भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 659

* कैलाससंहिता * ६४५


पुरुष, श्रोत्र, वाणी, शब्द और आकाश—इन पाँचोंको ब्रह्मने ईशानरूपसे व्याप्त कर रखा है। मुनीश्वर! प्रकृति, त्वचा, पाणि, स्पर्श और वायु—इन पाँचको ब्रह्मने ही पुरुषरूपसे व्याप्त कर रखा है। अहंकार, नेत्र, पैर, रूप और अग्नि—ये पाँच अघोररूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं। बुद्धि, रसना, पायु, रस और जल—ये वामदेवरूपी ब्रह्मसे नित्य व्याप्त रहते हैं। मन, नासिका, उपस्थ, गन्ध और पृथिवी—ये पाँच सद्योजातरूपी ब्रह्मसे व्याप्त हैं। इस प्रकार यह जगत् पञ्चब्रह्मस्वरूप है। यन्त्ररूपसे बताया गया जो शिववाचक प्रणव है, वह नादपर्यन्त पाँचों वर्णोंका समष्टिरूप है तथा बिन्दुयुक्त जो चार वर्ण हैं, वे प्रणवके व्यष्टिरूप हैं। शिवके उपदेश किये हुए मार्गसे उत्कृष्ट मन्त्राधिराज शिवरूपी प्रणवका पूर्वोक्त यन्त्ररूपसे चिन्तन करना चाहिये। (अध्याय १४)

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शैवदर्शनके अनुसार शिवतत्त्व, जगत्-प्रपंच और जीवतत्त्वके विषयमें विशद विवेचन तथा शिवसे जीव और जगत्की अभिन्नताका प्रतिपादन

तदनन्तर उत्तम श्रेष्ठ पद्धतिका वर्णन करके सृष्टि, स्थिति और संहार—सबको शक्तिमान् शिवकी लीला बतलाते हुए वामदेवजीके पूछनेपर स्कन्दने कहा—मुने! कर्मास्तित्त्वसे लेकर जो विस्तृत शास्त्रवाद है अर्थात् कर्मसत्ताके प्रतिपादक कर्मफलवादसे आरम्भ करके शास्त्रोंमें जो विविध विषयोंका विशद विवेचन है, वह ज्ञान प्रदान करनेवाला है; अतः ज्ञानवान् पुरुषको विवेकपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये। तुमने जिन शिष्योंको उपदेश दिया है, उनमेंसे कौन तुम्हारे समान है? वे अधम शिष्य आज भी अन्यान्य शास्त्रोंमें भटक रहे हैं। अनीश्वरवादी दर्शनोंके चक्करमें पड़कर मोहित हो रहे हैं। छः मुनियोंने उन्हें शाप दे रखा है; क्योंकि पहले वे शिवकी निन्दा किया करते थे। अतः उनकी बातें नहीं सुननी चाहिये; क्योंकि वे अन्यथावादी (शिव-शास्त्रके विपरीत बात करनेवाले) हैं। यहाँ पाँच* अवयवोंसे युक्त अनुमानके प्रयोगके लिये भी अवकाश है ही। उत्तम


* प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन—ये अनुमानके पाँच अवयव हैं। 'पर्वतो वह्निमान्' (पर्वतपर आग है)—यह प्रतिज्ञा है। 'धूमवत्त्वात् (क्योंकि वहाँ धूम दिखायी देता है)—यह हेतु है। 'जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ आग अवश्य रहती है, जैसे रसोईघर'—यह उदाहरण है। 'यतोऽयं धूमवान्' (चूँकि यह पर्वत धूमवान् है)—यह उपनय है। 'अतः अग्निमान्' (अतः अग्निसे युक्त है) यह निगमन है। इसी तरह ईश्वरके लिये भी अनुमान होता है—यथा—'क्षित्यङ्कुरादिकं कर्तृजन्यम्' (पृथिवी तथा अंकुर आदि किसी कर्ताद्वारा उत्पन्न हुए हैं)—यह प्रतिज्ञा है। 'कार्यत्वात्' (क्योंकि ये कार्य हैं—) यह हेतु है। 'यत्-यत् कार्यं तत्तत् कर्तृजन्यं यथा घटः कुम्भकारजन्यः' (जो-जो कार्य है, वह किसी-न-किसी कर्तासे उत्पन्न होता है, जैसे घड़ा कुम्भकारसे उत्पन्न होता है—यह उदाहरण हुआ। 'यत इदं कार्यम्' (चूँकि ये पृथ्वी आदि कार्य हैं)—यह उपनय हुआ। 'अतः कर्तृजन्यम्' (इसलिये कर्तासे उत्पन्न हुए हैं)—यह निगमन हुआ। पृथ्वी आदि कार्य हम-जैसे लोगोंसे उत्पन्न हुआ है, यह कहना सम्भव नहीं; अतः इसका कोई विलक्षण कर्ता है, वही सर्वशक्तिमान् ईश्वर है।