शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिर, पार्श्व, पृष्ठ और उदर—ये चार हैं। इन्हींमें जंघाको भी जोड़ ले। फिर त्वक् आदि सात धातुएँ हैं। प्राण, अपान आदि पाँच वायुओंको प्राणादिपंचक कहा गया है। अन्नमयादि पाँचों कोशोंको कोशपंचक कहते हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय।) इनके सिवा मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार, ख्याति, संकल्प, गुण, प्रकृति और पुरुष हैं। भोक्तापनको प्राप्त हुए पुरुषके लिये भोगकालमें जो पाँच अन्तरंग साधन हैं, उन्हें तत्त्वपंचक कहा गया है। उनके नाम ये हैं—नियति, काल, राग, विद्या और कला। ये पाँचों मायासे उत्पन्न हैं। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्'। इस श्रुतिमें प्रकृति ही माया कही गयी है। उसीसे ये तत्त्व उत्पन्न हुए हैं, इसमें संशय नहीं है। कालका स्वभाव ही 'नियति' है, ऐसा श्रुतिका कथन है। ये नियति आदि जो पाँच तत्त्व हैं, इन्हींको 'पंचकंचुक' कहते हैं। इन पाँच तत्त्वोंको न जाननेवाला विद्वान् भी मूढ़ ही कहा गया है।
नियति प्रकृतिसे नीचे है और यह पुरुष प्रकृतिसे ऊपर है। जैसे कौएकी एक ही आँख उसके दोनों गोलकोंमें घूमती रहती है, उसी प्रकार पुरुष प्रकृति और नियति दोनोंके पास रहता है। यह विद्यातत्त्व कहा गया है। शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति और शिव—इन पाँचोंको शिवतत्त्व कहते हैं। ब्रह्मन्! 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस श्रुतिके वाक्यसे यह शिवतत्त्व ही प्रतिपादित हुआ है। मुनीश्वर! पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त जो तत्त्वसमूह है, उसमेंसे प्रत्येकको क्रमशः अपने-अपने कारणमें लीन करते हुए उसकी शुद्धि करो। १ पृथिव्यादिपञ्चक, २ शब्दादिपञ्चक, ३ वागादिपञ्चक, ४ श्रोत्रादिपञ्चक, ५ शिरादिपञ्चक, ६ त्वगादिधातुसप्तक, ७ प्राणादिपञ्चक, ८ अन्नमयादिकोशपञ्चक, ९ मन आदि पुरुषान्त तत्त्व, १० नियत्यादि तत्त्वपञ्चक (अथवा पञ्चकञ्चुक) और ११ शिवतत्त्व-पञ्चक—ये ग्यारह वर्ग हैं; इन एकादश-वर्गसम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें 'परस्मै शिवज्योतिषे इदं न मम' इस वाक्यका उच्चारण करे*। इसके द्वारा अपने उद्देश्यका त्याग बताया गया है।
इसके बाद 'विविद्या' तथा 'कर्षोत्क' सम्बन्धी मन्त्रोंके अन्तमें अर्थात् 'विविद्यायै स्वाहा', 'कर्षोत्काय स्वाहा' इनके अन्तमें स्वत्वत्यागके लिये 'व्यापकाय परमात्मने शिवज्योतिषे विश्वभूतघसनोत्सुकाय परस्मै देवाय इदं न मम' इसका उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'उत्तिष्ठब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे। उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवाः स चा' इस मन्त्रके अन्तमें 'विश्वरूपाय पुरुषाय ॐ स्वाहा' बोलकर स्वत्वत्यागके लिये 'लोकतत्रयव्यापिने परमात्मने शिवायेदं न मम' का उच्चारण करे। तदनन्तर अपनी शाखामें बतायी हुई विधिसे पहले तन्त्रकर्मका सम्पादन करके घृतमिश्रित चरुका प्राशन एवं आचमन करनेके पश्चात्पुरोधा आचार्यको सुवर्ण आदिसे सम्पन्न समुचित दक्षिणा दे।
* यथा—'पृथिव्यादिपञ्चकं मे शुध्यतां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासःस्वाहा—पृथिव्यादिपञ्चकाय परस्मै शिवज्योतिषे इदं न मम।'
* कैलाससंहिता * ६३९
फिर ब्रह्माका विसर्जन करके प्रातःकालिक उपासनासम्बन्धी नित्य होम करे। इसके बाद मनुष्य 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः' इस मन्त्रका जप करे।$^१$ तत्पश्चात्—'या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्'$^२$ इत्यादि मन्त्रोंसे हाथको अग्निमें तपाकर उस अग्निको अद्वैतधामस्वरूप अपने आत्मामें आरोपित करे। तदनन्तर प्रातःकालकी संध्योपासना करके सूर्योपस्थानके पश्चात् जलाशयमें जाकर नाभितक जलके भीतर प्रवेश करे। वहाँ प्रसन्नतापूर्वक मनको स्थिरकर उत्सुकतापूर्वक वेदमन्त्रोंका जप करे।$^३$
जो अग्निहोत्री हो, वह स्थापित अग्निमें 'प्राजापत्येष्टि'$^४$ करे तथा वेदोक्त वैश्वानर स्थालीपाक होम करके उसमें अपना सब कुछ दान कर दे। पूर्वोक्तरूपसे अग्निका आत्मामें आरोप करके ब्राह्मण घरसे निकल जाय। मुनीश्वर! फिर वह साधक निम्नांकितरूपसे 'सावित्रीप्रवेश' करे—
ॐ भूः सावित्रीं प्रवेशयामि, ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम्, ॐ भुवः सावित्रीं प्रवेशयामि$^५$ भर्गो देवस्य धीमहि, ॐ स्वः सावित्रीं प्रवेशयामि, धियो यो नः प्रचोदयात्, ॐ भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रवेशयामि, तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
—इन वाक्योंका प्रेमपूर्वक उच्चारण करे और चित्तको चंचल न होने दे।
१-धर्मसिन्धुकारने कहा है कि 'सं मा सिञ्चन्तु मरुतः' इस मन्त्रसे अग्निका उपस्थान करके उसमें काष्ठमय यज्ञपात्रोंको जला दे। यदि पात्र तैजस धातुके हों तो उन्हें आचार्यको दे दे।
पूरा मन्त्र और उसका अर्थ इस प्रकार है—
सं मा सिञ्चन्तु मरुतः समिन्द्रः सं बृहस्पतिः। सं मायमग्निः सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन चायुष्मन्तं करोतु मा।
अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि—ये सभी देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें। ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञानरूपी धन तथा साधनकी शक्तिसे सम्पन्न करें। साथ ही मुझको दीर्घजीवी भी बनायें।
२-पूरे मन्त्र और अर्थ यों हैं—
या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्। अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्ये नर्या पुरूणि॥
यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वां योनिम्। जातवेदो भुव आजायमानः सक्षय एहि॥
'हे अग्निदेव! जो तुम्हारा यज्ञिय (यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला) स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से मनुष्योपयोगी विशुद्ध धन (साधन-सम्पत्ति)-की सृष्टि करते हुए आत्मारूपसे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ। तुम यज्ञरूप होकर अपने कारणरूप यज्ञमें पहुँच जाओ। हे जातवेदा ! तुम पृथिवीसे उत्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पधारो।'
३-वहाँ जल लेकर उसे 'आशुः शिशानः' इस सूक्तसे अभिमन्त्रित करके 'सर्वाभ्यो देवताभ्यः स्वाहा' ऐसा कहकर छोड़ दे। फिर संन्यासका संकल्प ले तीन बार जलांजलि दे। उसके मन्त्र इस प्रकार हैं—
ॐ एष ह वा अग्निः सूर्यः प्राणं गच्छ स्वाहा॥ १॥ ॐ स्वाम योनिं गच्छ स्वाहा॥ २॥ ॐ आपो वै गच्छ स्वाहा॥ ३॥ (धर्मसिन्धु)
४-'यदिष्टं यच्च पूर्तं यच्चापद्यनापदि प्रजापतौ तन्मनसि जुहोमि। विमुक्तोऽहं देवकिल्बिषात्स्वाहा' ऐसा कह घीकी आहुति दे—'इदं प्रजापतये न मम' कहकर त्याग करे। यही प्राजापत्येष्टि है।
५-धर्मसिन्धुमें 'प्रविशामि' पाठ है।
६४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
उस समय गायत्रीका इस प्रकार ध्यान करे—ये भगवती गायत्री साक्षात् भगवान् शंकरके आधे शरीरमें वास करनेवाली हैं। इनके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। ये पंद्रह नेत्रोंसे प्रकाशित होती हैं। नूतन रत्नमय किरीटसे जगमगाती हुई चन्द्रलेखा इनके मस्तकको विभूषित करती है। इनकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल है। ये शुभलक्षणा देवी अपने दस हाथोंमें दस प्रकारके आयुध धारण करती हैं। हार, केयूर ( बाजूबंद ), कड़े, करधनी और नूपुर आदि आभूषणोंसे इनके अंग विभूषित हैं। इन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है। इनके सभी आभूषण रत्ननिर्मित हैं। विष्णु, ब्रह्मा, देवता, ऋषि तथा गन्धर्वराज और मनुष्य ही सदा इनका सेवन करते हैं। ये सर्वव्यापिनी शिवा सदाशिवदेवकी मनोहारिणी धर्मपत्नी हैं। सम्पूर्ण जगत्की माता, तीनों लोकोंकी जननी, त्रिगुणमयी, निर्गुणा तथा अजन्मा हैं। इस प्रकार गायत्रीदेवीके स्वरूपका चिन्तन करते हुए शुद्धबुद्धिवाला पुरुष ब्राह्मणत्व आदि प्रदान करनेवाली अजन्मा आदि देवी त्रिपदा गायत्रीका जप करे।
गायत्री व्याहृतियोंसे उत्पन्न हुई हैं और उन्हींमें लीन होती हैं। व्याहृतियाँ प्रणवसे प्रकट हुई हैं और प्रणवमें ही लयको प्राप्त होती हैं। प्रणव सम्पूर्ण वेदोंका आदि है। वह शिवका वाचक, मन्त्रोंका राजाधिराज, महाबीजस्वरूप और श्रेष्ठ मन्त्र है। शिव प्रणव है और प्रणव शिव कहा गया है; क्योंकि वाच्य और वाचकमें अधिक भेद नहीं होता। इसी महामन्त्रको काशीमें शरीर-त्याग करनेवाले जीवोंके मरणकालमें उन्हें सुनाकर भगवान् शिव परम मोक्ष प्रदान करते हैं। इसलिये श्रेष्ठ यति अपने हृदयकमलके मध्यमें विराजमान एकाक्षर प्रणवरूप परम कारण शिवदेवकी उपासना करते हैं। दूसरे मुमुक्षु, धीर एवं विरक्त लौकिक पुरुष भी मनसे विषयोंका परित्याग करके प्रणवरूप परम शिवकी उपासना करते हैं।
इस प्रकार गायत्रीका शिववाचक प्रणवमें लय करके ‘अहं वृक्षस्य रेरिवा’$^{१}$ इन अनुवाकका जप करे। तत्पश्चात् ‘ यश्छन्दसामृषभो:’ (तैत्तिरीय० १ । ४ । १) —इस अनुवाकको आरम्भसे लेकर......... ‘श्रुतं मे गोपाय’$^{२}$ तक पढ़कर कहे—‘दारैषणायाश्च
१—अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्। (तैत्तिरीय० १।१०।१)
‘मैं संसारवृक्षका उच्छेद करनेवाला हूँ, मेरी कीर्ति पर्वतके शिखरकी भाँति उन्नत है; अन्नोत्पादक शक्तिसे युक्त सूर्यमें जैसे उत्तम अमृत है, उसी प्रकार मैं भी अतिशय पवित्र अमृतस्वरूप हूँ तथा मैं प्रकाशयुक्त धनका भण्डार हूँ, परमानन्दमय अमृतसे अभिषिक्त तथा श्रेष्ठबुद्धिवाला हूँ—इस प्रकार यह त्रिशंकु ऋषिका अनुभव किया हुआ वैदिक प्रवचन है।’
२—यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः श्रुतं मे गोपाय।
- कैलाससंहिता * ६४१
वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थितोऽहम्' अर्थात् 'मैं स्त्रीकी कामना, धनकी कामना और लोकोंमें ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ गया हूँ।' मुने! इस वाक्यका मन्द, मध्यम और उच्चस्वरसे क्रमशः तीन बार उच्चारण करे। तत्पश्चात् सृष्टि, स्थिति और लयके क्रमसे पहले प्रणवमन्त्रका उद्धार करके फिर क्रमशः इन वाक्योंका उच्चारण करे—'ॐ भूः संन्यस्तं मया', 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया', 'ॐ सुवः संन्यस्तं मया', 'ॐ भूर्भुवः सुवः संन्यस्तं मया'$^१$ इन वाक्योंका मन्द, मध्यम और उच्चस्वरसे हृदयमें सदाशिवका ध्यान करते हुए सावधान चित्तसे उच्चारण करे। तदनन्तर 'अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा' (मेरी ओरसे सब प्राणियोंको अभयदान दिया गया)—ऐसा कहते हुए पूर्वदिशामें एक अंजलि जल लेकर छोड़े। इसके बाद शिखाके शेष बालोंको हाथसे उखाड़ डाले और यज्ञोपवीतको निकालकर जलके साथ हाथमें ले इस प्रकार कहे—'ॐ भूः समुद्रं गच्छ स्वाहा' यों कहकर उसका जलमें ही होम कर दे। फिर 'ॐ भूः संन्यस्तं मया', 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया', 'ॐ सुवः संन्यस्तं मया'—इस प्रकार तीन बार कहकर तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। फिर जलाशयके किनारे आकर वस्त्र और कटिसूत्रको भूमिपर त्याग दे तथा उत्तर या पूर्वकी ओर मुँह करके सात पदसे कुछ अधिक चले। कुछ दूर जानेपर आचार्य उससे कहे, 'ठहरो, ठहरो भगवन्! लोक-व्यवहारके लिये कौपीन और दण्ड स्वीकार करो।' यों कह आचार्य अपने हाथसे ही उसे कटिसूत्र और कौपीन देकर गेरुआ वस्त्र भी अर्पित करे। तत्पश्चात् संन्यासी जब उससे अपने शरीरको ढककर दो बार आचमन कर ले तब आचार्य शिष्यसे कहे—'इन्द्रस्य वज्रोऽसि' यह मन्त्र बोलकर दण्ड ग्रहण करो। तब वह इस मन्त्रको पढ़े और 'सखा मा गोपायौजः सखा योऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय'$^२$—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए दण्डकी प्रार्थना करके उसे हाथमें ले। (तत्पश्चात् प्रणव या गायत्रीका उच्चारण करके कमण्डलु ग्रहण करे।)
तदनन्तर भगवान् शिवके चरणारविन्दका चिन्तन करते हुए गुरुके निकट जा वह तीन बार पृथ्वीमें लोटकर दण्डवत् प्रणाम करे। उस समय वह अपने मनको पूर्णतया
'जो वेदोंमें सर्वश्रेष्ठ है, सर्वरूप है और अमृतस्वरूप वेदोंसे प्रधानरूपमें प्रकट हुआ है, वह सबका स्वामी परमेश्वर मुझे धारणायुक्त बुद्धिसे सम्पन्न करे। हे देव! मैं आपकी कृपासे अमृतमय परमात्माको अपने हृदयमें धारण करनेवाला बन जाऊँ। मेरा शरीर विशेष फुर्तीला—सब प्रकारसे रोगरहित हो और मेरी जिह्वा अतिशय मधुमती (मधुरभाषिणी) हो जाय। मैं दोनों कानोंद्वारा अधिक सुनता रहूँ। (हे प्रणव ! तू) लौकिक बुद्धिसे ढकी हुई परमात्माकी निधि है। तू मेरे सुने हुए उपदेशकी रक्षा कर।'
१-मैंने भूलोकका संन्यास (पूर्णतः त्याग) कर दिया। मैंने भुवः (अन्तरिक्ष) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैंने स्वर्गलोकका भी सर्वथा त्याग कर दिया। मैंने भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक—इन तीनोंको भलीभाँति त्याग दिया।
२-हे दण्ड! तुम मेरे सखा (सहायक) हो, मेरी रक्षा करो। मेरे ओज (प्राणशक्ति)-की रक्षा करो। तुम वही मेरे सखा हो, जो इन्द्रके हाथमें वज्रके रूपमें रहते हो। तुमने ही वज्ररूपसे आघात करके वृत्रासुरका संहार किया है। तुम मेरे लिये कल्याणमय बनो। मुझमें जो पाप हो, उसका निवारण करो।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 A
६४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
संयममें रखे। फिर धीरेसे उठकर प्रेमपूर्वक अपने गुरुकी ओर देखते हुए हाथ जोड़ उनके चरणोंके समीप खड़ा हो जाय। संन्यासदीक्षा-विषयक कर्म आरम्भ होनेके पहले ही शुद्ध गोबर लेकर आँवले बराबर उसके गोले बना ले और सूर्यकी किरणोंसे ही उन्हें सुखाये। फिर होम आरम्भ होनेपर उन गोलोंको होमाग्नि के बीचमें डाल दे। होम समाप्त होनेपर उन सबको संग्रह करके सुरक्षित रखे। तदनन्तर दण्डधारणके पश्चात् गुरु विरजाग्निजनित उस श्वेत भस्मको लेकर उसीको शिष्यके अंगोंमें लगाये अथवा उसे लगानेकी आज्ञा दे। उसका क्रम इस प्रकार है। 'ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्म सर्वꣳ ह वा इदं भस्म मन एतानि चक्षूꣳषि' इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर ईशानादि पाँच मन्त्रोंद्वारा उस भस्मका शिष्यके अंगोंसे स्पर्श कराकर उसे मस्तकसे लेकर पैरोंतक सर्वांगमें लगानेके लिये दे दे। शिष्य उस भस्मको विधिपूर्वक हाथमें लेकर 'त्र्यायुषम्०'$^१$, तथा 'त्र्यम्बकम्०'$^२$, इन दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढ़ते हुए ललाट आदि अंगोंमें क्रमशः त्रिपुण्ड्र धारण करे।
तत्पश्चात् श्रेष्ठ शिष्य अपने हृदय-कमलमें विराजमान उमासहित भगवान् शंकरका भक्तियुक्त चित्तसे ध्यान करे। फिर गुरु शिष्यके मस्तकपर हाथ रखकर उसके दाहिने कानमें ऋषि, छन्द और देवतासहित प्रणवका उपदेश करे। इसके बाद कृपा करके प्रणवके अर्थका भी बोध कराये। श्रेष्ठ गुरुको चाहिये कि वह प्रणवके छः प्रकारके अर्थका ज्ञान कराते हुए उसके बारह भेदोंका उपदेश दे। तत्पश्चात् शिष्य दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर गुरुको साष्टांग प्रणाम करे और सदा उनके अधीन रहे, उनकी आज्ञाके बिना दूसरा कोई कार्य न करे। गुरुकी आज्ञासे शिष्य वेदान्तके तात्पर्यके अनुसार सगुण-निर्गुणभेदसे शिवके ज्ञानमें तत्पर रहे। गुरु अपने उसी शिष्यके द्वारा श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक जपके अन्तमें प्रातःकालिक आदि नियमोंका अनुष्ठान करवाये। कैलासप्रस्तर नामक मण्डलमें शिवके द्वारा प्रतिपादित मार्गके अनुसार शिष्य वहीं रहकर शिवपूजन करे। यदि गुरुके आदेशके अनुसार वह प्रतिदिन वहीं रहकर मंगलमय देवता शिवकी पूजा करनेमें असमर्थ हो तो उनसे अर्घासहित स्फटिकमय शिवलिंग ग्रहण कर ले और कहीं भी रहकर नित्य उसका पूजन किया करे। वह गुरुके निकट शपथ खाते हुए इस तरह प्रतिज्ञा करे—'मेरे प्राण चले जायें, यह अच्छा है। मेरा सिर काट लिया जाय, यह भी अच्छा है; परंतु मैं भगवान् त्रिलोचनकी पूजा किये बिना कदापि भोजन नहीं कर सकता।' ऐसा कहकर सुदृढ़ चित्तवाला शिष्य मनमें शिवकी भक्ति लिये गुरुके निकट तीन बार शपथ खाय और तभीसे मनमें उत्साह रखकर उत्तम भक्तिभावसे पंचावरण-पूजनकी पद्धतिके अनुसार प्रतिदिन महादेवजीकी पूजा करे। (अध्याय १३)
०
१- त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्। यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम्॥ (यजुर्वेद ३।६२)
२- त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (यजुर्वेद ३।६०)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 B
* कैलाससंहिता * ६४३
प्रणवके अर्थोंका विवेचन
वामदेवजी बोले—भगवान् षडानन! सम्पूर्ण विज्ञानमय अमृतके सागर! समस्त देवताओंके स्वामी महेश्वरके पुत्र! प्रणतार्तिके भंजन कार्तिकेय! आपने कहा है कि प्रणवके छः प्रकारके अर्थोंका परिज्ञान अभीष्ट वस्तुको देनेवाला है। यह छः प्रकारके अर्थोंका ज्ञान क्या है? प्रभो! वे छः प्रकारके अर्थ कौन-कौनसे हैं और उनका परिज्ञान क्या वस्तु है? उनके द्वारा प्रतिपाद्य वस्तु क्या है और उन अर्थोंका परिज्ञान होनेपर कौन-सा फल मिलता है? पार्वतीनन्दन! मैंने जो-जो बातें पूछी हैं, उन सबका सम्यक्-रूपसे वर्णन कीजिये।
सुब्रह्मण्य स्कन्द बोले—मुनिश्रेष्ठ! तुमने जो कुछ पूछा है, उसे आदरपूर्वक सुनो। समष्टि और व्यष्टिभावसे महेश्वरका परिज्ञान ही प्रणवार्थका परिज्ञान है। मैं इस विषयको विस्तारके साथ कहता हूँ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! मेरे इस प्रवचनसे उन छः प्रकारके अर्थोंकी एकताका भी बोध होगा। पहला मन्त्ररूप अर्थ है, दूसरा यन्त्रभावित अर्थ है, तीसरा देवताबोधक अर्थ है, चौथा प्रपंचरूप अर्थ है, पाँचवाँ अर्थ गुरुके रूपको दिखानेवाला है और छठा अर्थ शिष्यके स्वरूपका परिचय देनेवाला है। इस प्रकार ये छः अर्थ बताये गये। मुनिश्रेष्ठ! उन छहों अर्थोंमें जो मन्त्ररूप अर्थ है, उसको तुम्हें बताता हूँ। उसका ज्ञान होनेमात्रसे मनुष्य महाज्ञानी हो जाता है। प्रणवमें वेदोंने पाँच अक्षर बताये हैं, पहला आदिस्वर—'अ', दूसरा पाँचवाँ स्वर—'उ', तीसरा पंचम वर्ग पवर्गका अन्तिम अक्षर 'म', उसके बाद चौथा अक्षर बिन्दु और पाँचवाँ अक्षर नाद। इनके सिवा दूसरे वर्ण नहीं हैं। यह समष्टिरूप वेदादि (प्रणव) कहा गया है। नाद सब अक्षरोंकी समष्टिरूप है; बिन्दु-युक्त जो चार अक्षर हैं, वे व्यष्टिरूपसे शिववाचक प्रणवमें प्रतिष्ठित हैं।
विद्वन्! अब यन्त्ररूप या यन्त्रभावित अर्थ सुनो। वह यन्त्र ही शिवलिंगरूपमें स्थित है। सबसे नीचे पीठ (अर्घा) लिखे। उसके ऊपर पहला स्वर अकार लिखे। उसके ऊपर उकार अंकित करे और उसके भी ऊपर पवर्गका अन्तिम अक्षर मकार लिखे। मकारके ऊपर अनुस्वार और उसके भी ऊपर अर्धचन्द्राकार नाद अंकित करे। इस तरह यन्त्रके पूर्ण हो जानेपर साधकका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होता है। इस प्रकार यन्त्र लिखकर उसे प्रणवसे ही वेष्टित करे। उस प्रणवसे ही प्रकट होनेवाले नादके द्वारा नादका अवसान समझे।
मुने! अब मैं देवतारूप तीसरे अर्थको बताऊँगा, जो सर्वत्र गूढ़ है। वामदेव! तुम्हारे स्नेहवश भगवान् शंकरके द्वारा प्रतिपादित उस अर्थका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। 'सद्योजातं प्रपद्यामि' यहाँसे आरम्भ करके 'सदाशिवोम्' तक जो पाँच* मन्त्र हैं, श्रुतिने प्रणवको इन सबका वाचक कहा है। इन्हें ब्रह्मरूपी पाँच सूक्ष्म देवता समझना चाहिये। इन्हींका शिवकी मूर्तिके रूपमें भी विस्तारपूर्वक वर्णन है। शिवका वाचक
* इन पाँचों मन्त्रोंका उल्लेख पहले हो चुका है।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 C
६४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मन्त्र शिवमूर्तिका भी वाचक है; क्योंकि मूर्ति और मूर्तिमान्में अधिक भेद नहीं है। ‘ईशान मुकुटोपेतः’ इस श्लोकसे आरम्भ करके पहले इन मन्त्रोंद्वारा शिवके विग्रहका प्रतिपादन किया जा चुका है। अब उनके पाँच मुखोंका वर्णन सुनो। पंचम मन्त्र ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्’ को आदि मानकर वहाँसे लेकर ऊपरके ‘सद्योजात’ मन्त्रतक क्रमशः एक चक्रमें अंकित करे। फिर ‘सद्योजात’ से लेकर ‘ईशान’ मन्त्रतक क्रमशः उसी चक्रमें अंकित करे। ये ही पाँच भगवान् शिवके पाँच मुख बताये गये हैं। पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो ब्रह्मरूप चार मन्त्र हैं, वे ही महेश्वरदेवके चतुर्व्यूह पदपर प्रतिष्ठित हैं। ‘ईशान’ मन्त्र सद्योजातादि पाँचों मन्त्रोंका समष्टिरूप है। मुने! पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो चार मन्त्र हैं, वे ईशानदेवके व्यष्टिरूप हैं।
इसे अनुग्रहमय चक्र कहते हैं। यही पंचार्थका कारण है। यह सूक्ष्म, निर्विकार, अनामय परब्रह्मस्वरूप है। अनुग्रह भी दो प्रकारका है। एक तो तिरोभाव आदि पाँच$^१$ कृत्योंके अन्तर्गत है, दूसरा जीवोंको कार्यकारण आदिके बन्धनोंसे मुक्ति देनेमें समर्थ है। यह दोनों प्रकारका अनुग्रह सदाशिवका ही द्विविध कृत्य कहा गया है। मुने! अनुग्रहमें भी सृष्टि आदि कृत्योंका योग होनेसे भगवान् शिवके पाँच कृत्य माने गये हैं। इन पाँचों कृत्योंमें भी सद्योजात आदि देवता प्रतिष्ठित बताये गये हैं। वे पाँचों परब्रह्मस्वरूप तथा सदा ही कल्याणदायक हैं। अनुग्रहमय चक्र शान्त्यतीत$^२$ कलारूप है। सदाशिवसे अधिष्ठित होनेके कारण उसे परम पद कहते हैं। शुद्ध अन्तःकरणवाले संन्यासियोंको मिलनेयोग्य पद यही है। जो सदाशिवके उपासक हैं और जिनका चित्त प्रणवोपासनामें संलग्न है, उन्हें भी इसी पदकी प्राप्ति होती है। इसी पदको पाकर मुनीश्वरगण उन ब्रह्मरूपी महादेवजीके साथ प्रचुर दिव्य भोगोंका उपभोग करके महाप्रलयकालमें शिवकी समताको प्राप्त हो जाते हैं। वे मुक्त जीव फिर कभी संसारसागरमें नहीं गिरते।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे॥
(मुण्डक० ३।२।६)
—इस सनातन श्रुतिने इसी अर्थका प्रतिपादन किया है। शिवका ऐश्वर्य भी यह समष्टिरूप ही है। अथर्ववेदकी श्रुति भी कहती है कि वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न है। सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करनेकी शक्ति सदाशिवमें ही बतायी गयी है। चमकाध्यायके पदसे यह सूचित होता है कि शिवसे बढ़कर दूसरा कोई पद नहीं है। ब्रह्मपंचकके विस्तारको ही प्रपंच कहते हैं। इन पाँच ब्रह्ममूर्तियोंसे ही निवृत्ति आदि पाँच कलाएँ हुई हैं। वे सब-की-सब सूक्ष्मभूत स्वरूपिणी होनेसे कारणरूपमें विख्यात हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वामदेव! स्थूल-रूपमें प्रकट जो यह जगत्-प्रपंच है, इसको जिसने पाँच रूपोंद्वारा व्याप्त कर रखा है, वह ब्रह्म अपने उन पाँचों रूपोंके साथ ब्रह्मपंचक नाम धारण करता है। मुनिश्रेष्ठ!
$^१$सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह—ये परमेश्वरके पाँच कृत्य हैं।
$^२$कलाएँ पाँच हैं—निवृत्तिकला, प्रतिष्ठाकला, विद्याकला, शान्तिकला तथा शान्त्यतीताकला।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 D
* कैलाससंहिता * ६४५
पुरुष, श्रोत्र, वाणी, शब्द और आकाश—इन पाँचोंको ब्रह्मने ईशानरूपसे व्याप्त कर रखा है। मुनीश्वर! प्रकृति, त्वचा, पाणि, स्पर्श और वायु—इन पाँचको ब्रह्मने ही पुरुषरूपसे व्याप्त कर रखा है। अहंकार, नेत्र, पैर, रूप और अग्नि—ये पाँच अघोररूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं। बुद्धि, रसना, पायु, रस और जल—ये वामदेवरूपी ब्रह्मसे नित्य व्याप्त रहते हैं। मन, नासिका, उपस्थ, गन्ध और पृथिवी—ये पाँच सद्योजातरूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं। इस प्रकार यह जगत् पञ्चब्रह्मस्वरूप है। यन्त्ररूपसे बताया गया जो शिववाचक प्रणव है, वह नादपर्यन्त पाँचों वर्णोंका समष्टिरूप है तथा बिन्दुयुक्त जो चार वर्ण हैं, वे प्रणवके व्यष्टिरूप हैं। शिवके उपदेश किये हुए मार्गसे उत्कृष्ट मन्त्राधिराज शिवरूपी प्रणवका पूर्वोक्त यन्त्ररूपसे चिन्तन करना चाहिये। (अध्याय १४)
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शैवदर्शनके अनुसार शिवतत्त्व, जगत्-प्रपंच और जीवतत्त्वके विषयमें विशद विवेचन तथा शिवसे जीव और जगत्की अभिन्नताका प्रतिपादन
तदनन्तर उत्तम श्रेष्ठ पद्धतिका वर्णन करके सृष्टि, स्थिति और संहार—सबको शक्तिमान् शिवकी लीला बतलाते हुए वामदेवजीके पूछनेपर स्कन्दने कहा—मुने! कर्मास्तित्त्वसे लेकर जो विस्तृत शास्त्रवाद है अर्थात् कर्मसत्ताके प्रतिपादक कर्मफलवादसे आरम्भ करके शास्त्रोंमें जो विविध विषयोंका विशद विवेचन है, वह ज्ञान प्रदान करनेवाला है; अतः ज्ञानवान् पुरुषको विवेकपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये। तुमने जिन शिष्योंको उपदेश दिया है, उनमेंसे कौन तुम्हारे समान है? वे अधम शिष्य आज भी अन्यान्य शास्त्रोंमें भटक रहे हैं। अनीश्वरवादी दर्शनोंके चक्करमें पड़कर मोहित हो रहे हैं। छः मुनियोंने उन्हें शाप दे रखा है; क्योंकि पहले वे शिवकी निन्दा किया करते थे। अतः उनकी बातें नहीं सुननी चाहिये; क्योंकि वे अन्यथावादी (शिव-शास्त्रके विपरीत बात करनेवाले) हैं। यहाँ पाँच* अवयवोंसे युक्त अनुमानके प्रयोगके लिये भी अवकाश है ही। उत्तम
* प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन—ये अनुमानके पाँच अवयव हैं। 'पर्वतो वह्निमान्' (पर्वतपर आग है)—यह प्रतिज्ञा है। 'धूमवत्त्वात् (क्योंकि वहाँ धूम दिखायी देता है)—यह हेतु है। 'जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य रहती है, जैसे रसोईघर'—यह उदाहरण है। 'यतोऽयं धूमवान्' (चूँकि यह पर्वत धूमवान् है)—यह उपनय है। 'अतः अग्निमान्' (अतः अग्निसे युक्त है) यह निगमन है। इसी तरह ईश्वरके लिये भी अनुमान होता है—यथा—'क्षित्यङ्कुरादिकं कर्तृजन्यम्' (पृथिवी तथा अंकुर आदि किसी कर्ताद्वारा उत्पन्न हुए हैं)—यह प्रतिज्ञा है। 'कार्यत्वात्' (क्योंकि ये कार्य हैं—) यह हेतु है। 'यत्-यत् कार्यं तत्तत् कर्तृजन्यं यथा घटः कुम्भकारजन्यः' (जो-जो कार्य है, वह किसी-न-किसी कर्तासे उत्पन्न होता है, जैसे घड़ा कुम्भकारसे उत्पन्न होता है—यह उदाहरण हुआ। 'यत इदं कार्यम्' (चूँकि ये पृथ्वी आदि कार्य हैं)—यह उपनय हुआ। 'अतः कर्तृजन्यम्' (इसलिये कर्तासे उत्पन्न हुए हैं)—यह निगमन हुआ। पृथ्वी आदि कार्य हम-जैसे लोगोंसे उत्पन्न हुआ है, यह कहना सम्भव नहीं; अतः इसका कोई विलक्षण कर्ता है, वही सर्वशक्तिमान् ईश्वर है।
६४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
व्रतका पालन करनेवाले वामदेव! जैसे धूमका दर्शन होनेसे लोग अनुमानद्वारा पर्वतपर अग्निकी सत्ताका प्रतिपादन करते हैं, उसी प्रकार इस प्रत्यक्ष प्रपंचके दर्शनरूप हेतुका अवलम्बन करके परमेश्वर परमात्माको जाना जा सकता है, इसमें संशय नहीं है।
यह विश्व स्त्री-पुरुषरूप है, ऐसा प्रत्यक्ष ही देखा जाता है। छः कोशरूप जो शरीर है, उसमें आदिके तीन माताके अंशसे उत्पन्न हुए हैं और अन्तिम तीन पिताके अंशसे—यह श्रुतिका कथन है। इस प्रकार सभी शरीरोंमें स्त्री-पुरुषभावको जाननेवाले लोग हैं। मुने! विद्वानोंने परमात्मामें भी स्त्री-पुरुषभावको जाना है। श्रुति कहती है, परब्रह्म परमात्मा सत्, चित् और आनन्दरूप है। असत् प्रपंचको निवृत्त करनेवाला शब्द ही सद्रूप कहा जाता है। चित्-शब्दसे जड जगत्की निवृत्ति की जाती है। यद्यपि सत्-शब्द तीनों लिंगोंमें विद्यमान है, तथापि यहाँ परब्रह्म परमात्माके अर्थमें पुँल्लिंग सत्-शब्दको ही ग्रहण करना चाहिये। वह सत्-शब्द प्रकाशका वाचक है। 'सन् प्रकाशः'—सन्-शब्द स्पष्टरूपसे प्रकाशका वाचक है। परमात्मामें जो सत्ता या प्रकाशरूपता है, वह उसके पुरुषभावको सूचित करती है। ज्ञान शब्दका पर्यायवाची जो चित्-शब्द है, वह स्त्रीलिंग है अर्थात् परमात्मामें चिद्रूपता उसके स्त्रीभावको सूचित करती है। प्रकाश और चित्—ये दोनों जगत्के कारणभावको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार सच्चिदात्मा परमेश्वर भी जब जगत्के कारणभावको प्राप्त होते हैं तब उन एकमात्र परमात्मामें ही 'शिव' भाव और 'शक्ति'भावका भेद किया जाता है। जब तेल और बत्तीमें मलिनता होती है, तब उसके प्रकाशमें भी मलिनता आ जाती है। चिताकी आग आदिमें अशिवता और मलिनता स्पष्ट देखी जाती है। अतः मलिनता आदि आरोपित वस्तु है, उसका निवर्तक होनेके कारण परमात्माके 'शिवत्व' का ही श्रुतिके द्वारा प्रतिपादन किया गया है।
जीवके आश्रित जो चिच्छक्ति है, वह सदा दुर्बल होती है। उसकी निवृत्तिके लिये ही परमात्मामें सार्वकालिक सर्वशक्तिमत्ता विद्यमान है। ईश्वर बलवान् हैं, शक्तिमान् हैं—यह व्यवहार देखा जाता है। महामुने वामदेव! लोक और वेदमें भी सदा ही परमात्माकी शिवरूपता और शक्तिरूपताका साक्षात्कार कराया गया है। शिव और शक्तिके संयोगसे निरन्तर आनन्द प्रकट रहता है, अतः मुने! उस आनन्दको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे ही पापरहित मुनि शिवमें मन लगाकर निरामय शिव (परम कल्याण एवं परमानन्द)-को प्राप्त हुए हैं। <u>उपनिषदोंमें शिव और शक्तिको ही सर्वात्मा एवं ब्रह्म कहा गया है।</u> ब्रह्म-शब्दसे बृंहिधात्वर्थगत व्यापकता एवं सर्वात्मताका ही प्रतिपादन होता है। शम्भु नामक विग्रहमें बृंहणत्व और बृहत्त्व (व्यापकता एवं विशालता) नित्य विद्यमान है। सद्योजातादि पंचब्रह्ममय शिवविग्रहमें विश्वकी प्रतीति ब्रह्म-शब्दसे ही कही गयी है।
वामदेव! 'हंसः' पदको उलट देनेसे 'सोऽहम्' पद बनता है। उसमें प्रणवका प्राकट्य कैसे होता है यह तुम्हारे स्नेहवश मैं बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। 'सोऽहम्' पदमेंसे सकार और हकार नामक
* कैलाससंहिता * ६४७
व्यंजनोंको त्याग देनेसे स्थूल 'ओम्' शब्द बच रहता है, जो परमात्माका वाचक है! तत्त्वदर्शी मुनि कहते हैं कि उसे महामन्त्ररूप जानना चाहिये। उसमें जो सूक्ष्म महामन्त्र है, उसका उद्धार मैं तुम्हें बता रहा हूँ। 'हंसः' पदमें तीन अक्षर हैं—'ह, अ, स', इन तीनोंमें जो 'अ' है, वह पंद्रहवें (अनुस्वार) और सोलहवें (विसर्ग)-के साथ है। सकारके साथ जो 'अ' है, वह विसर्गसहित है; वह यदि सकारके साथ ही उठकर 'हं' के आदिमें चला जाय तो 'हंसः' के विपरीत 'सोऽहम्' यह महामन्त्र हो जायगा। इसमें जो सकार है, वह शिवका वाचक है। अर्थात् शिव ही सकारके अर्थ माने गये हैं। शक्त्यात्मक शिव ही इस महामन्त्रके वाच्यार्थ हैं, यह विद्वानोंका निर्णय है। गुरु जब शिष्यको इस महामन्त्रका उपदेश देते हैं, तब 'सोऽहम्' पदसे उसको शक्त्यात्मक शिवका ही बोध कराना अभीष्ट होता है। अर्थात् वह यह अनुभव करे कि 'मैं शक्त्यात्मक शिवरूप हूँ।' इस प्रकार जब यह महामन्त्र जीवपरक होता है अर्थात् जीवकी शिवरूपताका बोध कराता है, तब पशु (जीव) अपनेको शक्त्यात्मक एवं शिवका अंश जानकर शिवके साथ अपनी एकता सिद्ध हो जानेसे शिवकी समताका भागी हो जाता है।
अब श्रुतिके 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस वाक्यमें जो 'प्रज्ञानम्' पद आया है, उसके अर्थको दिखाया जा रहा है। 'प्रज्ञान' शब्द 'चैतन्य'-का पर्याय है, इसमें संशय नहीं है। मुने! शिवसूत्रमें यह कहा गया है कि 'चैतन्यम् आत्मा' अर्थात् आत्मा (ब्रह्म या परमात्मा) चैतन्यरूप है। चैतन्य-शब्दसे यह सूचित होता है कि जिसमें विश्वका सम्पूर्ण ज्ञान तथा स्वतन्त्रतापूर्वक जगत्के निर्माणकी क्रिया स्वभावतः विद्यमान है, उसीको आत्मा या परमात्मा कहा गया है। इस प्रकार मैंने यहाँ शिवसूत्रोंकी व्याख्या ही की है।
'ज्ञानं बन्धः' यह दूसरा शिवसूत्र है। इसमें पशुवर्ग (जीवसमुदाय)-का लक्षण बताया गया है। इस सूत्रमें आदि पद 'ज्ञानम्' के द्वारा किंचिन्मात्र ज्ञान और क्रियाका होना ही जीवका लक्षण कहा गया है। यह ज्ञान और क्रिया पराशक्तिका प्रथम स्पन्दन है। कृष्णयजुर्वेदकी श्वेताश्वतर शाखाका अध्ययन करनेवाले विद्वानोंने 'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च'* इस श्रुतिके द्वारा इसी पराशक्तिका प्रसन्नतापूर्वक स्तवन किया है। भगवान् शंकरकी तीन दृष्टियाँ मानी गयी हैं—ज्ञान, क्रिया और इच्छारूप। ये तीनों दृष्टियाँ जीवोंके मनमें स्थित हो इन्द्रियज्ञानगोचर देहमें प्रवेश करके जीवरूप हो सदा जानती और करती हैं। अतः यह दृष्टित्रयरूप जीव आत्मा (महेश्वर)-का स्वरूप ही है, ऐसा निश्चित सिद्धान्त है।
अब मैं जगत्प्रपंचके साथ प्रणवकी एकताका बोध करनेवाले प्रपंचार्थका वर्णन
* यह श्रुति श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।८) की है। इसका पूरा पाठ इस प्रकार है—
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥
देह और इन्द्रियसे उनका है सम्बन्ध नहीं कोई। अधिक कहाँ, उनके सम भी तो दीख रहा न कहीं कोई॥
ज्ञानरूप, बलरूप, क्रियामय उनकी पराशक्ति भारी। विविध रूपमें सुनी गयी है, स्वाभाविक उनमें सारी॥
६४८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
करूँगा। 'ओमितीदं सर्वम्' (तैत्तिरीय० १।८।१) अर्थात् यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला समस्त जगत् ओंकार है—यह सनातन श्रुतिका कथन है। इससे प्रणव और जगत्की एकता सूचित होती है। 'तस्माद्वा' (तैत्तिरीय० २।१) इस वाक्यसे आरम्भ करके तैत्तिरीय श्रुतिने संसारकी सृष्टिके क्रमका वर्णन किया है। वामदेव! उस श्रुतिका जो विवेकपूर्ण तात्पर्य है, उसे मैं तुम्हारे स्नेहवश बता रहा हूँ, सुनो। शिवशक्तिका संयोग ही परमात्मा है, यह ज्ञानी पुरुषोंका निश्चित मत है। शिवकी जो पराशक्ति है, उससे चिच्छक्ति प्रकट होती है। चिच्छक्तिसे आनन्दशक्तिका प्रादुर्भाव होता है, आनन्दशक्तिसे इच्छाशक्तिका उद्भव हुआ है, इच्छाशक्तिसे ज्ञानशक्ति और ज्ञानशक्तिसे पाँचवीं क्रियाशक्ति प्रकट हुई है। मुने! इन्हींसे निवृत्ति आदि कलाएँ उत्पन्न हुई हैं। चिच्छक्तिसे नाद और आनन्दशक्तिसे बिन्दु का प्राकट्य बताया गया है। इच्छाशक्तिसे मकार प्रकट हुआ है। ज्ञानशक्तिसे पाँचवाँ स्वर उकार उत्पन्न हुआ है और क्रियाशक्तिसे अकारकी उत्पत्ति हुई है। मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने तुम्हें प्रणवकी उत्पत्ति बतलायी है।
अब ईशानादि पंच ब्रह्मकी उत्पत्तिका वर्णन सुनो। शिवसे ईशान उत्पन्न हुए हैं, ईशानसे तत्पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ है, तत्पुरुषसे अघोरका, अघोरसे वामदेवका और वामदेवसे सद्योजातका प्राकट्य हुआ है। इस आदि अक्षर प्रणवसे ही मूलभूत पाँच स्वर और तैंतीस व्यंजनके रूपमें अड़तीस अक्षरोंका प्रादुर्भाव हुआ है। अब कलाओंकी उत्पत्तिका क्रम सुनो। ईशानसे शान्त्यतीताकला उत्पन्न हुई है। तत्पुरुषसे शान्तिकला, अघोरसे विद्याकला, वामदेवसे प्रतिष्ठाकला और सद्योजातसे निवृत्तिकलाकी उत्पत्ति हुई है। ईशानसे चिच्छक्तिद्वारा मिथुनपंचककी उत्पत्ति होती है। अनुग्रह, तिरोभाव, संहार, स्थिति और सृष्टि—इन पाँच कृत्योंका हेतु होनेके कारण उसे पंचक कहते हैं। यह बात तत्त्वदर्शी ज्ञानी मुनियोंने कही है। वाच्य-वाचकके सम्बन्धसे उनमें मिथुनत्वकी प्राप्ति हुई है। कला वर्णस्वरूप इस पंचकमें भूतपंचककी गणना है। मुनिश्रेष्ठ! आकाशादिके क्रमसे इन पाँचों मिथुनोंकी उत्पत्ति हुई है। इनमें पहला मिथुन है आकाश, दूसरा वायु, तीसरा अग्नि, चौथा जल और पाँचवाँ मिथुन पृथ्वी है। इनमें आकाशसे लेकर पृथ्वीतकके भूतोंका जैसा स्वरूप बताया गया है, उसे सुनो। आकाशमें एकमात्र शब्द ही गुण है; वायुमें शब्द और स्पर्श दो गुण हैं; अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप—इन तीन गुणोंकी प्रधानता है; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार गुण माने गये हैं तथा पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँच गुणोंसे सम्पन्न है। यही भूतोंका व्यापकत्व कहा गया है अर्थात् शब्दादि गुणोंद्वारा आकाशादि भूत वायु आदि परवर्ती भूतोंमें किस प्रकार व्यापक हैं, यह दिखाया गया है। इसके विपरीत गन्धादि गुणोंके क्रमसे वे भूत पूर्ववर्ती भूतोंसे व्याप्य हैं अर्थात् गन्ध गुणवाली पृथ्वी जलका और रसगुणवाला जल अग्निका व्याप्य है, इत्यादि रूपसे इनकी व्याप्यताको समझना चाहिये। पाँच भूतोंका यह विस्तार ही 'प्रपंच' कहलाता है। सर्वसमष्टिका जो आत्मा है, उसीका नाम
* कैलाससंहिता * ६४९
‘विराट्’ है और पृथ्वीतत्त्वसे लेकर क्रमशः शिवतत्त्वतक जो तत्त्वोंका समुदाय है, वही ‘ब्रह्माण्ड’ है। वह क्रमशः तत्त्वसमूहमें लीन होता हुआ अन्ततोगत्वा सबके जीवनभूत चैतन्यमय परमेश्वरमें ही लयको प्राप्त होता है और सृष्टिकालमें फिर शक्तिद्वारा शिवसे निकलकर स्थूल प्रपंचके रूपमें प्रलयकालपर्यन्त सुखपूर्वक स्थित रहता है।
अपनी इच्छासे संसारकी सृष्टिके लिये उद्यत हुए महेश्वरका जो प्रथम परिस्पन्द है, उसे ‘शिवतत्त्व’ कहते हैं। यही इच्छाशक्तितत्त्व है; क्योंकि सम्पूर्ण कृत्योंमें इसीका अनुवर्तन होता है। मुनीश्वर! ज्ञान और क्रिया—इन दो शक्तियोंमें जब ज्ञानका आधिक्य हो, तब उसे सदाशिवतत्त्व समझना चाहिये; जब क्रिया-शक्तिका उद्रेक हो तब उसे महेश्वरतत्त्व जानना चाहिये तथा जब ज्ञान और क्रिया दोनों शक्तियाँ समान हों तब वहाँ शुद्ध विद्यात्मक-तत्त्व समझना चाहिये। समस्त भाव-पदार्थ परमेश्वरके अंगभूत ही हैं; तथापि उनमें जो भेदबुद्धि होती है, उसका नाम माया-तत्त्व है। जब शिव अपने परम ऐश्वर्यशाली रूपको मायासे निगृहीत करके सम्पूर्ण पदार्थोंको ग्रहण करने लगता है, तब उसका नाम ‘पुरुष’ होता है। ‘तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्’ (उस शरीरको रचकर स्वयं उसमें प्रविष्ट हुआ) इस श्रुतिने उसके इसी स्वरूपका प्रतिपादन किया है अथवा इसी तत्त्वका प्रतिपादन करनेके लिये उक्त श्रुतिका प्रादुर्भाव हुआ है। यही पुरुष मायासे मोहित होकर संसारी (संसारबन्धनमें बँधा हुआ) पशु कहलाता है। शिवतत्त्वके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उसकी बुद्धि नाना कर्मोंमें आसक्त हो मूढ़ताको प्राप्त हो जाती है। वह जगत्को शिवसे अभिन्न नहीं जानता तथा अपनेको भी शिवसे भिन्न ही समझता है। प्रभो! यदि शिवसे अपनी तथा जगत्की अभिन्नताका बोध हो जाय तो इस पशु (जीव)-को मोहका बन्धन न प्राप्त हो। जैसे इन्द्रजाल-विद्याके ज्ञाता (बाजीगर)-को अपनी रची हुई अद्भुत वस्तुओंके विषयमें मोह या भ्रम नहीं होता है, उसी प्रकार ज्ञानयोगीको भी नहीं होता। गुरुके उपदेशद्वारा अपने ऐश्वर्यका बोध प्राप्त हो जानेपर वह चिदानन्दघन शिवरूप ही हो जाता है।
शिवकी पाँच शक्तियाँ हैं—१-सर्वकर्तृत्वरूपा, २-सर्वतत्त्वरूपा, ३-पूर्णत्वरूपा, ४-नित्यत्वरूपा और ५-व्यापकत्वरूपा। जीवकी पाँच कलाएँ हैं—१-कला, २-विद्या, ३-राग, ४-काल और ५-नियति। इन्हें कलापंचक कहते हैं। जो यहाँ पाँच तत्त्वोंके रूपमें प्रकट होती है, उसका नाम ‘कला’ है। जो कुछ-कुछ कर्तृत्वमें हेतु बनती है और कुछ तत्त्वका साधन होती है, उस कलाका नाम ‘विद्या’ है। जो विषयोंमें आसक्ति पैदा करनेवाली है, उस कलाका नाम ‘राग’ है। जो भाव पदार्थों और प्रकाशोंका भासनात्मकरूपसे क्रमशः अवच्छेदक होकर सम्पूर्ण भूतोंका आदि कहलाता है, वही ‘काल’ है। यह मेरा कर्तव्य है और यह नहीं है—इस प्रकार नियन्त्रण करनेवाली जो विभुकी शक्ति है, उसका नाम ‘नियति’ है। उसके आक्षेपसे जीवका पतन होता है। ये पाँचों ही जीवके स्वरूपको आच्छादित करनेवाले आवरण हैं। इसलिये ‘पंचकंचुक’ कहे गये हैं। इनके निवारणके लिये अन्तरंग साधनकी आवश्यकता है। (अध्याय १५-१६)
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६५० * संक्षिप्त शिवपुराण *
महावाक्योंके अर्थपर विचार तथा संन्यासियोंके योगपट्टका प्रकार
स्कन्दजी कहते हैं—मुने अब महावाक्य प्रस्तुत किये जाते हैं— *
१-प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय० ३।३ तथा आत्मप्र० १),
२-अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक० १।४।१०),
३-तत्त्वमसि (छा० उ० खं० ८ से १६ तक),
४-अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्य० २; बृह० २।५।१९),
५-ईशा वास्यमिदं सर्वम् (ईशा० १),
६-प्राणोऽस्मि (कौषी० ३),
७-प्रज्ञानात्मा (कौषी० ३),
८-यदवेह तदमुत्र तदन्विह (कठ० २।१।१०)
९-अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि (केन० १।३),
१०-एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः (बृह० ३।७।३—२३),
११-स यश्चायं पुरुषो यश्चासावादित्ये स एकः, (तैत्तिरीय० २।८),
१२-अहमस्मि परं ब्रह्म परात्परम्।
१३-वेदशास्त्रगुरूणां तु स्वयमानन्दलक्षणम्।
१४-सर्वभूतस्थितं ब्रह्म तदेवाहं न संशयः।
१५-तत्त्वस्य प्राणोऽहमस्मि पृथिव्याः प्राणोऽहमस्मि,
१६-अपां च प्राणोऽहमस्मि तेजसश्च प्राणोऽहमस्मि,
१७-वायोश्च प्राणोऽहमस्मि आकाशस्य प्राणोऽहमस्मि,
१८-त्रिगुणस्य प्राणोऽहमस्मि,
१९-सर्वोऽहं सर्वात्मको संसारी यद्भूतं यच्च भव्यं यद्वर्तमानं सर्वात्मकत्वादद्वितीयोऽहम्,
२०-सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य० ३।१४।१),
२१-सर्वोऽहं विमुक्तोऽहम्।
२२-योऽसौ सोऽहं हंसः सोऽहमस्ति।
इस प्रकार सर्वत्र चिन्तन करे। अब इन महावाक्योंका भावार्थ कहते हैं—'प्रज्ञानं ब्रह्म' का वाक्यार्थ पहले ही समझाया जा चुका है। (अब 'अहं ब्रह्मास्मि' का अर्थ बताया जाता है।) शक्तिस्वरूप अथवा शक्तियुक्त परमेश्वर ही 'अहम्' पदके अर्थभूत
* इन वाक्योंका साधारण अर्थ यों समझना चाहिये—१-ब्रह्म उत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप अथवा चैतन्यरूप है। २-वह ब्रह्म मैं हूँ। ३-वह ब्रह्म तू है। ४-यह आत्मा ब्रह्म है। ५-यह सब ईश्वरसे व्याप्त है। ६-मैं प्राण हूँ। ७-प्रज्ञानस्वरूप हूँ। ८-जो परब्रह्म यहाँ है, वही वहाँ (परलोकमें) भी है; जो वहाँ है, वही यहाँ (इस लोकमें) भी है। ९-वह ब्रह्म विदित (ज्ञात वस्तुओं)-से भिन्न है और अविदित (अज्ञात)-से भी ऊपर है। १०-वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। ११-वह जो यह पुरुषमें है और वह जो यह आदित्यमें है, एक ही है। १२-मैं परापरस्वरूप परात्पर परब्रह्म हूँ। १३-वेदों, शास्त्रों और गुरुजनोंके वचनोंसे स्वयं ही हृदयमें आनन्दस्वरूप ब्रह्मका अनुभव होने लगता है। १४-जो सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित है, वही ब्रह्म मैं हूँ—इसमें संशय नहीं है। १५-मैं तत्त्वका प्राण हूँ, पृथिवीका प्राण हूँ। १६-मैं जलका प्राण हूँ, तेजका प्राण हूँ। १७-वायुका प्राण हूँ, आकाशका प्राण हूँ। १८-मैं त्रिगुणका प्राण हूँ। १९-मैं सब हूँ, सर्वरूप हूँ, संसारी जीवात्मा हूँ; जो भूत, वर्तमान और भविष्य है, वह सब मेरा ही स्वरूप होनेके कारण मैं अद्वितीय परमात्मा हूँ। २०-यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। २१-मैं सर्वरूप हूँ, मुक्त हूँ। २२-जो वह है, वह मैं हूँ। मैं वह हूँ और वह मैं हूँ।
- कैलाससंहिता * ६५१
हैं। 'अकार' सब वर्णोंका अग्रगण्य, परम प्रकाश शिवरूप है। 'हकार' व्योमस्वरूप होनेके कारण उसका शक्तिरूपसे वर्णन किया गया है। शिव और शक्तिके संयोगसे सदा आनन्द उदित होता है। 'मकार' उसी आनन्दका बोधक है। 'ब्रह्म' शब्दसे शिवशक्तिकी सर्वरूपता स्पष्ट ही सूचित होती है। पहले ही इस बातका उपदेश किया गया है कि वह शक्तिमान् परमेश्वर मैं हूँ, ऐसी भावना करनी चाहिये। (अब तत्त्वमसिका अर्थ कहते हैं—) 'तत्त्वमसि' इस वाक्यमें तत्पदका वही अर्थ है, जो 'सोऽहमस्मि' में 'सः' पदका अर्थ बताया गया है अर्थात् तत्पद शक्त्यात्मक परमेश्वरका ही वाचक है, अन्यथा 'सोऽहम्' इस वाक्यमें विपरीत अर्थकी भावना हो सकती है। क्योंकि 'अहम्' पद पुँल्लिंग है, अतः 'सः' के साथ उसका अन्वय हो जायगा; परंतु 'तत्' पद नपुंसक है और 'त्वम्' पुँल्लिंग, अतः परस्परविरोधी लिंग होनेके कारण उन दोनोंमें अन्वय नहीं हो सकता। जब दोनोंका अर्थ 'शक्तिमान् परमेश्वर' होगा, तब अर्थमें समान लिंगता होनेसे अन्वयमें अनुपपत्ति नहीं होगी। यदि ऐसा न माना जाय तो स्त्री-पुरुषरूप जगत्का कारण भी किसी और ही प्रकारका होगा। इसलिये 'सोऽहमस्मि' का 'सः' और 'तत्त्वमसि' का तत्—ये दोनों समानार्थक हैं। इन महावाक्योंके उपदेशसे एक ही अर्थकी भावनाका विधान है।
(अब 'अयमात्मा ब्रह्म' का अर्थ बताया जाता है—) 'अयमात्मा ब्रह्म' इस वाक्यमें 'अयम्' और 'आत्मा'—ये दोनों पद पुँल्लिंग-रूप हैं। अतः यहाँ अन्वयमें बाधा नहीं है। 'अयम्' शक्तिमान् परमेश्वररूप आत्मा ब्रह्म है—यह इस वाक्यका तात्पर्य है। (अब 'ईशा वास्यमिदं सर्वम्' का भावार्थ बता रहे हैं—) परमेश्वरसे रक्षणीय होनेके कारण यह सम्पूर्ण जगत् उनसे व्याप्त है। (अब 'प्राणोऽस्मि' 'प्रज्ञानात्मा' और 'यदेवेह तदमुत्र०' इन वाक्योंके अर्थपर विचार किया जाता है—) मैं प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ। यहाँ प्राण शब्द परमेश्वरका ही वाचक है। जो यहाँ है, वह वहाँ है—ऐसा चिन्तन करे। यहाँ 'यत्, तत्' का अर्थ क्रमशः 'यः' और 'सः' है अर्थात् जो परमात्मा यहाँ है, वह परमात्मा वहाँ है—ऐसा सिद्धान्तपक्षका अवलम्बन करनेवाले विद्वानोंने कहा है। उपर्युक्त वाक्यमें 'यदमुत्र तदन्विह' इस वाक्यांशका भाव यह है कि 'योऽमुत्र स इह स्थितः' अर्थात् जो परमात्मा वहाँ परलोकमें स्थित है, वही यहाँ (इस लोकमें) भी स्थित है। इस प्रकार विद्वानोंको पहलेके समान ही परमपुरुष परमात्मारूप अर्थ यहाँ अभीष्ट है।
(अब 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' इस वाक्यपर विचार करते हैं—) मुने! 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' इस वाक्यमें जिस प्रकार फलकी भी विपरीतताकी भावना होती है, उसे यहाँ बताता हूँ; सुनो। 'विदितात्' यह पद 'अयथाविदितात्' के उन्हींका इन समस्त उत्कृष्ट गुणोंसे नित्य सम्बन्ध है। अपने और परायेके 'भेदसतात्' के अर्थमें प्रवृत्त हो सकता है। वह विदितसे भिन्न है अर्थात् जो असम्यग्रूपसे ज्ञात है, उससे भिन्न है। इसी प्रकार जो यथावत्रूपसे विदित नहीं है, उससे भी पृथक् है। इस कथनसे यह निश्चित होता है कि मुक्तिरूप फलकी सिद्धिके लिये कोई और ही तत्त्व है, जो विदिताविदितसे पर है।
| ६५२ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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परंतु जो आत्मा है, वह सर्वरूप है, वह किसीसे अन्य नहीं हो सकता। अतः आत्मा या ब्रह्म आदि पद पूर्ववत् शक्तिमान् परमेश्वर शिवके ही बोधक हैं, यह मानना चाहिये।
(अब ‘एष त आत्मा’ तथा ‘यश्चायं पुरुषे’ इन दो वाक्योंके अर्थपर विचार किया जाता है—) यह तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा है, जो स्वयं ही अमृतस्वरूप शिव है। यह जो पुरुषमें शम्भु है, वही सूर्यमें भी स्थित है। इन दोनोंमें कोई भेद नहीं है। जो पुरुषमें है, वही आदित्यमें है। इन दोनोंमें पृथक्ता नहीं है। वह तत्त्व एक ही है। उसीको सर्वरूप कहा गया है। पुरुष और आदित्य—इन दो उपाधियोंसे युक्त जो अर्थ किया जाता है, वह औपचारिक है। उन शम्भुनाथको सब श्रुतियाँ हिरण्मय बताती हैं। ‘हिरण्यवाहवे नमः’ इसमें जो बाहु शब्द है, वह सब अंगोंका उपलक्षण है। अन्यथा उसे हिरण्यपति कहना किसी भी यत्नसे सम्भव नहीं होता। छान्दोग्योपनिषद्में जो यह श्रुति है—‘य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः। (छान्दोग्य० १। ६। ६) इसके द्वारा आदित्यमण्डलान्तर्गत पुरुषको सुवर्णमय दाढ़ी-मूँछोंवाला, सुवर्णसदृश केशोंवाला तथा नखसे लेकर केशाग्रभागपर्यन्त सारा-का-सारा सुवर्णमय—प्रकाशमय ही बताया गया है। अतः वह हिरण्मय पुरुष साक्षात् शम्भु ही हैं।
अब ‘अहमस्मि परं ब्रह्म परापरपरात्परम्’ इस वाक्यका तात्पर्य बताता हूँ, सुनो। ‘अहम्’ पदके अर्थभूत सत्यात्मा शिव ही बताये गये हैं। वे ही शिव मैं हूँ, ऐसी वाक्यार्थयोजना अवश्य होती है। उन्हींको सबसे उत्कृष्ट और सर्वस्वरूप परब्रह्म कहा गया है। उसके तीन भेद हैं—पर, अपर तथा परात्पर। रुद्र, ब्रह्मा और विष्णु—ये तीन देवता श्रुतिने ही बताये हैं। ये ही क्रमशः पर, अपर तथा परात्पररूप हैं। इन तीनोंसे भी जो श्रेष्ठ देवता हैं, वे शम्भु ‘परब्रह्म’ शब्दसे कहे गये हैं।
वेदों, शास्त्रों और गुरुके वचनोंके अभ्याससे शिष्यके हृदयमें स्वयं ही पूर्णानन्दमय शम्भुका प्रादुर्भाव होता है। सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें विराजमान शम्भु ब्रह्मरूप ही हैं। वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं है। मैं शिव ही सम्पूर्ण तत्त्वसमुदायका प्राण हूँ।
ऐसा कहकर स्कन्दजी फिर कहते हैं—मुने! मैं शिव आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व—इन तीनोंका प्राण हूँ। पृथिवी आदिका भी प्राण हूँ। पृथ्वी आदिके गुणोंतकका ग्रहण होनेसे यह समझ लो कि यहाँ सारे आत्मतत्त्व गृहीत हो गये। फिर सबका ग्रहण विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका भी ग्रहण कराता है। इन सब तत्त्वोंका मैं प्राण हूँ। मैं सर्व हूँ, सर्वात्मक हूँ, जीवका भी अन्तर्यामी होनेसे उसका भी जीव (आत्मा) हूँ। जो भूत, वर्तमान और भविष्यत्काल है, वह सब मेरा स्वरूप होनेके कारण मैं ही हूँ। ‘सर्वो वै रुद्रः’ (सब कुछ रुद्र ही है)—यह श्रुति साक्षात् शिवके मुखसे प्रकट हुई है। अतः शिव ही सर्वरूप हैं; क्योंकि उन्हींका इन समस्त उत्कृष्ट गुणोंसे नित्य सम्बन्ध है। अपने और परायेके भेदसे रहित होनेके कारण मैं ही अद्वितीय आत्मा हूँ। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ इस वाक्यका अर्थ पहले बताया जा चुका है। मैं भावरूप होनेके
- कैलाससंहिता * ६५३
कारण पूर्ण हूँ। नित्यमुक्त भी मैं ही हूँ। पशु (जीव) मेरी कृपासे मुक्त होकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होते हैं। जो सर्वात्मक शम्भु हैं, वही मैं हूँ। मैं शिवरूप हूँ। वामदेव! इस प्रकार सम्पूर्ण वाक्योंके अर्थ भगवान् शिव ही बताये गये हैं$^१$। ईशावास्योपनिषद्की श्रुतिके दो वाक्योंद्वारा प्रतिपादित अर्थ साक्षात् शिवकी एकताका ज्ञान प्रदान करनेवाला होता है। गुरुको चाहिये कि शिष्योंको इसका आदरपूर्वक उपदेश करे।
गुरुको उचित है कि वे आधारसहित शंखको लेकर अस्त्र-मन्त्र (फट्)-से तथा भस्मद्वारा उसकी शुद्धि करके उसे अपने सामने चौकोर मण्डलमें स्थापित करे। फिर ओंकारका उच्चारण करके गन्ध आदिके द्वारा उस शंखकी पूजा करे। उसमें वस्त्र लपेट दे और सुगन्धित जल भरकर प्रणवका उच्चारण करते हुए उसका पूजन करे। तत्पश्चात् सात बार प्रणवके द्वारा फिर उस शंखको अभिमन्त्रित करके शिष्यसे कहे—'हे शिष्य! जो थोड़ा-सा भी अन्तर करता है—भेदभाव रखता है, वह भयका भागी होता है। यह श्रुतिका सिद्धान्त बताया गया, इसलिये तुम अपने चित्तको स्थिर करके निर्भय हो जाओ$^२$।' ऐसा कहकर गुरु स्वयं महादेवजीका ध्यान करते हुए उन्हींके रूपमें शिष्यका अर्चन करे। शिष्यके आसनकी पूजा करके उसमें शिवके आसन और शिवकी मूर्तिकी भावना करे। फिर सिरसे पैरतक 'सद्योजातादि' पाँच मन्त्रोंका न्यास करके मस्तक, मुख और कलाओंके भेदसे प्रणवकी कलाओंका भी न्यास करे। शिष्यके शरीरमें अड़तीस मन्त्ररूपा प्रणवकी कलाओंका न्यास करके उसके मस्तकपर शिवका आवाहन करे। तत्पश्चात् स्थापनी आदि मुद्राओंका प्रदर्शन करे। फिर अंगन्यास करके आसनपूर्वक षोडश उपचारोंकी कल्पना करे। खीरका नैवेद्य अर्पण करके 'ॐ स्वाहा' का उच्चारण करे। कुल्ला और आचमन कराये। अर्घ्य आदि देकर क्रमशः धूप-दीपादि समर्पित करे। शिवके आठ नामोंसे पूजन करके वेदोंके पारंगत ब्राह्मणोंके साथ 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्यादि ब्रह्मानन्दवल्लीके मन्त्रोंको तथा 'भृगुर्वे वारुणि:' इत्यादि भृगुवल्लीके मन्त्रोंको पढ़े। तत्पश्चात् 'यो देवानां प्रथमं पुरस्तात्'—(१०।३) से लेकर 'तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः' (१०।८)
१-तत्त्वयोश्चास्यहं प्राणः सर्वः सर्वात्मको ह्यहम्। जीवस्य चान्तर्यामित्वाज्जीवोऽहं तस्य सर्वदा॥
यद् भूतं यच्च भव्यं यद् भविष्यत् सर्वमेव च। मन्मयत्वादहं सर्वः सर्वो वै रुद्र इत्यपि॥
श्रुतिराह मुने सा हि साक्षाच्छिवमुखोद्गता। सर्वात्मा परमैर्भगिर्गुणैर्नित्यसमन्वयात्॥
स्वस्मात् परात्मविरहाद्दितीयोऽहमेव हि। सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यार्थः पूर्वमीरितः॥
पूर्णोऽहं भावरूपत्वान्नित्यमुक्तोऽहमेव हि। पशवो मत्प्रसादेन मुक्ता मद्भावमाश्रिताः॥
योऽसौ सर्वात्मकः शम्भुस्सोऽहं हंस शिवोऽस्म्यहम्। इति वै सर्ववाक्यार्थो वामदेव शिवोदितः॥
(शि० पु० कै० सं० १९। २६—३१)
२-यस्त्वन्तरं किंचिदपि कुरुतेऽस्त्यति भीतिभाक्। इत्याह श्रुतिसत्तत्त्वं दृष्टात्मा गतभीर्भव॥
(शि० पु० कै० सं० १९। ३५-३६)
६५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तक महानारायणोपनिषद्के मन्त्रोंका पाठ करे। इसके बाद शिष्यके सामने कह्लार आदिकी बनी हुई माला लेकर खड़े हो गुरु शिवनिर्मित पांचास्तिक शास्त्रके सिद्धिस्कन्दका धीरे-धीरे जप करे। अनुकूल चित्तसे 'पूर्णोऽहम्' इस मन्त्रतकका जप करके गुरु उस मालाको शिष्यके कण्ठमें पहना दे। तदनन्तर ललाटमें तिलक लगाकर सम्प्रदायके अनुसार उसके सर्वांगमें विधिवत् चन्दनका लेप कराये। तत्पश्चात् गुरु प्रसन्नतापूर्वक श्रीपादयुक्त नाम देकर शिष्यको छत्र और चरणपादुका अर्पित करे। उसे व्याख्यान देने तथा आवश्यक कर्म आदिके लिये गुर्वासन ग्रहण करनेका अधिकार दे। फिर गुरु अपने उस शिवरूपी शिष्यपर अनुग्रह करके कहे—"तुम सदा समाधिस्थ रहकर 'मैं शिव हूँ' इस प्रकारकी भावना करते रहो।" यों कहकर वह स्वयं शिवको नमस्कार करे। फिर सम्प्रदायकी मर्यादाके अनुसार दूसरे लोग भी उसे नमस्कार करें। उस समय शिष्य उठकर गुरुको नमस्कार करे। अपने गुरुके गुरुको और उनके शिष्योंको भी मस्तक झुकाये।
इस प्रकार नमस्कार करके सुशील शिष्य जब मौन और विनीतभावसे गुरुके समीप खड़ा हो, तब गुरु स्वयं उसे इस प्रकारका उपदेश दे—'बेटा! आजसे तुम समस्त लोकोंपर अनुग्रह करते रहो। यदि कोई शिष्य होनेके लिये आये तो पहले उसकी परीक्षा कर लो, फिर शास्त्रविधिके अनुसार उसे शिष्य बनाओ। राग आदि दोषोंका त्याग करके निरन्तर शिवका चिन्तन करते रहो। श्रेष्ठ सम्प्रदायके सिद्ध पुरुषोंका संग करो, दूसरोंका नहीं। प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी शिवका पूजन किये बिना कभी भोजन न करो। गुरुभक्तिका आश्रय ले सुखी रहो, सुखी रहो।'*
मुनीश्वर वामदेव! तुम्हारे स्नेहवश अत्यन्त गोपनीय होनेपर भी मैंने यह योगपट्टका प्रकार तुम्हें बताया है। ऐसा कहकर स्कन्दने यतियोंपर कृपा करके उनसे संन्यासियोंके क्षौर और स्नानविधिका वर्णन किया।
(अध्याय १७—१९)
यतिके अन्त्येष्टिकर्मकी दशाहपर्यन्त विधिका वर्णन
वामदेवजी बोले—जो मुक्त यति हैं, उनके शरीरका दाहकर्म नहीं होता। मरनेपर उनके शरीरको गाड़ दिया जाता है, यह मैंने सुना है। मेरे गुरु कार्तिकेय! आप प्रसन्नतापूर्वक यतियोंके उस अन्त्येष्टिकर्मका मुझसे वर्णन कीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें आपके सिवा दूसरा कोई इस विषयका वर्णन करनेवाला नहीं है। भगवन्! शंकरनन्दन ! जो पूर्ण परब्रह्ममें अहंभावका आश्रय ले देहपंजरसे मुक्त हो गये हैं तथा
* रागादिदोषान् संत्यज्य शिवध्यानपरो भव। तत्सम्प्रदायसंसिद्धैः सङ्गं कुरु न चेतरैः॥
अनभ्यर्च्य शिवं जातु मा भुङ्क्ष्वाप्राणसंशयम्। गुरुभक्तिं समास्थाय सुखी भव सुखी भव॥
(शि० पु० कै० सं० १९। ५३-५४)
* कैलाससंहिता * ६५५
जो उपासनाके मार्गसे शरीरबन्धनसे मुक्त हो परमात्माको प्राप्त हुए हैं, उनकी गतिमें क्या अन्तर है—यह बताइये। प्रभो! मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये अच्छी तरह विचार करके प्रसन्नतापूर्वक मुझसे इस विषयका वर्णन कीजिये।
स्कन्दने कहा—जो कोई यति समाधिस्थ हो शिवके चिन्तनपूर्वक अपने शरीरका परित्याग करता है, वह यदि महान् धीर हो तो परिपूर्ण शिवरूप हो जाता है; किंतु यदि कोई अधीरचित्त होनेके कारण समाधिलाभ नहीं कर पाता तो उसके लिये उपाय बताता हूँ; सावधान होकर सुनो। वेदान्त-शास्त्रके वाक्योंसे जो ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—इन तीन पदार्थोंका परिज्ञान होता है, उसे गुरुके मुखसे सुनकर यति यम-नियमादिरूप योगका अभ्यास करे। उसे करते हुए वह भलीभाँति शिवके ध्यानमें तत्पर रहे। मुने! उसे नित्य नियमपूर्वक प्रणवके जप और अर्थचिन्तनमें मनको लगाये रखना चाहिये। मुने! यदि देहकी दुर्बलताके कारण धीरता धारण करनेमें असमर्थ यति निष्कामभावसे शिवका स्मरण करके अपने जीर्ण शरीरको त्याग दे तो भगवान् सदाशिवके अनुग्रहसे नन्दीके भेजे हुए विख्यात पाँच आतिवाहिक देवता आते हैं। उनमेंसे कोई तो अग्निका अभिमानी, कोई ज्योतिःपुंजस्वरूप, कोई दिनाभिमानी, कोई शुक्लपक्षाभिमानी और कोई उत्तरायणका अभिमानी होता है। ये पाँचों सब प्राणियोंपर अनुग्रह करनेमें तत्पर रहते हैं। इसी तरह धूमाभिमानी, तमका अभिमानी, रात्रिका अभिमानी, कृष्णपक्षका अभिमानी और दक्षिणायनका अभिमानी—ये सब मिलकर पाँच होते हैं। ये पाँचों विख्यात देवता दक्षिण मार्गमें प्रसिद्ध हैं। महामुने वामदेव! अब तुम उन सब देवताओंकी वृत्तिका वर्णन सुनो। कर्मके अनुष्ठानमें लगे हुए जीवोंको साथ ले वे पाँचों देवता उनके पुण्यवश स्वर्गलोकको जाते हैं और वहाँ यथोक्त भोगोंका उपभोग करके वे जीव पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मनुष्यलोकमें आते तथा पूर्ववत् जन्म ग्रहण करते हैं।
इनके सिवा जो उत्तर मार्गके पाँच देवता हैं, वे भूतलसे लेकर ऊर्ध्वलोकतकके मार्गको पाँच भागोंमें विभक्त करके यतिको साथ ले क्रमशः अग्नि आदिके मार्गमें होते हुए उसे सदाशिवके धाममें पहुँचाते हैं। वहाँ देवाधिदेव महादेवके चरणोंमें प्रणाम करके लोकानुग्रहके कर्ममें ही लगाये गये वे अनुग्रहाकार देवता उन सदाशिवके पीछे खड़े हो जाते हैं। यतिको आया देख देवाधिदेव सदाशिव यदि वह विरक्त हो तो उसे महामन्त्रके तात्पर्यका उपदेश दे गणपतिके पदपर अभिषिक्त करके अपने ही समान शरीर देते हैं। इस प्रकार सर्वेश्वर सर्वनियन्ता भगवान् शंकर उसपर अनुग्रह करते हैं। उसे अनुगृहीत करके निश्चल समाधि देते हैं। अपने प्रति दास्यभावकी फलस्वरूप तथा सूर्य आदिके कार्य करनेकी शक्तिरूपा ऐसी सिद्धियाँ प्रदान करते हैं, जो कहीं अवरुद्ध नहीं होतीं। साथ ही वे जगद्गुरु शंकर उस यतिको वह परम मुक्ति देते हैं, जो ब्रह्माजीकी आयु समाप्त होनेपर भी पुनरावृत्तिके चक्करसे दूर रहती है। अतः यही समष्टिमान् सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे युक्त पद
६५६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
है और यही मोक्षका राजमार्ग है, ऐसा वेदान्तशास्त्रका निश्चय है।
जिस समय यति मरणासन्न हो शरीरसे शिथिल हो जाय, उस समय उस श्रेष्ठ सम्प्रदायवाले दूसरे यति अनुकूलताकी भावना ले उसके चारों ओर खड़े हो जायें। वे सब वहाँ क्रमशः प्रणव आदि वाक्योंका उपदेश दे उनके तात्पर्यका सावधानी और प्रसन्नताके साथ सुस्पष्ट वर्णन करें तथा जबतक उसके प्राणोंका लय न हो जाय तबतक निर्गुण परमज्योतिःस्वरूप सदाशिवका उसे निरन्तर स्मरण कराते रहें। सब यतियोंका यहाँ समानरूपसे संस्कार-क्रम बताया जाता है। संन्यासी सब कर्मोंका त्याग करके भगवान् शिवका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं। इसलिये उनके शरीरका दाहसंस्कार नहीं होता और उसके न होनेसे उनकी दुर्गति नहीं होती। संन्यासीके शरीरको दूषित करनेवाले राजाका राज्य नष्ट हो जाता है। उसके गाँवोंमें रहनेवाले लोग अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं। इसलिये उस दोषका परिहार करनेके लिये शान्तिका विधान बताया जाता है। उस समय 'नम इरिण्याय' से लेकर 'नम अमीवकेभ्यः' तकके मन्त्रका विनीतचित्त होकर जप करे। फिर अन्तमें ओंकारका जप करते हुए मिट्टीसे देवयजनकी* पूर्ति करे। मुनीश्वर ! ऐसा करनेसे उस दोषकी शान्ति हो जाती है।
(अब संन्यासीके शवके संस्कारकी विधि बताते हैं।) पुत्र या शिष्य आदिको चाहिये कि यतिके शरीरका यथोचित रीतिसे उत्तम संस्कार करे। ब्रह्मन्! मैं कृपापूर्वक संस्कारकी विधि बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। पहले यतिके शरीरको शुद्ध जलसे नहलाकर पुष्प आदिसे उसकी पूजा करे। पूजनके समय श्रीरुद्रसम्बन्धी चमकाध्याय और नमकाध्यायका पाठ करके रुद्रसूक्तका उच्चारण करे। उसके आगे शंखकी स्थापना करके शंखस्थ जलसे यतिके शरीरका अभिषेक करे। सिरपर पुष्प रखकर प्रणवद्वारा उसका मार्जन करे। पहलेके कौपीन आदिको हटाकर दूसरे नवीन कौपीन आदि धारण कराये। फिर विधिपूर्वक उसके सारे अंगोंमें भस्म लगाये। विधिवत् त्रिपुण्ड्र लगाकर चन्दनद्वारा तिलक करे। फिर फूलों और मालाओंसे उसके शरीरको अलंकृत करे। छाती, कण्ठ, मस्तक, बाँह, कलाई और कानोंमें क्रमशः रुद्राक्षकी मालाके आभूषण मन्त्रोच्चारणपूर्वक धारण कराकर उन सब अंगोंको सुशोभित करे। फिर धूप देकर उस शरीरको उठाये और विमानके ऊपर रखकर ईशानादि पंचब्रह्ममय रमणीय रथपर स्थापित करे। आदिमें ओंकारसे युक्त पाँच सद्योजातादि ब्रह्ममन्त्रोंका उच्चारण करके सुगन्धित पुष्पों और मालाओंसे उस रथको सुसज्जित करे। फिर नृत्य, वाद्य तथा ब्राह्मणोंके वेदमन्त्रोच्चारणकी ध्वनिके साथ ग्रामकी प्रदक्षिणा करते हुए उस प्रेतको बाहर ले जाय।
तदनन्तर साथ गये हुए वे सब यति गाँवके पूर्व या उत्तरदिशामें पवित्र स्थानमें किसी पवित्र वृक्षके निकट देवयजन (गड्ढा) खोदें। उसकी लम्बाई संन्यासीके दण्डके बराबर ही होनी चाहिये। फिर प्रणव
* संन्यासीके शरीरको गाड़नेके लिये जो गड्ढा खोदा जाता है, उसको 'देवयजन' कहते हैं।
* कैलाससंहिता * ६५७
तथा व्याहृति-मन्त्रोंसे उस स्थानका प्रोक्षण करके वहाँ क्रमशः शमीके पत्र और फूल बिछाये। उनके ऊपर उत्तराग्र कुश बिछाकर उसपर योगपीठ रखे। उसके ऊपर पहले कुश बिछाये, कुशोंके ऊपर मृगचर्म तथा उसके भी ऊपर वस्त्र बिछाकर प्रणवसहित सद्योजातादि पंचब्रह्ममन्त्रोंका पाठ करते हुए पंचगव्योंद्वारा उस शवका प्रोक्षण करे। तत्पश्चात् रुद्रसूक्त एवं प्रणवका उच्चारण करते हुए शंखके जलसे उसका अभिषेक करके उसके मस्तकपर फूल डाले। शिष्य आदि संस्कारकर्ता पुरुष वहाँ गये हुए मृत यतिके अनुकूल भाव रखते हुए शिवका चिन्तन करता रहे। तदनन्तर ॐकारका उच्चारण और स्वस्तिवाचन करके उस शवको उठाकर गड्ढेके भीतर योगासनपर इस तरह बिठाये जिससे उसका मुख पूर्व-दिशाकी ओर रहे। फिर चन्दन-पुष्पसे अलंकृत करके उसे धूप और गुग्गुलकी सुगन्ध दे। इसके बाद ‘विष्णो ! हव्यमिदं रक्षस्व’ ऐसा कहकर उसके दाहिने हाथमें दण्ड दे और ‘प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो०’ (शु० यजु० २३। ६५) इस मन्त्रको पढ़कर बायें हाथमें जलसहित कमण्डलु अर्पित करे। फिर ‘ब्रह्म यज्ञानं प्रथमं०’ (शु० यजु० १३। ३) इस मन्त्रसे उसके मस्तकका स्पर्श करके दोनों भौंहोंके स्पर्शपूर्वक रुद्रसूक्तका जप करे। तत्पश्चात् ‘मा नो महान्तमुत०’ (शु० यजु० १६। १५) इत्यादि चार मन्त्रोंको पढ़कर नारियलके द्वारा यतिके शवके मस्तकका भेदन करे। इसके बाद उस गड्ढेको पाट दे। फिर उस स्थानका स्पर्श करके अनन्यचित्तसे पाँच ब्रह्ममन्त्रोंका जप करे। तदनन्तर ‘यो देवानां प्रथमं पुरस्तात्’ (१०। ३) से लेकर ‘तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः।’ (१०। ८) तक महानारायणोपनिषद्के मन्त्रोंका जप करके संसाररूपी रोगके भेषज, सर्वज्ञ, स्वतन्त्र तथा सबपर अनुग्रह करनेवाले उमासहित महादेवजीका चिन्तन एवं पूजन करे। (पूजनकी विधि यों है—)
एक हाथ ऊँचे और दो हाथ लंबे-चौड़े एक पीठका मिट्टीके द्वारा निर्माण करे। फिर उसे गोबरसे लीपे। वह पीठ चौकोर होना चाहिये। उसके मध्यभागमें उमा-महेश्वरको स्थापित करके गन्ध, अक्षत, सुगन्धित पुष्प, बिल्वपत्र और तुलसीदलोंसे उनकी पूजा करे। तत्पश्चात् प्रणवसे धूप और दीप निवेदन करे। फिर दूध और हविष्यका नैवेद्य लगाकर पाँच बार परिक्रमा करके नमस्कार करे। फिर बारह बार प्रणवका जप करके प्रणाम करे। तदनन्तर (ब्रह्मीभूत यतिकी तृप्तिके लिये नारायणपूजन, बलिदान, घृतदीपदानका संकल्प करके गर्तके ऊपर मृण्मय लिंग बनाकर पुरुषसूक्तसे पूजा करके घृतमिश्रित पायसकी बलि दे। घीका दीप जला पायसबलिको जलमें डाल दे) तत्पश्चात् दिशा-विदिशाओंके क्रमसे प्रणवके उच्चारणपूर्वक ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ इस मन्त्रसे ब्रह्मीभूत यतिके लिये शंखसे आठ बार अर्घ्यजल दे। इस प्रकार दस दिनोंतक करता रहे। मुनिश्रेष्ठ! यह दशाहतककी विधि तुम्हें बतायी गयी। अब यतियोंके एकादशाहकी विधि सुनो।
(अध्याय २०-२१)
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