन्न हुए हैं, इसमें संशय नहीं है। कालका स्वभाव ही 'नियति' है, ऐसा श्रुतिका कथन है। ये नियति आदि जो पाँच तत्त्व हैं, इन्हींको 'पंचकंचुक' कहते हैं। इन पाँच तत्त्वोंको न जाननेवाला विद्वान् भी मूढ़ ही कहा गया है।

नियति प्रकृतिसे नीचे है और यह पुरुष प्रकृतिसे ऊपर है। जैसे कौएकी एक ही आँख उसके दोनों गोलकोंमें घूमती रहती है, उसी प्रकार पुरुष प्रकृति और नियति दोनोंके पास रहता है। यह विद्यातत्त्व कहा गया है। शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिव—इन पाँचोंको शिवतत्त्व कहते हैं। ब्रह्मन्! 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस श्रुतिके वाक्यसे यह शिवतत्त्व ही प्रतिपादित हुआ है। मुनीश्वर! पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त जो तत्त्वसमूह है, उसमेंसे प्रत्येकको क्रमशः अपने-अपने कारणमें लीन करते हुए उसकी शुद्धि करो। १ पृथिव्यादिपञ्चक, २ शब्दादिपञ्चक, ३ वागादिपञ्चक, ४ श्रोत्रादिपञ्चक, ५ शिरादिपञ्चक, ६ त्वगादिधातुसप्तक, ७ प्राणादिपञ्चक, ८ अन्नमयादिकोशपञ्चक, ९ मन आदि पुरुषान्त तत्त्व, १० नियत्यादि तत्त्वपञ्चक (अथवा पञ्चकञ्चुक) और ११ शिवतत्त्व-पञ्चक—ये ग्यारह वर्ग हैं; इन एकादश-वर्गसम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें 'परस्मै शिवज्योतिषे इदं न मम' इस वाक्यका उच्चारण करे*। इसके द्वारा अपने उद्देश्यका त्याग बताया गया है।

इसके बाद 'विविद्या' तथा 'कर्षोत्क' सम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें अर्थात् 'विविद्यायै स्वाहा', 'कर्षोत्काय स्वाहा' इनके अन्तमें स्वत्वत्यागके लिये 'व्यापकाय परमात्मने शिवज्योतिषे विश्वभूतघसनोत्सुकाय परस्मै देवाय इदं न मम' इसका उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'उत्तिष्ठब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे। उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवाः स चा' इस मन्त्रके अन्तमें 'विश्वरूपाय पुरुषाय ॐ स्वाहा' बोलकर स्वत्वत्यागके लिये 'लोकतत्रयव्यापिने परमात्मने शिवायेदं न मम' का उच्चारण करे। तदनन्तर अपनी शाखामें बतायी हुई विधिसे पहले तन्त्रकर्मका सम्पादन करके घृतमिश्रित चरुका प्राशन एवं आचमन करनेके पश्चात्पुरोधा आचार्यको सुवर्ण आदिसे सम्पन्न समुचित दक्षिणा दे।


* यथा—'पृथिव्यादिपञ्चकं मे शुध्यतां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासःस्वाहा—पृथिव्यादिपञ्चकाय परस्मै शिवज्योतिषे इदं न मम।'