शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें- कैलाससंहिता * ६५१
हैं। 'अकार' सब वर्णोंका अग्रगण्य, परम प्रकाश शिवरूप है। 'हकार' व्योमस्वरूप होनेके कारण उसका शक्तिरूपसे वर्णन किया गया है। शिव और शक्तिके संयोगसे सदा आनन्द उदित होता है। 'मकार' उसी आनन्दका बोधक है। 'ब्रह्म' शब्दसे शिवशक्तिकी सर्वरूपता स्पष्ट ही सूचित होती है। पहले ही इस बातका उपदेश किया गया है कि वह शक्तिमान् परमेश्वर मैं हूँ, ऐसी भावना करनी चाहिये। (अब तत्त्वमसिका अर्थ कहते हैं—) 'तत्त्वमसि' इस वाक्यमें तत्पदका वही अर्थ है, जो 'सोऽहमस्मि' में 'सः' पदका अर्थ बताया गया है अर्थात् तत्पद शक्त्यात्मक परमेश्वरका ही वाचक है, अन्यथा 'सोऽहम्' इस वाक्यमें विपरीत अर्थकी भावना हो सकती है। क्योंकि 'अहम्' पद पुँल्लिंग है, अतः 'सः' के साथ उसका अन्वय हो जायगा; परंतु 'तत्' पद नपुंसक है और 'त्वम्' पुँल्लिंग, अतः परस्परविरोधी लिंग होनेके कारण उन दोनोंमें अन्वय नहीं हो सकता। जब दोनोंका अर्थ 'शक्तिमान् परमेश्वर' होगा, तब अर्थमें समान लिंगता होनेसे अन्वयमें अनुपपत्ति नहीं होगी। यदि ऐसा न माना जाय तो स्त्री-पुरुषरूप जगत्का कारण भी किसी और ही प्रकारका होगा। इसलिये 'सोऽहमस्मि' का 'सः' और 'तत्त्वमसि' का तत्—ये दोनों समानार्थक हैं। इन महावाक्योंके उपदेशसे एक ही अर्थकी भावनाका विधान है।
(अब 'अयमात्मा ब्रह्म' का अर्थ बताया जाता है—) 'अयमात्मा ब्रह्म' इस वाक्यमें 'अयम्' और 'आत्मा'—ये दोनों पद पुँल्लिंग-रूप हैं। अतः यहाँ अन्वयमें बाधा नहीं है। 'अयम्' शक्तिमान् परमेश्वररूप आत्मा ब्रह्म है—यह इस वाक्यका तात्पर्य है। (अब 'ईशा वास्यमिदं सर्वम्' का भावार्थ बता रहे हैं—) परमेश्वरसे रक्षणीय होनेके कारण यह सम्पूर्ण जगत् उनसे व्याप्त है। (अब 'प्राणोऽस्मि' 'प्रज्ञानात्मा' और 'यदेवेह तदमुत्र०' इन वाक्योंके अर्थपर विचार किया जाता है—) मैं प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ। यहाँ प्राण शब्द परमेश्वरका ही वाचक है। जो यहाँ है, वह वहाँ है—ऐसा चिन्तन करे। यहाँ 'यत्, तत्' का अर्थ क्रमशः 'यः' और 'सः' है अर्थात् जो परमात्मा यहाँ है, वह परमात्मा वहाँ है—ऐसा सिद्धान्तपक्षका अवलम्बन करनेवाले विद्वानोंने कहा है। उपर्युक्त वाक्यमें 'यदमुत्र तदन्विह' इस वाक्यांशका भाव यह है कि 'योऽमुत्र स इह स्थितः' अर्थात् जो परमात्मा वहाँ परलोकमें स्थित है, वही यहाँ (इस लोकमें) भी स्थित है। इस प्रकार विद्वानोंको पहलेके समान ही परमपुरुष परमात्मारूप अर्थ यहाँ अभीष्ट है।
(अब 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' इस वाक्यपर विचार करते हैं—) मुने! 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' इस वाक्यमें जिस प्रकार फलकी भी विपरीतताकी भावना होती है, उसे यहाँ बताता हूँ; सुनो। 'विदितात्' यह पद 'अयथाविदितात्' के उन्हींका इन समस्त उत्कृष्ट गुणोंसे नित्य सम्बन्ध है। अपने और परायेके 'भेदसतात्' के अर्थमें प्रवृत्त हो सकता है। वह विदितसे भिन्न है अर्थात् जो असम्यग्रूपसे ज्ञात है, उससे भिन्न है। इसी प्रकार जो यथावत्रूपसे विदित नहीं है, उससे भी पृथक् है। इस कथनसे यह निश्चित होता है कि मुक्तिरूप फलकी सिद्धिके लिये कोई और ही तत्त्व है, जो विदिताविदितसे पर है।