भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 850 में से

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पृष्ठ 660

६४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

व्रतका पालन करनेवाले वामदेव! जैसे धूमका दर्शन होनेसे लोग अनुमानद्वारा पर्वतपर अग्निकी सत्ताका प्रतिपादन करते हैं, उसी प्रकार इस प्रत्यक्ष प्रपंचके दर्शनरूप हेतुका अवलम्बन करके परमेश्वर परमात्माको जाना जा सकता है, इसमें संशय नहीं है।

यह विश्व स्त्री-पुरुषरूप है, ऐसा प्रत्यक्ष ही देखा जाता है। छः कोशरूप जो शरीर है, उसमें आदिके तीन माताके अंशसे उत्पन्न हुए हैं और अन्तिम तीन पिताके अंशसे—यह श्रुतिका कथन है। इस प्रकार सभी शरीरोंमें स्त्री-पुरुषभावको जाननेवाले लोग हैं। मुने! विद्वानोंने परमात्मामें भी स्त्री-पुरुषभावको जाना है। श्रुति कहती है, परब्रह्म परमात्मा सत्, चित् और आनन्दरूप है। असत् प्रपंचको निवृत्त करनेवाला शब्द ही सद्रूप कहा जाता है। चित्-शब्दसे जड जगत्की निवृत्ति की जाती है। यद्यपि सत्-शब्द तीनों लिंगोंमें विद्यमान है, तथापि यहाँ परब्रह्म परमात्माके अर्थमें पुँल्लिंग सत्-शब्दको ही ग्रहण करना चाहिये। वह सत्-शब्द प्रकाशका वाचक है। 'सन् प्रकाशः'—सन्-शब्द स्पष्टरूपसे प्रकाशका वाचक है। परमात्मामें जो सत्ता या प्रकाशरूपता है, वह उसके पुरुषभावको सूचित करती है। ज्ञान शब्दका पर्यायवाची जो चित्-शब्द है, वह स्त्रीलिंग है अर्थात् परमात्मामें चिद्रूपता उसके स्त्रीभावको सूचित करती है। प्रकाश और चित्—ये दोनों जगत्के कारणभावको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार सच्चिदात्मा परमेश्वर भी जब जगत्के कारणभावको प्राप्त होते हैं तब उन एकमात्र परमात्मामें ही 'शिव' भाव और 'शक्ति'भावका भेद किया जाता है। जब तेल और बत्तीमें मलिनता होती है, तब उसके प्रकाशमें भी मलिनता आ जाती है। चिताकी आग आदिमें अशिवता और मलिनता स्पष्ट देखी जाती है। अतः मलिनता आदि आरोपित वस्तु है, उसका निवर्तक होनेके कारण परमात्माके 'शिवत्व' का ही श्रुतिके द्वारा प्रतिपादन किया गया है।

जीवके आश्रित जो चिच्छक्ति है, वह सदा दुर्बल होती है। उसकी निवृत्तिके लिये ही परमात्मामें सार्वकालिक सर्वशक्तिमत्ता विद्यमान है। ईश्वर बलवान् हैं, शक्तिमान् हैं—यह व्यवहार देखा जाता है। महामुने वामदेव! लोक और वेदमें भी सदा ही परमात्माकी शिवरूपता और शक्तिरूपताका साक्षात्कार कराया गया है। शिव और शक्तिके संयोगसे निरन्तर आनन्द प्रकट रहता है, अतः मुने! उस आनन्दको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे ही पापरहित मुनि शिवमें मन लगाकर निरामय शिव (परम कल्याण एवं परमानन्द)-को प्राप्त हुए हैं। <u>उपनिषदोंमें शिव और शक्तिको ही सर्वात्मा एवं ब्रह्म कहा गया है।</u> ब्रह्म-शब्दसे बृंहिधात्वर्थगत व्यापकता एवं सर्वात्मताका ही प्रतिपादन होता है। शम्भु नामक विग्रहमें बृंहणत्व और बृहत्त्व (व्यापकता एवं विशालता) नित्य विद्यमान है। सद्योजातादि पंचब्रह्ममय शिवविग्रहमें विश्वकी प्रतीति ब्रह्म-शब्दसे ही कही गयी है।

वामदेव! 'हंसः' पदको उलट देनेसे 'सोऽहम्' पद बनता है। उसमें प्रणवका प्राकट्य कैसे होता है यह तुम्हारे स्नेहवश मैं बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। 'सोऽहम्' पदमेंसे सकार और हकार नामक

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