भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

६५० * संक्षिप्त शिवपुराण *

महावाक्योंके अर्थपर विचार तथा संन्यासियोंके योगपट्टका प्रकार

स्कन्दजी कहते हैं—मुने अब महावाक्य प्रस्तुत किये जाते हैं— *

१-प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐतरेय० ३।३ तथा आत्मप्र० १),
२-अहं ब्रह्मास्मि (बृहदारण्यक० १।४।१०),
३-तत्त्वमसि (छा० उ० खं० ८ से १६ तक),
४-अयमात्मा ब्रह्म (माण्डूक्य० २; बृह० २।५।१९),
५-ईशा वास्यमिदं सर्वम् (ईशा० १),
६-प्राणोऽस्मि (कौषी० ३),
७-प्रज्ञानात्मा (कौषी० ३),
८-यदवेह तदमुत्र तदन्विह (कठ० २।१।१०)
९-अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि (केन० १।३),
१०-एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः (बृह० ३।७।३—२३),
११-स यश्चायं पुरुषो यश्चासावादित्ये स एकः, (तैत्तिरीय० २।८),
१२-अहमस्मि परं ब्रह्म परात्परम्।
१३-वेदशास्त्रगुरूणां तु स्वयमानन्दलक्षणम्।
१४-सर्वभूतस्थितं ब्रह्म तदेवाहं न संशयः।
१५-तत्त्वस्य प्राणोऽहमस्मि पृथिव्याः प्राणोऽहमस्मि,
१६-अपां च प्राणोऽहमस्मि तेजसश्च प्राणोऽहमस्मि,
१७-वायोश्च प्राणोऽहमस्मि आकाशस्य प्राणोऽहमस्मि,
१८-त्रिगुणस्य प्राणोऽहमस्मि,
१९-सर्वोऽहं सर्वात्मको संसारी यद्भूतं यच्च भव्यं यद्वर्तमानं सर्वात्मकत्वादद्वितीयोऽहम्,
२०-सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य० ३।१४।१),
२१-सर्वोऽहं विमुक्तोऽहम्।
२२-योऽसौ सोऽहं हंसः सोऽहमस्ति।

इस प्रकार सर्वत्र चिन्तन करे। अब इन महावाक्योंका भावार्थ कहते हैं—'प्रज्ञानं ब्रह्म' का वाक्यार्थ पहले ही समझाया जा चुका है। (अब 'अहं ब्रह्मास्मि' का अर्थ बताया जाता है।) शक्तिस्वरूप अथवा शक्तियुक्त परमेश्वर ही 'अहम्' पदके अर्थभूत


* इन वाक्योंका साधारण अर्थ यों समझना चाहिये—१-ब्रह्म उत्कृष्ट ज्ञानस्वरूप अथवा चैतन्यरूप है। २-वह ब्रह्म मैं हूँ। ३-वह ब्रह्म तू है। ४-यह आत्मा ब्रह्म है। ५-यह सब ईश्वरसे व्याप्त है। ६-मैं प्राण हूँ। ७-प्रज्ञानस्वरूप हूँ। ८-जो परब्रह्म यहाँ है, वही वहाँ (परलोकमें) भी है; जो वहाँ है, वही यहाँ (इस लोकमें) भी है। ९-वह ब्रह्म विदित (ज्ञात वस्तुओं)-से भिन्न है और अविदित (अज्ञात)-से भी ऊपर है। १०-वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। ११-वह जो यह पुरुषमें है और वह जो यह आदित्यमें है, एक ही है। १२-मैं परापरस्वरूप परात्पर परब्रह्म हूँ। १३-वेदों, शास्त्रों और गुरुजनोंके वचनोंसे स्वयं ही हृदयमें आनन्दस्वरूप ब्रह्मका अनुभव होने लगता है। १४-जो सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित है, वही ब्रह्म मैं हूँ—इसमें संशय नहीं है। १५-मैं तत्त्वका प्राण हूँ, पृथिवीका प्राण हूँ। १६-मैं जलका प्राण हूँ, तेजका प्राण हूँ। १७-वायुका प्राण हूँ, आकाशका प्राण हूँ। १८-मैं त्रिगुणका प्राण हूँ। १९-मैं सब हूँ, सर्वरूप हूँ, संसारी जीवात्मा हूँ; जो भूत, वर्तमान और भविष्य है, वह सब मेरा ही स्वरूप होनेके कारण मैं अद्वितीय परमात्मा हूँ। २०-यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। २१-मैं सर्वरूप हूँ, मुक्त हूँ। २२-जो वह है, वह मैं हूँ। मैं वह हूँ और वह मैं हूँ।