भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 653

* कैलाससंहिता * ६३९

फिर ब्रह्माका विसर्जन करके प्रातःकालिक उपासनासम्बन्धी नित्य होम करे। इसके बाद मनुष्य 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः' इस मन्त्रका जप करे।$^१$ तत्पश्चात्—'या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्'$^२$ इत्यादि मन्त्रोंसे हाथको अग्निमें तपाकर उस अग्निको अद्वैतधामस्वरूप अपने आत्मामें आरोपित करे। तदनन्तर प्रातःकालकी संध्योपासना करके सूर्योपस्थानके पश्चात् जलाशयमें जाकर नाभितक जलके भीतर प्रवेश करे। वहाँ प्रसन्नतापूर्वक मनको स्थिरकर उत्सुकतापूर्वक वेदमन्त्रोंका जप करे।$^३$

जो अग्निहोत्री हो, वह स्थापित अग्निमें 'प्राजापत्येष्टि'$^४$ करे तथा वेदोक्त वैश्वानर स्थालीपाक होम करके उसमें अपना सब कुछ दान कर दे। पूर्वोक्तरूपसे अग्निका आत्मामें आरोप करके ब्राह्मण घरसे निकल जाय। मुनीश्वर! फिर वह साधक निम्नांकितरूपसे 'सावित्रीप्रवेश' करे—

ॐ भूः सावित्रीं प्रवेशयामि, ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम्, ॐ भुवः सावित्रीं प्रवेशयामि$^५$ भर्गो देवस्य धीमहि, ॐ स्वः सावित्रीं प्रवेशयामि, धियो यो नः प्रचोदयात्, ॐ भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रवेशयामि, तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

—इन वाक्योंका प्रेमपूर्वक उच्चारण करे और चित्तको चंचल न होने दे।


१-धर्मसिन्धुकारने कहा है कि 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः' इस मन्त्रसे अग्निका उपस्थान करके उसमें काष्ठमय यज्ञपात्रोंको जला दे। यदि पात्र तैजस धातुके हों तो उन्हें आचार्यको दे दे।
पूरा मन्त्र और उसका अर्थ इस प्रकार है—
सं मा सिञ्चन्तु मरुतः समिन्द्रः सं बृहस्पतिः। सं मायमग्निः सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन चायुष्मन्तं करोतु मा।
अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि—ये सभी देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें। ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञानरूपी धन तथा साधनकी शक्तिसे सम्पन्न करें। साथ ही मुझको दीर्घजीवी भी बनायें।

२-पूरे मन्त्र और अर्थ यों हैं—
या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्। अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्ये नर्या पुरूणि॥
यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वां योनिम्। जातवेदो भुव आजायमानः सक्षय एहि॥
'हे अग्निदेव! जो तुम्हारा यज्ञिय (यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला) स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से मनुष्योपयोगी विशुद्ध धन (साधन-सम्पत्ति)-की सृष्टि करते हुए आत्मारूपसे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ। तुम यज्ञरूप होकर अपने कारणरूप यज्ञमें पहुँच जाओ। हे जातवेदा ! तुम पृथिवीसे उत्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पधारो।'

३-वहाँ जल लेकर उसे 'आशुः शिशानः' इस सूक्तसे अभिमन्त्रित करके 'सर्वाभ्यो देवताभ्यः स्वाहा' ऐसा कहकर छोड़ दे। फिर संन्यासका संकल्प ले तीन बार जलांजलि दे। उसके मन्त्र इस प्रकार हैं—
ॐ एष ह वा अग्निः सूर्यः प्राणं गच्छ स्वाहा॥ १॥ ॐ स्वाम योनिं गच्छ स्वाहा॥ २॥ ॐ आपो वै गच्छ स्वाहा॥ ३॥ (धर्मसिन्धु)

४-'यदिष्टं यच्च पूर्तं यच्चापद्यनापदि प्रजापतौ तन्मनसि जुहोमि। विमुक्तोऽहं देवकिल्बिषात्स्वाहा' ऐसा कह घीकी आहुति दे—'इदं प्रजापतये न मम' कहकर त्याग करे। यही प्राजापत्येष्टि है।

५-धर्मसिन्धुमें 'प्रविशामि' पाठ है।