भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 850 में से

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पृष्ठ 657

* कैलाससंहिता *      ६४३

प्रणवके अर्थोंका विवेचन

वामदेवजी बोले—भगवान् षडानन! सम्पूर्ण विज्ञानमय अमृतके सागर! समस्त देवताओंके स्वामी महेश्वरके पुत्र! प्रणतार्तिके भंजन कार्तिकेय! आपने कहा है कि प्रणवके छः प्रकारके अर्थोंका परिज्ञान अभीष्ट वस्तुको देनेवाला है। यह छः प्रकारके अर्थोंका ज्ञान क्या है? प्रभो! वे छः प्रकारके अर्थ कौन-कौनसे हैं और उनका परिज्ञान क्या वस्तु है? उनके द्वारा प्रतिपाद्य वस्तु क्या है और उन अर्थोंका परिज्ञान होनेपर कौन-सा फल मिलता है? पार्वतीनन्दन! मैंने जो-जो बातें पूछी हैं, उन सबका सम्यक्-रूपसे वर्णन कीजिये।

सुब्रह्मण्य स्कन्द बोले—मुनिश्रेष्ठ! तुमने जो कुछ पूछा है, उसे आदरपूर्वक सुनो। समष्टि और व्यष्टिभावसे महेश्वरका परिज्ञान ही प्रणवार्थका परिज्ञान है। मैं इस विषयको विस्तारके साथ कहता हूँ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! मेरे इस प्रवचनसे उन छः प्रकारके अर्थोंकी एकताका भी बोध होगा। पहला मन्त्ररूप अर्थ है, दूसरा यन्त्रभावित अर्थ है, तीसरा देवताबोधक अर्थ है, चौथा प्रपंचरूप अर्थ है, पाँचवाँ अर्थ गुरुके रूपको दिखानेवाला है और छठा अर्थ शिष्यके स्वरूपका परिचय देनेवाला है। इस प्रकार ये छः अर्थ बताये गये। मुनिश्रेष्ठ! उन छहों अर्थोंमें जो मन्त्ररूप अर्थ है, उसको तुम्हें बताता हूँ। उसका ज्ञान होनेमात्रसे मनुष्य महाज्ञानी हो जाता है। प्रणवमें वेदोंने पाँच अक्षर बताये हैं, पहला आदिस्वर—'अ', दूसरा पाँचवाँ स्वर—'उ', तीसरा पंचम वर्ग पवर्गका अन्तिम अक्षर 'म', उसके बाद चौथा अक्षर बिन्दु और पाँचवाँ अक्षर नाद। इनके सिवा दूसरे वर्ण नहीं हैं। यह समष्टिरूप वेदादि (प्रणव) कहा गया है। नाद सब अक्षरोंकी समष्टिरूप है; बिन्दु-युक्त जो चार अक्षर हैं, वे व्यष्टिरूपसे शिववाचक प्रणवमें प्रतिष्ठित हैं।

विद्वन्! अब यन्त्ररूप या यन्त्रभावित अर्थ सुनो। वह यन्त्र ही शिवलिंगरूपमें स्थित है। सबसे नीचे पीठ (अर्घा) लिखे। उसके ऊपर पहला स्वर अकार लिखे। उसके ऊपर उकार अंकित करे और उसके भी ऊपर पवर्गका अन्तिम अक्षर मकार लिखे। मकारके ऊपर अनुस्वार और उसके भी ऊपर अर्धचन्द्राकार नाद अंकित करे। इस तरह यन्त्रके पूर्ण हो जानेपर साधकका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होता है। इस प्रकार यन्त्र लिखकर उसे प्रणवसे ही वेष्टित करे। उस प्रणवसे ही प्रकट होनेवाले नादके द्वारा नादका अवसान समझे।

मुने! अब मैं देवतारूप तीसरे अर्थको बताऊँगा, जो सर्वत्र गूढ़ है। वामदेव! तुम्हारे स्नेहवश भगवान् शंकरके द्वारा प्रतिपादित उस अर्थका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। 'सद्योजातं प्रपद्यामि' यहाँसे आरम्भ करके 'सदाशिवोम्' तक जो पाँच* मन्त्र हैं, श्रुतिने प्रणवको इन सबका वाचक कहा है। इन्हें ब्रह्मरूपी पाँच सूक्ष्म देवता समझना चाहिये। इन्हींका शिवकी मूर्तिके रूपमें भी विस्तारपूर्वक वर्णन है। शिवका वाचक


* इन पाँचों मन्त्रोंका उल्लेख पहले हो चुका है।

789 संक्षिप्त शिवपुराण—21 C

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