भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 658

६४४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मन्त्र शिवमूर्तिका भी वाचक है; क्योंकि मूर्ति और मूर्तिमान्‌में अधिक भेद नहीं है। ‘ईशान मुकुटोपेतः’ इस श्लोकसे आरम्भ करके पहले इन मन्त्रोंद्वारा शिवके विग्रहका प्रतिपादन किया जा चुका है। अब उनके पाँच मुखोंका वर्णन सुनो। पंचम मन्त्र ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्’ को आदि मानकर वहाँसे लेकर ऊपरके ‘सद्योजात’ मन्त्रतक क्रमशः एक चक्रमें अंकित करे। फिर ‘सद्योजात’ से लेकर ‘ईशान’ मन्त्रतक क्रमशः उसी चक्रमें अंकित करे। ये ही पाँच भगवान् शिवके पाँच मुख बताये गये हैं। पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो ब्रह्मरूप चार मन्त्र हैं, वे ही महेश्वरदेवके चतुर्व्यूह पदपर प्रतिष्ठित हैं। ‘ईशान’ मन्त्र सद्योजातादि पाँचों मन्त्रोंका समष्टिरूप है। मुने! पुरुषसे लेकर सद्योजाततक जो चार मन्त्र हैं, वे ईशानदेवके व्यष्टिरूप हैं।

इसे अनुग्रहमय चक्र कहते हैं। यही पंचार्थका कारण है। यह सूक्ष्म, निर्विकार, अनामय परब्रह्मस्वरूप है। अनुग्रह भी दो प्रकारका है। एक तो तिरोभाव आदि पाँच$^१$ कृत्योंके अन्तर्गत है, दूसरा जीवोंको कार्यकारण आदिके बन्धनोंसे मुक्ति देनेमें समर्थ है। यह दोनों प्रकारका अनुग्रह सदाशिवका ही द्विविध कृत्य कहा गया है। मुने! अनुग्रहमें भी सृष्टि आदि कृत्योंका योग होनेसे भगवान् शिवके पाँच कृत्य माने गये हैं। इन पाँचों कृत्योंमें भी सद्योजात आदि देवता प्रतिष्ठित बताये गये हैं। वे पाँचों परब्रह्मस्वरूप तथा सदा ही कल्याणदायक हैं। अनुग्रहमय चक्र शान्त्यतीत$^२$ कलारूप है। सदाशिवसे अधिष्ठित होनेके कारण उसे परम पद कहते हैं। शुद्ध अन्तःकरणवाले संन्यासियोंको मिलनेयोग्य पद यही है। जो सदाशिवके उपासक हैं और जिनका चित्त प्रणवोपासनामें संलग्न है, उन्हें भी इसी पदकी प्राप्ति होती है। इसी पदको पाकर मुनीश्वरगण उन ब्रह्मरूपी महादेवजीके साथ प्रचुर दिव्य भोगोंका उपभोग करके महाप्रलयकालमें शिवकी समताको प्राप्त हो जाते हैं। वे मुक्त जीव फिर कभी संसारसागरमें नहीं गिरते।

ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे॥
(मुण्डक० ३।२।६)

—इस सनातन श्रुतिने इसी अर्थका प्रतिपादन किया है। शिवका ऐश्वर्य भी यह समष्टिरूप ही है। अथर्ववेदकी श्रुति भी कहती है कि वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न है। सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करनेकी शक्ति सदाशिवमें ही बतायी गयी है। चमकाध्यायके पदसे यह सूचित होता है कि शिवसे बढ़कर दूसरा कोई पद नहीं है। ब्रह्मपंचकके विस्तारको ही प्रपंच कहते हैं। इन पाँच ब्रह्ममूर्तियोंसे ही निवृत्ति आदि पाँच कलाएँ हुई हैं। वे सब-की-सब सूक्ष्मभूत स्वरूपिणी होनेसे कारणरूपमें विख्यात हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वामदेव! स्थूल-रूपमें प्रकट जो यह जगत्-प्रपंच है, इसको जिसने पाँच रूपोंद्वारा व्याप्त कर रखा है, वह ब्रह्म अपने उन पाँचों रूपोंके साथ ब्रह्मपंचक नाम धारण करता है। मुनिश्रेष्ठ!


$^१$सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव तथा अनुग्रह—ये परमेश्वरके पाँच कृत्य हैं।
$^२$कलाएँ पाँच हैं—निवृत्तिकला, प्रतिष्ठाकला, विद्याकला, शान्तिकला तथा शान्त्यतीताकला।

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