शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कैलाससंहिता * ६४७
व्यंजनोंको त्याग देनेसे स्थूल 'ओम्' शब्द बच रहता है, जो परमात्माका वाचक है! तत्त्वदर्शी मुनि कहते हैं कि उसे महामन्त्ररूप जानना चाहिये। उसमें जो सूक्ष्म महामन्त्र है, उसका उद्धार मैं तुम्हें बता रहा हूँ। 'हंसः' पदमें तीन अक्षर हैं—'ह, अ, स', इन तीनोंमें जो 'अ' है, वह पंद्रहवें (अनुस्वार) और सोलहवें (विसर्ग)-के साथ है। सकारके साथ जो 'अ' है, वह विसर्गसहित है; वह यदि सकारके साथ ही उठकर 'हं' के आदिमें चला जाय तो 'हंसः' के विपरीत 'सोऽहम्' यह महामन्त्र हो जायगा। इसमें जो सकार है, वह शिवका वाचक है। अर्थात् शिव ही सकारके अर्थ माने गये हैं। शक्त्यात्मक शिव ही इस महामन्त्रके वाच्यार्थ हैं, यह विद्वानोंका निर्णय है। गुरु जब शिष्यको इस महामन्त्रका उपदेश देते हैं, तब 'सोऽहम्' पदसे उसको शक्त्यात्मक शिवका ही बोध कराना अभीष्ट होता है। अर्थात् वह यह अनुभव करे कि 'मैं शक्त्यात्मक शिवरूप हूँ।' इस प्रकार जब यह महामन्त्र जीवपरक होता है अर्थात् जीवकी शिवरूपताका बोध कराता है, तब पशु (जीव) अपनेको शक्त्यात्मक एवं शिवका अंश जानकर शिवके साथ अपनी एकता सिद्ध हो जानेसे शिवकी समताका भागी हो जाता है।
अब श्रुतिके 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस वाक्यमें जो 'प्रज्ञानम्' पद आया है, उसके अर्थको दिखाया जा रहा है। 'प्रज्ञान' शब्द 'चैतन्य'-का पर्याय है, इसमें संशय नहीं है। मुने! शिवसूत्रमें यह कहा गया है कि 'चैतन्यम् आत्मा' अर्थात् आत्मा (ब्रह्म या परमात्मा) चैतन्यरूप है। चैतन्य-शब्दसे यह सूचित होता है कि जिसमें विश्वका सम्पूर्ण ज्ञान तथा स्वतन्त्रतापूर्वक जगत्के निर्माणकी क्रिया स्वभावतः विद्यमान है, उसीको आत्मा या परमात्मा कहा गया है। इस प्रकार मैंने यहाँ शिवसूत्रोंकी व्याख्या ही की है।
'ज्ञानं बन्धः' यह दूसरा शिवसूत्र है। इसमें पशुवर्ग (जीवसमुदाय)-का लक्षण बताया गया है। इस सूत्रमें आदि पद 'ज्ञानम्' के द्वारा किंचिन्मात्र ज्ञान और क्रियाका होना ही जीवका लक्षण कहा गया है। यह ज्ञान और क्रिया पराशक्तिका प्रथम स्पन्दन है। कृष्णयजुर्वेदकी श्वेताश्वतर शाखाका अध्ययन करनेवाले विद्वानोंने 'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च'* इस श्रुतिके द्वारा इसी पराशक्तिका प्रसन्नतापूर्वक स्तवन किया है। भगवान् शंकरकी तीन दृष्टियाँ मानी गयी हैं—ज्ञान, क्रिया और इच्छारूप। ये तीनों दृष्टियाँ जीवोंके मनमें स्थित हो इन्द्रियज्ञानगोचर देहमें प्रवेश करके जीवरूप हो सदा जानती और करती हैं। अतः यह दृष्टित्रयरूप जीव आत्मा (महेश्वर)-का स्वरूप ही है, ऐसा निश्चित सिद्धान्त है।
अब मैं जगत्प्रपंचके साथ प्रणवकी एकताका बोध करनेवाले प्रपंचार्थका वर्णन
* यह श्रुति श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।८) की है। इसका पूरा पाठ इस प्रकार है—
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥
देह और इन्द्रियसे उनका है सम्बन्ध नहीं कोई। अधिक कहाँ, उनके सम भी तो दीख रहा न कहीं कोई॥
ज्ञानरूप, बलरूप, क्रियामय उनकी पराशक्ति भारी। विविध रूपमें सुनी गयी है, स्वाभाविक उनमें सारी॥