भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

६४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

संयममें रखे। फिर धीरेसे उठकर प्रेमपूर्वक अपने गुरुकी ओर देखते हुए हाथ जोड़ उनके चरणोंके समीप खड़ा हो जाय। संन्यासदीक्षा-विषयक कर्म आरम्भ होनेके पहले ही शुद्ध गोबर लेकर आँवले बराबर उसके गोले बना ले और सूर्यकी किरणोंसे ही उन्हें सुखाये। फिर होम आरम्भ होनेपर उन गोलोंको होमाग्नि के बीचमें डाल दे। होम समाप्त होनेपर उन सबको संग्रह करके सुरक्षित रखे। तदनन्तर दण्डधारणके पश्चात् गुरु विरजाग्निजनित उस श्वेत भस्मको लेकर उसीको शिष्यके अंगोंमें लगाये अथवा उसे लगानेकी आज्ञा दे। उसका क्रम इस प्रकार है। 'ॐ अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्म सर्वꣳ ह वा इदं भस्म मन एतानि चक्षूꣳषि' इस मन्त्रसे भस्मको अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर ईशानादि पाँच मन्त्रोंद्वारा उस भस्मका शिष्यके अंगोंसे स्पर्श कराकर उसे मस्तकसे लेकर पैरोंतक सर्वांगमें लगानेके लिये दे दे। शिष्य उस भस्मको विधिपूर्वक हाथमें लेकर 'त्र्यायुषम्०'$^१$, तथा 'त्र्यम्बकम्०'$^२$, इन दोनों मन्त्रोंको तीन-तीन बार पढ़ते हुए ललाट आदि अंगोंमें क्रमशः त्रिपुण्ड्र धारण करे।

तत्पश्चात् श्रेष्ठ शिष्य अपने हृदय-कमलमें विराजमान उमासहित भगवान् शंकरका भक्तियुक्त चित्तसे ध्यान करे। फिर गुरु शिष्यके मस्तकपर हाथ रखकर उसके दाहिने कानमें ऋषि, छन्द और देवतासहित प्रणवका उपदेश करे। इसके बाद कृपा करके प्रणवके अर्थका भी बोध कराये। श्रेष्ठ गुरुको चाहिये कि वह प्रणवके छः प्रकारके अर्थका ज्ञान कराते हुए उसके बारह भेदोंका उपदेश दे। तत्पश्चात् शिष्य दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर गुरुको साष्टांग प्रणाम करे और सदा उनके अधीन रहे, उनकी आज्ञाके बिना दूसरा कोई कार्य न करे। गुरुकी आज्ञासे शिष्य वेदान्तके तात्पर्यके अनुसार सगुण-निर्गुणभेदसे शिवके ज्ञानमें तत्पर रहे। गुरु अपने उसी शिष्यके द्वारा श्रवण, मनन और निदिध्यासनपूर्वक जपके अन्तमें प्रातःकालिक आदि नियमोंका अनुष्ठान करवाये। कैलासप्रस्तर नामक मण्डलमें शिवके द्वारा प्रतिपादित मार्गके अनुसार शिष्य वहीं रहकर शिवपूजन करे। यदि गुरुके आदेशके अनुसार वह प्रतिदिन वहीं रहकर मंगलमय देवता शिवकी पूजा करनेमें असमर्थ हो तो उनसे अर्घासहित स्फटिकमय शिवलिंग ग्रहण कर ले और कहीं भी रहकर नित्य उसका पूजन किया करे। वह गुरुके निकट शपथ खाते हुए इस तरह प्रतिज्ञा करे—'मेरे प्राण चले जायें, यह अच्छा है। मेरा सिर काट लिया जाय, यह भी अच्छा है; परंतु मैं भगवान् त्रिलोचनकी पूजा किये बिना कदापि भोजन नहीं कर सकता।' ऐसा कहकर सुदृढ़ चित्तवाला शिष्य मनमें शिवकी भक्ति लिये गुरुके निकट तीन बार शपथ खाय और तभीसे मनमें उत्साह रखकर उत्तम भक्तिभावसे पंचावरण-पूजनकी पद्धतिके अनुसार प्रतिदिन महादेवजीकी पूजा करे। (अध्याय १३)


१- त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्। यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽस्तु त्र्यायुषम्॥ (यजुर्वेद ३।६२)
२- त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ (यजुर्वेद ३।६०)

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