भारतकोश
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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

६५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

यतिके लिये एकादशाह-कृत्यका वर्णन

स्कन्दजी कहते हैं—वामदेव! यतिका एकादशाह प्राप्त होनेपर जो विधि बतायी गयी है, उसका मैं तुम्हारे स्नेहवश वर्णन करता हूँ। मिट्टीकी वेदी बनाकर उसका सम्मार्जन और उपलेपन करे। तत्पश्चात् पुण्याहवाचनपूर्वक प्रोक्षण करके पश्चिमसे लेकर पूर्वकी ओर पाँच मण्डल बनाये और स्वयं श्राद्धकर्ता उत्तराभिमुख बैठकर कार्य करे। प्रादेशमात्र लंबा-चौड़ा चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें बिन्दु, उसके ऊपर त्रिकोण मण्डल, उसके ऊपर षट्कोण मण्डल और उसके ऊपर गोल मण्डल बनावे। फिर अपने सामने शंखकी स्थापना करके पूजाके लिये बतायी हुई पद्धतिके क्रमसे आचमन, प्राणायाम एवं संकल्प करके पूर्वोक्त पाँच आतिवाहिक देवताओंका देवेश्वरी देवियोंके रूपमें पूजन करे। उत्तर ओर आसनके लिये कुश डालकर जलका स्पर्श करे। पश्चिमसे आरम्भ करके पूर्वपर्यन्त जो मण्डल बताये गये हैं, उनके भीतर पीठके रूपमें पुष्प रखे और उन पुष्पोंपर क्रमशः उक्त पाँचों देवियोंका आवाहन करे। पहले अग्नि-पुंजस्वरूपिणी आतिवाहिक देवीका आवाहन करते हुए इस प्रकार कहे—'ॐ ह्रीं अग्निरूपामातिवाहिकदेवताम् आवाहयामि नमः'। इस प्रकार सर्वत्र वाक्ययोजना और भावना करे। इस तरह पाँचों देवियोंका आवाहन करके प्रत्येकके लिये आदरपूर्वक स्थापना आदि मुद्राओंका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् हां ह्रीं हूं हैं हौं हः—इन बीजमन्त्रोंद्वारा षडंगन्यास और करन्यास करे। इसके बाद उन देवियोंका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये। उन सबके चार-चार हाथ हैं। उनमेंसे दो हाथोंमें वे पाश और अंकुश धारण करती हैं तथा शेष दो हाथोंमें अभय और वरद मुद्राएँ हैं। उनकी अंगकान्ति चन्द्रकान्तिमणिके समान है। लाल अँगूठियोंकी प्रभासे उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंके मुख-मण्डलको रँग दिया है। वे लाल वस्त्र धारण करती हैं। उनके हाथ और पैर कमलोंके समान शोभा पाते हैं। तीन नेत्रोंसे सुशोभित मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमाकी छटासे वे मनको मोहे लेती हैं। माणिक्य-निर्मित मुकुटोंसे उद्भासित चन्द्रलेखा उनके सीमन्तको विभूषित कर रही है। कपोलोंपर रत्नमय कुण्डल झलमला रहे हैं। उनके उरोज पीन तथा उन्नत हैं। हार, केयूर, कड़े और करधनीकी लड़ियोंसे विभूषित होनेके कारण वे बड़ी मनोहारिणी जान पड़ती हैं। उनका कटिभाग कृश और नितम्ब स्थूल हैं। उनके अंग लाल रंगके दिव्य वस्त्रोंसे आच्छादित हैं। चरणारविन्दोंमें माणिक्य-निर्मित पायजेबोंकी झनकार होती रहती है। पैरोंकी अँगुलियोंमें बिछुओंकी पंक्ति अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर है।

यदि अनुग्रह मुर्देके समान मूर्तिमान् हो तो उससे क्या सिद्ध हो सकता है। इसलिये वे देवियाँ महेश्वरकी भाँति शक्त्यात्मक मूर्तिवाले अनुग्रहसे सम्पन्न हैं। अतः उनके अनुग्रहसे सब कुछ सिद्ध हो सकता है। सबपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् शिवने ही उन पाँच मूर्तियोंको स्वीकार किया है। इसलिये वे दिव्य, सम्पूर्ण कार्य करनेमें समर्थ तथा परम अनुग्रहमें तत्पर हैं। इस प्रकार उन सब अनुग्रहपरायण कल्याणमयी

* कैलाससंहिता * \hfill ६५९

देवियोंका ध्यान करके इनके लिये शंखस्थ जलके बिन्दुओंद्वारा पैरोंमें पाद्य, हाथोंमें आचमनीय तथा मस्तकोंपर अर्घ्य देना चाहिये। तदनन्तर शंखके जलकी बूँदोंसे उनका स्नानकर्म सम्पन्न कराना चाहिये। स्नानके पश्चात् दिव्य लाल रंगके वस्त्र और उत्तरीय अर्पित करे। बहुमूल्य मुकुट एवं आभूषण दे (इन वस्तुओंके अभावमें मनके द्वारा भावना करके इन्हें अर्पित करना चाहिये)। तत्पश्चात् सुगन्धित चन्दन, अत्यन्त सुन्दर अक्षत तथा उत्तम गन्धसे युक्त मनोहर पुष्प चढ़ाये। अत्यन्त सुगन्धित धूप और घीकी बत्तीसे युक्त दीपक निवेदन करे। इन सब वस्तुओंको अर्पण करते समय आरम्भमें 'ओं ह्रीं' का प्रयोग करके फिर 'समर्पयामि नमः' बोलना चाहिये यथा 'ॐ ह्रीं अग्न्यादिरूपाभ्यः पञ्चदेवीभ्यः दीपं समर्पयामि नमः।' इसी तरह अन्य उपचारोंको अर्पित करते समय वाक्ययोजना कर लेनी चाहिये।

दीपसमर्पणके पश्चात् हाथ जोड़कर प्रत्येक देवीके लिये पृथक्-पृथक् केलेके पत्तेपर पूरा-पूरा सुवासित नैवेद्य रखे। वह नैवेद्य घी, शक्कर और मधुसे मिश्रित खीर, पूआ, केलेके फल और गुड़ आदिके रूपमें होना चाहिये। 'भूर्भुवः स्वः' बोलकर उसका प्रोक्षण आदि संस्कार करे। फिर 'ॐ ह्रीं स्वाहा नैवेद्यं निवेदयामि नमः' बोलकर नैवेद्य-समर्पणके पश्चात् 'ॐ ह्रीं नैवेद्यान्ते आचमनार्थं पानीय समर्पयामि नमः।' कहते हुए बड़े प्रेमसे जल अर्पित करे। मुनिश्रेष्ठ! तत्पश्चात् प्रसन्नतापूर्वक नैवेद्यको पूर्वदिशामें हटा दे और उस स्थानको शुद्ध करके कुल्ला, आचमन तथा अर्घ्यके लिये जल दे। फिर ताम्बूल, धूप और दीप देकर परिक्रमा एवं नमस्कार करके मस्तकपर हाथ जोड़ इन सब देवियोंसे इस प्रकार प्रार्थना करे—'हे श्रीमाताओ! आप अत्यन्त प्रसन्न हो शिवपदकी अभिलाषा रखनेवाले इस यतिको परमेश्वरके चरणारविन्दोंमें रख दें और इसके लिये अपनी स्वीकृति दें।' इस प्रकार प्रार्थना करके उन सबका, वे जैसे आयी थीं, उसी तरह विदा देकर, विसर्जन कर दे और उनका प्रसाद लेकर कुमारी कन्याओंको बाँट दे या गौओंको खिला दे अथवा जलमें डाल दे। इनके सिवा और कहीं किसी प्रकार भी न डाले।

यहीं पार्वण करे। यतिके लिये कहीं भी एकोद्दिष्ट-श्राद्धका विधान नहीं है। यहाँ पार्वण-श्राद्धके लिये जो नियम है, उसे मैं बता रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ! तुम उसे सुनो। इससे कल्याणकी प्राप्ति होगी। श्राद्धकर्ता पुरुष स्नान करके प्राणायाम करे। यज्ञोपवीत पहन सावधान हो हाथमें पवित्री धारण करके देश-कालका कीर्तन करनेके पश्चात् 'मैं इस पुण्यतिथिको पार्वण-श्राद्ध करूँगा' इस तरह संकल्प करे। संकल्पके बाद उत्तर-दिशामें आसनके लिये उत्तम कुश बिछाये। फिर जलका स्पर्श करे। उन आसनोंपर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले चार शिवभक्त ब्राह्मणोंको बुलाकर भक्तिभावसे बिठाये। वे ब्राह्मण उबटन लगाकर स्नान किये होने चाहिये। उनमेंसे एक ब्राह्मणसे कहे—'आप विश्वेदेवके लिये यहाँ श्राद्ध ग्रहण करनेकी कृपा करें।' इसी तरह दूसरेसे आत्माके लिये, तीसरेसे अन्तरात्माके लिये और चौथेसे परमात्माके लिये श्राद्ध ग्रहण

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करनेकी प्रार्थना करके श्राद्धकर्ता यति श्रद्धा और आदरपूर्वक उन सबका यथोचितरूपसे वरण करे। फिर उन सबके पैर धोकर उन्हें पूर्वाभिमुख बिठाये और गन्ध आदिसे अलंकृत करके शिवके सम्मुख भोजन कराये। तदनन्तर वहाँ गोबरसे भूमिको लीपकर पूर्वाग्र कुश बिछाये और प्राणायामपूर्वक पिण्डदानके लिये संकल्प करके तीन मण्डलोंकी पूजा करे। इसके बाद पहले पिण्डको हाथमें ले 'आत्मने इमं पिण्डं ददामि' ऐसा कहकर उस पिण्डको प्रथम मण्डलमें दे दे। तत्पश्चात् दूसरे पिण्डको 'अन्तरात्मने इमं पिण्डं ददामि' कहकर दूसरे मण्डलमें दे दे। फिर तीसरे पिण्डको 'परमात्मने इमं पिण्डं ददामि' कहकर तीसरे मण्डलमें अर्पित करे। इस तरह भक्तिभावसे विधिपूर्वक पिण्ड और कुशोदक दे। तत्पश्चात् उठकर परिक्रमा और नमस्कार करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको विधिवत् दक्षिणा दे। उसी जगह और उसी दिन नारायणबलि करे। रक्षाके लिये ही सर्वत्र श्रीविष्णुकी पूजाका विधान है। अतः विष्णुकी महापूजा करे और खीरका नैवेद्य लगाये। इसके बाद वेदोंके पारंगत बारह विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलाकर केशव आदि नाम-मन्त्रोंद्वारा गन्ध, पुष्प और अक्षत आदिसे उनकी पूजा करे। उनके लिये विधिपूर्वक जूता, छाता और वस्त्र आदि दे। अत्यन्त भक्तिसे भाँति-भाँतिके शुभ वचन कहकर उन्हें संतोष दे। फिर पूर्वाग्र कुशोंको बिछाकर 'ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ सुवः स्वाहा' ऐसा उच्चारण करके पृथ्वीपर खीरकी बलि दे। मुनीश्वर ! यह मैंने एकादशाहकी विधि बतायी है। अब द्वादशाहकी विधि बताता हूँ, आदरपूर्वक सुनो।

(अध्याय २२)


यतिके द्वादशाह-कृत्यका वर्णन, स्कन्द और वामदेवका कैलास पर्वतपर जाना तथा सूतजीके द्वारा इस संहिताका उपसंहार

स्कन्दजी कहते हैं—वामदेव! बारहवें दिन प्रातःकाल उठकर श्राद्धकर्ता पुरुष स्नान और नित्यकर्म करके शिवभक्तों, यतियों अथवा शिवके प्रति प्रेम रखनेवाले ब्राह्मणोंको* निमन्त्रित करे। मध्याह्नकालमें स्नान करके पवित्र हुए उन ब्राह्मणोंको बुलाकर भक्तिभावसे विधिपूर्वक भाँति-भाँतिके स्वादिष्ट अन्न भोजन कराये। फिर परमेश्वरके निकट बिठाकर पंचावरण-पद्धतिसे उनका पूजन करे। तत्पश्चात् मौनभावसे प्राणायाम करके देश-काल आदिके कीर्तनपूर्वक महान् संकल्पकी प्रणालीके अनुसार संकल्प करते हुए—'अस्मद्गुरोरिह पूजां करिष्ये (मैं अपने गुरुकी यहाँ पूजा करूँगा)' ऐसा कहकर कुशोंका स्पर्श करे। फिर


* धर्मसिन्धुके अनुसार सोलह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये। इनमेंसे चार तो गुरु, परमगुरु, परमेष्ठिगुरु और परात्पर गुरुके लिये होते हैं और बारह ब्राह्मणोंकी केशवादि नामोंसे पूजा होती है। परंतु इस पुराणमें दिये गये वर्णनके अनुसार बारह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना आवश्यक है।

  • कैलाससंहिता * ६६१

ब्राह्मणोंके पैर धोकर आचमन करके श्राद्धकर्ता मौन रहे और भस्मसे विभूषित उन ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख आसनपर बिठाये। वहाँ सदाशिव आदिके क्रमसे उन आठ ब्राह्मणोंका बड़े आदरके साथ चिन्तन करे अर्थात् उन्हें सदाशिव आदिका स्वरूप माने। मुने ! अन्य चार ब्राह्मणोंका भी चार गुरुओंके रूपमें चिन्तन करे। चारों गुरु ये हैं—गुरु, परम गुरु, परात्पर गुरु और परमेष्ठी गुरु। परमेष्ठी गुरुका उनमें उमासहित महेश्वरकी भावना करते हुए चिन्तन करे। अपने गुरुका नाम लेकर ध्यान करे। उन सबके लिये ‘इदमासनम्’ ऐसा कहकर पृथक्-पृथक् आसन रखे। आदिमें प्रणव, बीचमें द्वितीयान्त गुरु तथा अन्तमें ‘आवाहयामि नमः’ बोलकर आवाहन करे। यथा— ॐ अमुकनामानं गुरुम् आवाहयामि नमः। ॐ परमगुरुम् आवाहयामि नमः। ॐ परात्परगुरुम् आवाहयामि नमः। ॐ परमेष्ठिगुरुम् आवाहयामि नमः। इस प्रकार आवाहन करके अर्घोदक (अर्घ्यमें रखे हुए जल)-से पाद्य, आचमन और अर्घ्य निवेदन करे। फिर वस्त्र, गन्ध और अक्षत देकर ‘ॐ गुरवे नमः’ इत्यादि रूपसे गुरुओंको तथा ‘ॐ सदाशिवाय नमः’ इत्यादि रूपसे आठ नामोंके उच्चारणपूर्वक आठ अन्य ब्राह्मणोंको सुगन्धित फूलोंसे अलंकृत करे। तत्पश्चात् धूप, दीप देकर ‘कृतमिदं सकलमाराधनं सम्पूर्णमस्तु (की गयी यह सारी आराधना पूर्णरूपसे सफल हो)’ ऐसा कहकर खड़ा हो नमस्कार करे। इसके बाद केलेके पत्तोंको पात्ररूपमें बिछाकर जलसे शुद्ध करके उनपर शुद्ध अन्न, खीर, पूआ, दाल और साग आदि व्यंजन परोसकर केलेके फल, नारियल और गुड़ भी रखे। पात्रोंको रखनेके लिये आसन भी अलग-अलग दे। उन आसनोंका क्रमशः प्रोक्षण करके उन्हें यथास्थान रखे। फिर भोजनपात्रका भी प्रोक्षण एवं अभिषेक करके हाथसे उसका स्पर्श करते हुए कहे— ‘विष्णो ! हव्यमिदं रक्षस्व (हे विष्णो ! इस हविष्यको आप सुरक्षित रखें)’ फिर उठकर उन ब्राह्मणोंको पीनेके लिये जल देकर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे—‘सदाशिवादयो मे प्रीता वरदा भवन्तु (सदाशिव आदि मुझपर प्रसन्न हो अभीष्ट वर देनेवाले हों)’।

इसके बाद ‘ये देवा’ (शु० यजु० १७। १३-१४) आदि मन्त्रका उच्चारण करके अक्षतसहित इस अन्नका त्याग करे। फिर नमस्कार करके उठे और ‘सर्वत्राकृतमस्तु।’ ऐसा कहकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट करके ‘गणानां त्वा’ (शु० यजु० २३। १९) इस मन्त्रका पहले पाठ करके चारों वेदोंके आदिमन्त्रोंका, रुद्राध्यायका, चमकाध्यायका, रुद्रसूक्तका तथा सद्योजातादि पाँच ब्रह्ममन्त्रोंका पाठ करे। ब्राह्मण-भोजनके अन्तमें भी यथासम्भव मन्त्र बोले और अक्षत छोड़े, फिर आचमनादि जल दे। हाथ-पैर और मुँह धोनेके लिये भी जल अर्पित करे। आचमनके पश्चात् सब ब्राह्मणोंको सुखपूर्वक आसनोंपर बिठाकर शुद्ध जल देनेके अनन्तर मुखशुद्धिके लिये यथोचित कपूर आदिसे युक्त ताम्बूल अर्पित करे। फिर दक्षिणा, चरणपादुका, आसन, छाता, व्यजन, चौकी और बाँसकी छड़ी देकर परिक्रमा और नमस्कारके द्वारा उन ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे तथा उनसे आशीर्वाद

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ले। पुनः प्रणाम करके गुरुके प्रति अविचल भक्तिके लिये प्रार्थना करे। तत्पश्चात् विसर्जनकी भावनासे कहे—'सदाशिवादयः प्रीता यथासुखं गच्छन्तु' (सदाशिव आदि संतुष्ट हो सुखपूर्वक यहाँसे पधारें)। इस प्रकार विदा करके दरवाजेतक उनके पीछे-पीछे जाय। फिर उनके रोकनेपर आगे न जाकर लौट आये। लौटकर द्वारपर बैठे हुए ब्राह्मणों, बन्धुजनों, दीनों और अनाथोंके साथ स्वयं भी भोजन करके सुखपूर्वक रहे। ऐसा करनेसे उसमें कहीं भी विकृति नहीं हो सकती। यह सब सत्य है, सत्य है और बारंबार सत्य है। इस प्रकार प्रतिवर्ष गुरुकी उत्तम आराधना करनेवाला शिष्य इस लोकमें महान् भोगोंका उपभोग करके अन्तमें शिवलोकको प्राप्त कर लेता है।

मुने! यह साक्षात् भगवान् शिवका कहा हुआ उत्तम रहस्य है, जो वेदान्तके सिद्धान्तसे निश्चित किया गया है। तुमने मुझसे जो कुछ सुना है, उसे विद्वान् पुरुष तुम्हारा ही मत कहेंगे। अतः यति इसी मार्गसे चलकर 'शिवोऽहमस्मि' (मैं शिव हूँ) इस रूपमें आत्मस्वरूप शिवकी भावना करता हुआ शिवरूप हो जाता है।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार मुनीश्वर वामदेवको उपदेश देकर दिव्य ज्ञानदाता गुरु देवेश्वर कार्तिकेय पिता-माताके सर्वदेव-वन्दित चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए अनेक शिखरोंसे आवृत, शोभाशाली एवं परम आश्चर्यमय कैलासशिखरको चले गये। श्रेष्ठ शिष्योंसहित वामदेव भी मयूर-वाहन कार्तिकेयको प्रणाम करके शीघ्र ही परम अद्भुत कैलासशिखरपर जा पहुँचे और महादेवजीके निकट जा उन्होंने उमासहित महेश्वरके मायानाशक मोक्षदायक चरणोंका दर्शन किया। फिर भक्तिभावसे अपना सारा अंग भगवान् शिवको समर्पित करके, वे शरीरकी सुधि भुलाकर उनके निकट दण्डकी भाँति पड़ गये और बारंबार उठ-उठकर नमस्कार करने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने भाँति-भाँतिके स्तोत्रोंद्वारा, जो वेदों और आगमोंके रससे पूर्ण थे, जगदम्बा और पुत्रसहित परमेश्वर शिवका स्तवन किया। इसके बाद देवी पार्वती और महादेवजीके चरणारविन्दको अपने मस्तकपर रखकर उनका पूर्ण अनुग्रह प्राप्त करके वे वहीं सुखपूर्वक रहने लगे। तुम सभी ऋषि भी इसी प्रकार प्रणवके अर्थभूत महेश्वरका तथा वेदोंके गोपनीय रहस्य, वेदसर्वस्व और मोक्षदायक तारक मन्त्र ॐकारका ज्ञान प्राप्त करके यहीं सुखसे रहो तथा विश्वनाथजीके चरणोंमें सायुज्यरूपा अनुपम एवं उत्तम मुक्तिका चिन्तन किया करो। अब मैं गुरुदेवकी सेवाके लिये बदरिकाश्रम तीर्थको जाऊँगा। तुम्हें फिर मेरे साथ सम्भाषणका एवं सत्संगका अवसर प्राप्त हो।

(अध्याय २३)

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॥ कैलाससंहिता सम्पूर्ण ॥
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वायवीयसंहिता (पूर्वखण्ड)

वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड )

प्रयागमें ऋषियोंद्वारा सम्मानित सूतजीके द्वारा कथाका आरम्भ, विद्यास्थानों एवं पुराणोंका परिचय तथा वायुसंहिताका प्रारम्भ

व्यास उवाच
नमः शिवाय सोमाय सगणाय ससूनवे।
प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थित्यन्तहेतवे॥
शक्तिरप्रतिमा यस्य ह्यैश्वर्यं चापि सर्वगम्।
स्वामित्वं च विभुत्वं च स्वभावं सम्प्रचक्षते॥
तमजं विश्वकर्माणं शाश्वतं शिवमव्ययम्।
महादेवं महात्मानं व्रजामि शरणं शिवम्॥

व्यासजी कहते हैं—जो जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहारके हेतु तथा प्रकृति और पुरुषके ईश्वर हैं, उन प्रमथगण, पुत्रद्वय तथा उमासहित भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनकी शक्तिकी कहीं तुलना नहीं है, जिनका ऐश्वर्य सर्वत्र व्यापक है तथा स्वामित्व और विभुत्व जिनका स्वभाव कहा गया है, उन विश्वस्रष्टा, सनातन, अजन्मा, अविनाशी, महान् देव, मंगलमय परमात्मा शिवकी मैं शरण लेता हूँ।

जो धर्मका क्षेत्र और महान् तीर्थ है, जहाँ गंगा और यमुनाका संगम हुआ है तथा जो ब्रह्मलोकका मार्ग है, उस प्रयागमें शुद्ध हृदयवाले सत्यव्रतपरायण महातेजस्वी एवं महाभाग मुनियोंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया। वहाँ क्लेशरहित कर्म करनेवाले उन महात्माओंके यज्ञका समाचार सुनकर निपुण कथावाचक, त्रिकालवेत्ता, उत्तम नीतिके ज्ञाता तथा क्रान्तदर्शी विद्वान् पौराणिकशिरोमणि सूतजी उस स्थानपर आये। सूतजीको आते देख मुनियोंका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने उनसे सान्त्वनापूर्ण मधुर बातें कहकर उनकी यथायोग्य पूजा की। मुनियोंद्वारा की हुई उस पूजाको ग्रहण करके सूतजीने उनकी प्रेरणासे अपने लिये बताये गये उपयुक्त आसनको स्वीकार किया। उस समय महर्षियोंने अनुकूल वचनोंद्वारा उनका सत्कार करते हुए उन्हें अत्यन्त अभिमुख करके यह बात कही।

ऋषि बोले—शिवभक्तशिरोमणि महाबुद्धिमान् महाभाग रोमहर्षणजी! आप सर्वज्ञ हैं और हमारे महान् सौभाग्यसे यहाँ पधारे हैं। तीनों लोकोंमें ऐसी कोई बात नहीं है, जो आपको विदित न हो। आप भाग्यवश हमें दर्शन देनेके लिये स्वयं यहाँ आ गये हैं। अतः अब हमारा कोई कल्याण किये बिना आपको यहाँसे व्यर्थ नहीं जाना चाहिये। इसलिये आप हमें शीघ्र वह पवित्र पुराण सुनायें, जो अत्यन्त श्रवणीय, उत्तम कथा और ज्ञानसे युक्त तथा वेदान्तके सारसर्वस्वसे सम्पन्न हो। वेदवादी मुनियोंने जब इस प्रकार प्रार्थना की, तब सूतजीने मधुर, न्याययुक्त एवं शुभ वचनोंमें उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।

सूतजीने कहा—महर्षियो! आपने मेरा सत्कार किया और मुझपर कृपा की है, ऐसी दशामें आपसे प्रेरित होकर मैं आपके समक्ष महर्षियोंद्वारा सम्मानित पुराणका भलीभाँति प्रवचन क्यों नहीं करूँगा। अब मैं महादेवजी, देवी पार्वती, कुमार स्कन्द, गणेशजी, नन्दी तथा सत्यवतीकुमार साक्षात् भगवान् व्यासको प्रणाम करके उस परम पवित्र वेदतुल्य पुराणकी कथा कहूँगा, जो शिवतत्त्वके ज्ञानका सागर है और भोग

६६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

एवं मोक्षरूपी फल देनेवाला साक्षात् साधन है। विद्याके सम्पूर्ण स्थानोंका, पुराणोंकी संख्याका और उनकी उत्पत्तिका विवरण दे रहा हूँ। आपलोग मुझसे इस विषयको ध्यानपूर्वक सुनें। छः वेदांग, चार वेद, मीमांसा, विस्तृत न्यायशास्त्र, पुराण और धर्मशास्त्र—ये चौदह विद्याएँ हैं। इनके साथ आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और उत्तम अर्थशास्त्रको भी गिन लिया जाय तो ये विद्याएँ अठारह हो जाती हैं। इन अठारह विद्याओंके मार्ग एक-दूसरेसे भिन्न हैं। इन सबके निर्माता त्रिकालदर्शी विद्वान् साक्षात् भगवान् शूलपाणि शिव हैं, ऐसा श्रुतिका कथन है। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी उन भगवान् शिवको जब समस्त संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, तब उन्होंने सबसे पहले अपने सनातन पुत्र साक्षात् ब्रह्माजीको उत्पन्न किया और अपने उन प्रथम पुत्र, विश्वयोनि ब्रह्माको परमेश्वर शिवने जगत्की सृष्टिका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पहले ये सब विद्याएँ दीं। उसके बाद उन्होंने पालन करनेके लिये भगवान् श्रीहरिको नियुक्त किया और उन्हें जगत्की रक्षाके लिये शक्ति प्रदान की। वे भगवान् विष्णु ब्रह्माजीके भी पालक हैं। ब्रह्माजी विद्या प्राप्त करके जब प्रजाकी सृष्टिके विस्तारकार्यमें लगे, तब उन्होंने सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पहले पुराणको ही स्मरण किया और उन्हींको वे प्रकाशमें लाये। पुराणोंके प्रकट होनेके अनन्तर उनके चार मुखोंसे चारों वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ। फिर उन्हींके मुखसे सम्पूर्ण शास्त्रोंकी प्रवृत्ति हुई।

द्वापरमें भगवान् श्रीहरि सत्यवतीके गर्भसे उसी तरह प्रकट हुए, जैसे अरणिसे आग प्रकट होती है। उस समय उनका नाम श्रीकृष्णद्वैपायन हुआ। मुनिवर! श्रीकृष्णद्वैपायनने वेदोंको संक्षिप्त करके उन्हें चार भागोंमें विभक्त किया। इस प्रकार चार भागोंमें वेदोंका व्यास (विस्तार) करनेसे वे लोकमें वेदव्यासके नामसे विख्यात हुए। इसी तरह उन्होंने पुराणोंको संक्षिप्त करके चार लाख श्लोकोंमें सीमित किया। आज भी देवलोकमें पुराणोंका विस्तार सौ कोटि श्लोकोंमें है। जो द्विज छहों अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंको तो जानता है किन्तु पुराणको नहीं जानता, वह श्रेष्ठ विद्वान् नहीं हो सकता। इतिहास और पुराणोंसे वेदकी व्याख्या करे। जिसका ज्ञान बहुत कम है अर्थात् जो पौराणिक ज्ञानसे शून्य है, ऐसे पुरुषसे वेद यह सोचकर डरता है कि यह मुझपर प्रहार कर बैठेगा। सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं। छोटे और बड़ेके भेदसे अठारह पुराण बताये गये हैं।

१. ब्रह्मपुराण, २. पद्मपुराण,
३. विष्णुपुराण, ४. शिवपुराण,
५. भागवतपुराण, ६. भविष्यपुराण,
७. नारदपुराण, ८. मार्कण्डेयपुराण,
९. अग्निपुराण, १०. ब्रह्मवैवर्तपुराण,
११. लिंगपुराण, १२. वाराहपुराण,
१३. स्कन्दपुराण, १४. वामनपुराण,
१५. कूर्मपुराण, १६. मत्स्यपुराण,
१७. गरुडपुराण और १८. ब्रह्माण्डपुराण—
यह पुराणोंका पवित्र क्रम है। इसमें शिवपुराण चौथा है, जो भगवान् शिवसे सम्बन्ध रखता है और सब मनोरथोंका साधक है। इस ग्रन्थकी श्लोकसंख्या एक लाख है और यह बारह संहिताओंमें विभक्त है। इसका निर्माण साक्षात् भगवान् शिवने ही

* वायवीयसंहिता * ६६५

किया है तथा इसमें धर्म प्रतिष्ठित है। वेदव्यासने इस एक लाख श्लोकवाले शिवपुराणको संक्षिप्त करके चौबीस हजार श्लोकोंका कर दिया है। इसमें सात संहिताएँ हैं। पहली विद्येश्वरसंहिता, दूसरी रुद्रसंहिता, तीसरी शतरुद्रसंहिता, चौथी कोटिरुद्रसंहिता, पाँचवीं उमासंहिता, छठी कैलाससंहिता और सातवीं वायवीयसंहिता है। इस प्रकार इसमें सात ही संहिताएँ हैं। विद्येश्वरसंहितामें दो हजार, रुद्रसंहितामें दस हजार पाँच सौ, शतरुद्रसंहितामें दो हजार एक सौ अस्सी, कोटिरुद्रसंहितामें दो हजार दो सौ चालीस, उमासंहितामें एक हजार आठ सौ चालीस, कैलाससंहितामें एक हजार दो सौ चालीस और वायवीयसंहितामें चार हजार श्लोक हैं। इस परम पवित्र शिवपुराणको आपलोगोंने सुन लिया। केवल चार हजार श्लोकोंकी वायवीयसंहिता रह गयी है, जो दो भागोंसे युक्त है। उसका वर्णन मैं करूँगा। जो वेदोंका विद्वान् न हो, उससे इस उत्तम शास्त्रका वर्णन नहीं करना चाहिये। जो पुराणोंको न जानता हो और जिसकी पुराणपर श्रद्धा न हो उससे भी इसकी कथा नहीं कहनी चाहिये। जो भगवान् शिवका भक्त हो, शिवोक्त धर्मका पालन करता हो और दोषदृष्टिसे रहित हो, उस जाँचे-बूझे हुए धर्मात्मा शिष्यको ही इसका उपदेश देना चाहिये। जिनकी कृपासे मुझको पुराणसंहिताका ज्ञान है, उन अमिततेजस्वी भगवान् व्यासको नमस्कार है। (अध्याय १)

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ऋषियोंका ब्रह्माजीके पास जा उनकी स्तुति करके उनसे परमपुरुषके विषयमें प्रश्न करना और ब्रह्माजीका आनन्दमग्न हो 'रुद्र' कहकर उत्तर देना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! पहले अनेक कल्पोंके बारंबार बीतनेपर सुदीर्घकालके पश्चात् जब यह वर्तमान कल्प उपस्थित हुआ और सृष्टिका कार्य आरम्भ हुआ, जब जीविका-साधक कर्म—कृषि, गोरक्षा और वाणिज्यकी प्रतिष्ठा हुई तथा प्रजावर्गके लोग सजग एवं सचेत हो गये, तब छः कुलोंमें उत्पन्न हुए महर्षियोंमें परस्पर बहस छिड़ गयी। 'यह परब्रह्म है या नहीं है' इस प्रकार उनमें महान् विवाद होने लगा, किंतु परम तत्त्वका निरूपण अत्यन्त कठिन होनेके कारण उस समय वहाँ कुछ निश्चय न हो सका। तब वे सब लोग जगत्-स्रष्टा अविनाशी ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर गये, जहाँ देवताओं और असुरोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए भगवान् ब्रह्मा विराजमान थे। देवताओं और दानवोंसे भरे हुए सुन्दर रमणीय मेरुशिखरपर, जहाँ सिद्ध और चारण परस्पर बातचीत करते हैं, यक्ष और गन्धर्व सदा रहते हैं, विहंगोंके समुदाय कलरव करते हैं, मणि और मूँगे जिसकी शोभा बढ़ाते हैं तथा निकुंज, कन्दराएँ, छोटी गुफाएँ और अनेकानेक निर्झर जिसे सुशोभित करते हैं,

६६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

एक ब्रह्मवन नामसे प्रसिद्ध वन है। उसमें नाना प्रकारके वन्यपशु भरे हुए हैं। उसकी लंबाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजनकी है। उसके भीतर एक रमणीय सरोवर है, जो सुस्वादु निर्मल जलसे भरा रहता है। वहाँके रमणीय पुष्पित वृक्षोंपर मतवाले भौंरे छाये रहते हैं। उस वनमें एक मनोहर एवं विशाल नगर है, जो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता रहता है। वहाँ दुर्धर्ष शक्तिसे युक्त बलाभिमानी दैत्य, दानव तथा राक्षसोंका निवास है। वह नगर तपाये हुए सुवर्णका बना जान पड़ता है। उसकी चहारदीवारियाँ और सदर फाटक बहुत ऊँचे हैं। छोटे बुर्जों, ढालू छतों, आवासस्थानों तथा सैकड़ों गलियोंसे उस नगरकी बड़ी शोभा है। वह विचित्र बहुमूल्य मणियोंसे आकाशको चूमता-सा प्रतीत होता है तथा कई करोड़ विशाल भवनोंसे अलंकृत है।

उस नगरमें प्रजापति ब्रह्मा अपने सभासदोंके साथ निवास करते हैं। वहाँ जाकर उन मुनियोंने साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजीको देखा। देवर्षियोंके समुदाय उनकी सेवामें बैठे थे। उनकी अंगकान्ति शुद्ध सुवर्णके समान थी। वे सब आभूषणोंसे विभूषित थे। उनका मुख प्रसन्न था, उससे सौम्यभाव प्रकट होता था। उनके नेत्र कमलदलके समान विशाल थे। दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, दिव्य गन्ध एवं अनुलेपनसे चर्चित, दिव्य श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित ब्रह्माजीके चरणारविन्दोंकी वन्दना सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा योगीन्द्र भी करते थे। जैसे प्रभा दिवाकरकी सेवा करती है, उसी प्रकार समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त साक्षात् सरस्वतीदेवी हाथमें चँवर ले उनकी सेवा कर रही थीं, इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी।

ब्रह्माजीका दर्शन करके उन सभी महर्षियोंके मुख और नेत्र खिल उठे। उन्होंने मस्तकपर अंजलि बाँधकर उन सुर-श्रेष्ठकी स्तुति की।

ऋषि बोले—संसारकी सृष्टि, पालन और संहारके हेतु तीन रूप धारण करनेवाले आप पुराणपुरुष परमात्मा ब्रह्माको नमस्कार है। प्रकृति जिनका शरीर है, जो प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं तथा प्रकृतिरूपमें तेईस विकारोंसे युक्त होनेपर भी जो वास्तवमें निर्विकार हैं, उन ब्रह्मदेवको नमस्कार है। ब्रह्माण्ड जिनकी देह है, तो भी जो ब्रह्माण्डके उदरमें निवास करते हैं तथा वहाँ रहकर जिनके कार्य और करण सम्यक्-रूपसे सिद्ध होते हैं, उन ब्रह्माजीको नमस्कार है।

जो सर्वलोकस्वरूप तथा समस्त लोकोंके

* वायवीयसंहिता * ६६७

स्रष्टा हैं, जो सम्पूर्ण जीवोंका शरीरसे संयोग और वियोग करानेमें हेतु हैं, उन ब्रह्माजीको नमस्कार है। नाथ! पितामह! आपसे ही सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, तथापि मायासे आवृत्त होनेके कारण हम आपको नहीं जानते।

सूतजी कहते हैं—उन महाभाग महर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर ब्रह्माजी उन मुनियोंको आह्लाद प्रदान करते हुए गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले।

ब्रह्माजीने कहा—महान्‌ सत्त्वगुणसे सम्पन्न महाभाग महातेजस्वी महर्षियो! तुम सब लोग एक साथ यहाँ किसलिये आये हो?

ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन सभी मुनियोंने हाथ जोड़ विनयभरी वाणीमें कहा।

मुनि बोले—भगवन्‌! हमलोग अज्ञानके महान्‌ अन्धकारसे आवृत्त हो खिन्न हो रहे हैं। परस्पर विवाद करते हुए हमें परमतत्त्वका साक्षात्कार नहीं हो रहा है। आप सम्पूर्ण जगत्‌के धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। नाथ! यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको विदित न हो। कौन ऐसा पुरुष है, जो सम्पूर्ण जीवोंसे पुरातन, अन्तर्यामी, उत्कृष्ट विशुद्ध परिपूर्ण एवं सनातन परमेश्वर है? कौन अपने अद्भुत क्रियाकलापद्वारा सबसे प्रथम संसारकी सृष्टि करता है? महाप्राज्ञ! हमारे इस संदेहका निवारण करनेके लिये आप हमें परमार्थतत्त्वका उपदेश दें।

मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। वे देवताओं, दानवों और मुनियोंके निकट खड़े हो गये और चिरकालतक ध्यानमग्न हो ‘रुद्र’ ऐसा कहते हुए आनन्दविभोर हो गये। उनका सारा शरीर पुलकित हो उठा और वे हाथ जोड़कर बोले।

(अध्याय २)


ब्रह्माजीके द्वारा परमतत्त्वके रूपमें भगवान्‌ शिवकी ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी कृपाको ही सब साधनोंका फल बताना तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिषारण्यमें आना

ब्रह्माजीने कहा—मुनियो! जिन्हें न पाकर मनसहित वाणी लौट आती है, जिनके आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करनेवाला पुरुष कभी किसीसे नहीं डरता, जिनसे सम्पूर्ण भूतों और इन्द्रियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्रपूर्वक यह समस्त जगत्‌ पहले प्रकट होता है, जो कारणोंके भी स्रष्टा और विचारक परम कारण हैं, जिनके सिवा और किसीसे कभी भी जगत्‌की उत्पत्ति नहीं होती, * सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके


* यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं यस्य वै विद्वान् न बिभेति कुतश्चन॥
यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम्। सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमं सम्प्रसूयते॥
कारणानां च यो धाता ध्याता परमकारणम्। न सम्प्रसूयतेऽन्यस्मात् कुतश्चन कदाचन॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ३। १–३)

६६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *


कारण जो स्वयं ही सर्वेश्वर नाम धारण करते हैं, सब मुमुक्षु जिन शम्भुका अपने हृदय-आकाशके भीतर ध्यान करते हैं, जिन्होंने सबसे पहले मुझे ही अपने पुत्रके रूपमें उत्पन्न किया और मुझे ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान दिया, जिनके कृपाप्रसादसे मैंने यह प्रजापतिका पद प्राप्त किया है, जो ईश्वर अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चल-भावसे प्रकाशमान आकाशमें विराजमान है, जिन परमपुरुष परमात्मासे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है, जो अकेले ही बहुत-से निष्क्रिय जीवोंके शासक एवं उन्हें सक्रियता प्रदान करनेवाले हैं, जो महेश्वर एक बीजको अनेक रूपोंमें परिणत कर देते हैं, जो सबका शासन करनेवाले ईश्वर इन जीवोंसहित इन समस्त लोकोंको वशमें रखते हैं, सब रूपोंमें जो एकमात्र भगवान् रुद्र ही हैं, दूसरा कोई नहीं है, जो सदा ही मनुष्योंके हृदयमें भलीभाँति प्रविष्ट होकर स्थित हैं, जो स्वयं सम्पूर्ण विश्वको देखते हुए भी दूसरोंसे कदापि लक्षित नहीं होते और सदा समस्त जगत्के अधिष्ठाता हैं, जो अनन्त शक्तिशाली एकमात्र भगवान् रुद्र कालसे मुक्त समस्त कारणोंपर भी शासन करते हैं, जिनके लिये न दिन है न रात्रि है, जिनके समान भी कोई नहीं है, फिर अधिक तो हो ही कैसे सकता है, जिनकी ज्ञान, बल और क्रियारूपा पराशक्ति स्वाभाविक एवं नित्य है।$^१$ जो इस क्षर (विनाशशील), अव्यक्त (प्रकृति)-पर तथा अमृतस्वरूप अक्षर (अविनाशी) जीवात्मापर शासन करते हैं, उनका निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उनमें लगाये रहनेसे तथा उन्हींके तत्त्वकी भावना करते हुए उनमें तन्मय रहनेसे जीव अन्तमें उन्हींको प्राप्त हो जाता है। फिर तो सारी माया अपने-आप दूर हो जाती है। उनके पास न तो बिजली प्रकाश करती है और न सूर्य तथा चन्द्रमा ही अपनी प्रभा फैलाते हैं, अपितु उन्हींके प्रकाशसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। ऐसा सनातन श्रुतिका कथन है।$^२$ एकमात्र महादेव महेश्वरको ही अपना आराध्यदेव जानना चाहिये। उनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई पद उपलब्ध नहीं होता। ये स्वयं ही सबके आदि हैं, किंतु इनका न आदि है न अन्त। ये स्वभावसे ही निर्मल, स्वतन्त्र, परिपूर्ण, स्वेच्छाधीन तथा चराचररूप हैं। इनका शरीर अप्राकृतिक (दिव्य) है। ये श्रीमान् महेश्वर लक्ष्य और लक्षणसे रहित हैं। ये नित्यमुक्त होकर सबको बन्धनसे मुक्त करनेवाले हैं। कालकी सीमासे परे रहकर कालको प्रेरित करने-वाले हैं।$^३$ ये सबके ऊपर निवास करते हैं। स्वयं ही सबके आवासस्थान हैं, सर्वज्ञ हैं तथा छः प्रकारके अध्वा (मार्ग)-से


१-न यस्य दिवसो रात्रिर्न समानो न चाधिकः। स्वाभाविकी पराशक्तिर्नित्या ज्ञानक्रिये अपि॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड ३।१९)
२-यस्मिन्न भासते विद्युन्न सूर्यो न च चन्द्रमाः। यस्य भासा विभातीदमित्येषा शाश्वती श्रुतिः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड ३।१४)
३-अप्राकृतवपुः श्रीमान् लक्ष्यलक्षणवर्जितः। अयं मुक्तो मोचकश्च ह्यकालः कालचोदकः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड ३।१७)

* वायवीयसंहिता * ६६९

युक्त इस सम्पूर्ण जगत्‌के पालक हैं। उत्तरोत्तर उत्कृष्ट भूतोंसे वे परम उत्कृष्ट हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। अनन्त आनन्दराशिरूपी मकरन्दका पान करनेवाले मधुव्रत (भ्रमर) हैं। अखण्ड ब्रह्माण्डोंको मसलकर मृत्पिण्डके समान कर देनेकी कलामें पण्डित हैं। उदारता, वीरता, गम्भीरता और मधुरताके महासागर हैं। इनके समान भी कोई वस्तु नहीं है, फिर इनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकती है। ये उपमारहित हैं। समस्त प्राणियोंके राजाधिराजके रूपमें विराजमान हैं। ये ही सृष्टिके प्रारम्भमें अपने अद्भुत क्रियाकलापद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करते हैं और अन्तकालमें यह फिर इन्हींमें लीन हो जायगा। सब प्राणी इन्हींके वशमें हैं। ये ही सबको विभिन्न कार्योंमें नियुक्त करनेवाले हैं। पराभक्तिसे ही इनका दर्शन होता है, अन्य किसी प्रकारसे कभी नहीं।

व्रत, सम्पूर्ण दान, तपस्या और नियम—इन सब साधनोंको पूर्वकालमें सत्पुरुषोंने भावशुद्धि तथा अनुरागकी उत्पत्तिके लिये ही बताया था, इसमें संशय नहीं है। मैं, भगवान् विष्णु, रुद्रदेव तथा दूसरे-दूसरे देवता एवं असुर आज भी उग्र तपस्याओंके द्वारा उनके दर्शनकी इच्छा रखते हैं। धर्मभ्रष्ट, मूढ़, दुष्ट और घृणित आचार-विचारवाले लोगोंको उनका दर्शन होना असम्भव है। भक्तजन भीतर और बाहर भी उन्हींका पूजन एवं ध्यान करते हैं। यह रूप तीन प्रकारका है—स्थूल, सूक्ष्म और इन दोनोंसे परे। हम सब देवता आदि जिस रूपको प्रत्यक्ष देखते हैं, वह स्थूल है। सूक्ष्मरूपका दर्शन केवल योगियोंको होता है और उससे भी परे जो नित्य, ज्ञानस्वरूप आनन्दमय तथा अविनाशी भगवत्स्वरूप है, वह उसमें निष्ठा रखनेवाले भजनपरायण भक्तोंकी ही दृष्टिमें आता है। भगवद्व्रतका आश्रय लेनेवाले भक्त ही उसको देख पाते हैं। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, गुह्यसे भी गुह्यतर एवं उत्कृष्ट साधन है भगवान् शिवके प्रति भक्ति। जो उस भक्तिसे युक्त है, वह संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है। वह भक्ति भगवान् शिवकी कृपासे ही उपलब्ध होती है और उनकी कृपा भी भक्तिसे ही सम्भव होती है—इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरेके आश्रित हैं—ठीक वैसे ही, जैसे अंकुरसे बीज और बीजसे अंकुर होता है। जीवको भगवत्कृपासे ही सर्वत्र सिद्धियाँ मिलती हैं। सम्पूर्ण साधनोंसे अन्तमें भगवान्‌की कृपा ही साध्य है। अन्तःकरणकी शुद्धि या प्रसादका साधन है धर्म और उस धर्मके स्वरूपका प्रतिपादन वेदने किया है। वेदोंके अभ्याससे पहलेके पुण्य और पापोंमें समता आती है, उस समतासे प्रसाद (प्रसन्नता या अन्तःशुद्धि)-का सम्पर्क प्राप्त होता है और उससे धर्मकी वृद्धि होती है। धर्मकी वृद्धिसे पशु (जीव)-के पापोंका क्षय होता है। इस तरह जिसके पाप क्षीण हो गये हैं, उस जीवको अनेक जन्मोंके अभ्याससे क्रमशः उमा-महेश्वरके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त होकर उसके हृदयमें उनके प्रति भक्तिका उदय होता है। उस भक्तिभावके अनुरूप ही महेश्वरके कृपाप्रसादका उद्रेक होता है। उस प्रसादसे कर्मोंका त्याग होता है। कर्मोंके त्यागका अभिप्राय उनके फलोंके त्यागसे है, कर्मोंके स्वरूपतः त्यागसे नहीं। अतः यह सिद्ध

६७० * संक्षिप्त शिवपुराण *

हुआ कि कर्मफलोंके त्यागसे शिवधर्ममें मंगलमयी प्रवृत्ति होती है।

इसलिये शिवका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम सब लोग अपने स्त्री-पुत्रों और अग्नियोंके साथ वाणी और मनके दोषोंसे रहित होकर एकमात्र भगवान् शिवका ही ध्यान करते रहो। उन्हींमें निष्ठा रखकर उनके भजनमें तत्पर हो जाओ। उन्हींमें मन लगाकर उनके आश्रित होकर रहो। सब कार्य करते हुए मनसे उन्हींका चिन्तन किया करो। एक सहस्र दिव्य वर्षोंके लिये दीर्घकालिक यज्ञका आरम्भ करके उसे पूर्ण करो। यज्ञके अन्तमें मन्त्रद्वारा आवाहन करनेपर साक्षात् वायुदेवता वहाँ पधारेंगे। फिर वे ही तुम सब लोगोंके कल्याणका साधन एवं उपाय बतायेंगे। तत्पश्चात् तुम सब लोग परम सुन्दर पुण्यमयी वाराणसी-पुरीको जाना, जहाँ पिनाकपाणि श्रीमान् भगवान् विश्वनाथ भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवी पार्वतीके साथ सदा विहार करते हैं। द्विजोत्तमो! वहाँ तुम्हें बड़ा भारी आश्चर्य दिखायी देगा। उस आश्चर्यको देखकर तुम फिर मेरे पास आना, तब मैं तुम्हें मोक्षका उपाय बताऊँगा। उस उपायसे एक ही जन्ममें मुक्ति तुम्हारे हाथमें आ जायगी, जो अनेक जन्मोंके संसारबन्धनसे छुटकारा दिलानेवाली होगी। यह मैंने मनोमय चक्रका निर्माण किया है। इस चक्रको मैं यहाँसे छोड़ता हूँ। जहाँ जाकर इसकी नेमि विशीर्ण हो जाय—टूट-फूट जाय, वही तपस्याके लिये शुभ देश है।

ऐसा कहकर पितामह ब्रह्माने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोमय चक्रकी ओर देखा और महादेवजीको प्रणाम करके उसे छोड़ दिया। वे सब ब्राह्मण उन लोकनाथ ब्रह्माजीको प्रणाम करके उस स्थानके लिये चल दिये, जहाँ उस चक्रकी नेमि जीर्ण-शीर्ण होनेवाली थी। ब्रह्माजीका फेंका हुआ वह सुन्दर चक्र मनोहर शिलाखण्डोंसे युक्त और निर्मल एवं स्वादिष्ठ जलसे पूर्ण किसी वनमें गिरा। उस चक्रकी नेमिके शीर्ण होनेसे वह मुनिपूजित वन नैमिष नामसे विख्यात हुआ। अनेक यक्ष, गन्धर्व और विद्याधर वहाँ आकर रहने लगे। पूर्वकालमें जगत्‌की सृष्टिकी इच्छा रखनेवाले विश्वस्रष्टा एवं गार्हपत्य अग्निके उपासक ब्रह्मज्ञ प्रजापतियोंने वहीं दिव्य यज्ञका आरम्भ किया था। वहीं शब्दशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा न्यायशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् महर्षियोंने शक्ति, ज्ञान और क्रियायोगके द्वारा शास्त्रीय विधिक अनुष्ठान किया था। उसी स्थानपर वेदवेत्ता विद्वान् सदा वाद और जल्पके बलसे युक्त वचनोंद्वारा अतिवाद करनेवाले वेदबहिष्कृत नास्तिकोंको पराहत या पराजित

* वायवीयसंहिता * ६७१

करते थे। तभीसे नैमिषारण्य ऋषियोंकी तपस्याके योग्य स्थान बन गया। स्फटिक-मणिमय पर्वतकी शिलाओंसे झरते हुए अमृतके समान मधुर एवं स्वच्छ जलके कारण वह वन बड़ा रमणीय प्रतीत होता है। वहाँ प्रायः अत्यन्त रसीले फल देनेवाले वृक्ष हैं तथा उस वनमें हिंसक जीव-जन्तुओंका अभाव है।
(अध्याय ३)


नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन, उनका सत्कार तथा ऋषियोंके पूछनेपर वायुके द्वारा पशु, पाश एवं पशुपतिका तात्त्विक विवेचन

सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो ! उस समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महाभाग महर्षियोंने उस देशमें महादेवजीकी आराधना करते हुए एक महान् यज्ञका आयोजन किया। वह यज्ञ जब आरम्भ हुआ, तब महर्षियोंको सर्वथा आश्चर्यजनक जान पड़ा। तदनन्तर समय बीतनेपर जब प्रचुर दक्षिणाओंसे युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे वायुदेव स्वयं वहाँ पधारे। उनको आया देख दीर्घकालिक यज्ञका अनुष्ठान करनेवाले वे मुनि ब्रह्माजीकी बातको याद करके अनुपम हर्षका अनुभव करने लगे। उन सबने उठकर आकाशजन्मा वायुदेवताको प्रणाम किया और उन्हें बैठनेके लिये एक सोनेका बना हुआ आसन दिया। वायुदेवता उस आसनपर बैठे। मुनियोंने उनकी विधिवत् पूजा की। तदनन्तर उन सबका अभिनन्दन करके वे कुशल-मंगल पूछने लगे।

वायुदेवता बोले—ब्राह्मणो! इस महान् यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण होनेतक तुम सब लोग सकुशल रहे न? यज्ञहन्ता देवद्रोही दैत्योंने तुम्हें बाधा तो नहीं पहुँचायी ? तुम्हें कोई प्रायश्चित्त तो नहीं करना पड़ा ? तुम्हारे यज्ञमें कोई दोष तो नहीं आया ? क्या तुमलोगोंने स्तोत्र और शस्त्रग्रहोंद्वारा देवताओंका तथा पितृकर्मोंद्वारा पितरोंका भलीभाँति पूजन करके यज्ञ-विधिका अनुष्ठान भलीभाँति सम्पन्न किया ? इस महायज्ञकी समाप्ति हो जानेपर अब आपलोग क्या करना चाहते हैं?

मुनियोंने कहा—प्रभो! हमारे कल्याणकी वृद्धिके लिये जब आप स्वयं यहाँ आ गये, तब अब हमारा सब प्रकारसे

६७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *


[बायाँ स्तम्भ]

कुशल-मंगल ही है तथा हमारी तपस्या भी उत्तम होगी। अब पहलेका वृत्तान्त सुनिये। हमारा हृदय अज्ञानान्धकारसे आक्रान्त हो गया था, तब हमने विज्ञानकी प्राप्तिके लिये पूर्वकालमें प्रजापतिकी उपासना की। शरणागतवत्सल प्रजापतिने हम शरणागतों-पर कृपा करके इस प्रकार कहा—'ब्राह्मणो! रुद्रदेव सबसे श्रेष्ठ हैं। वे ही परम कारण हैं। उन्हें तर्कसे नहीं जाना जा सकता। भक्तिमान् पुरुष ही उनके स्वरूपको ठीक-ठीक देखता और समझता है। भक्ति भी उनकी कृपासे ही मिलती है और उस कृपासे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है। अतः उनके कृपाप्रसादको प्राप्त करनेके लिये तुमलोग नैमिषारण्यमें यज्ञका आयोजन करो। दीर्घकालतक चलनेवाले उस यज्ञके द्वारा परम कारण रुद्रदेवकी आराधना करो। यज्ञके अन्तमें उन रुद्रदेवके कृपा-प्रसादसे वायुदेवता वहाँ पधारेंगे। उनके मुखसे वहाँ तुम्हें ज्ञानलाभ होगा और उससे कल्याणकी प्राप्ति होगी।' महाभाग! ऐसा आदेश देकर परमेष्ठीने हम सबको यहाँ भेजा। हम इस देशमें आपके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए एक सहस्त्र दिव्य वर्षोंतक दीर्घकालिक यज्ञके अनुष्ठानमें लगे रहे हैं। अतः इस समय आपके आगमनके सिवा हमारे लिये दूसरी कोई प्रार्थनीय वस्तु नहीं है।

दीर्घकालसे यज्ञानुष्ठानमें लगे हुए उन महर्षियोंका यह पुरातन वृत्तान्त सुनकर वायुदेवता मन-ही-मन प्रसन्न हो मुनियोंसे घिरे हुए वहाँ बैठे रहे। फिर उन सबके पूछनेपर उनके भक्तिभावकी वृद्धिके लिये उन्होंने भगवान् शंकरके सृष्टि आदि ऐश्वर्यको संक्षेपसे बताया।


[दायाँ स्तम्भ]

नैमिषारण्यके ऋषियोंने पूछा—देव! आपने ईश्वरविषयक ज्ञान कैसे प्राप्त किया? तथा आप अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके शिष्य किस प्रकार हुए?

वायुदेवता बोले—महर्षियो! उन्नीसवें कल्पका नाम श्वेतलोहितकल्प समझना चाहिये। उसी कल्पमें चतुर्मुख ब्रह्माने सृष्टिकी कामनासे तपस्या की। उनकी उस तीव्र तपस्यासे संतुष्ट हो स्वयं उनके पिता देवदेव महेश्वरने उन्हें दर्शन दिया। वे दिव्य कुमारावस्थासे युक्त रूप धारण करके रूपवानोंमें श्रेष्ठ श्वेत नामक मुनि होकर दिव्य वाणी बोलते हुए उनके सामने उपस्थित हुए। वेदोंके अधिपति तथा सबके पालक पिता महेश्वरका दर्शन करके गायत्रीसहित ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया और उन्हींसे उत्तम ज्ञान पाया। ज्ञान पाकर विश्वकर्मा चतुर्मुख ब्रह्मा सम्पूर्ण चराचर भूतोंकी सृष्टि करने लगे। साक्षात् परमेश्वर शिवसे सुनकर ब्रह्माजीने अमृतस्वरूप ज्ञान प्राप्त किया था, इसलिये मैंने तपस्याके बलसे उन्हींके मुखसे उस ज्ञानको उपलब्ध किया।

मुनियोंने पूछा—आपने वह कौन-सा ज्ञान प्राप्त किया, जो सत्यसे भी परम सत्य एवं शुभ है तथा जिसमें उत्तम निष्ठा रखकर पुरुष परमानन्दको प्राप्त करता है?

वायुदेवता बोले—महर्षियो! मैंने पूर्वकालमें पशु-पाश और पशुपतिका जो ज्ञान प्राप्त किया था, सुख चाहनेवाले पुरुषको उसीमें ऊँची निष्ठा रखनी चाहिये। अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला दुःख ज्ञानसे ही दूर होता है। वस्तुके विवेकका नाम ज्ञान है। वस्तुके तीन भेद माने गये हैं—जड (प्रकृति), चेतन (जीव) और उन दोनोंका

* वायवीयसंहिता *
६७३

नियन्ता (परमेश्वर)। इन्हीं तीनोंको क्रमसे पाश, पशु तथा पशुपति कहते हैं। तत्त्वज्ञ पुरुष प्रायः इन्हीं तीन तत्त्वोंको क्षर, अक्षर तथा उन दोनोंसे अतीत कहते हैं। अक्षर ही पशु कहा गया है। क्षर तत्त्वका ही नाम पाश है तथा क्षर और अक्षर दोनोंसे परे जो परमतत्त्व है, उसीको पति या पशुपति कहते हैं। प्रकृतिको ही क्षर कहा गया है। पुरुष (जीव)-को ही अक्षर कहते हैं और जो इन दोनोंको प्रेरित करता है, वह क्षर और अक्षर दोनोंसे भिन्न तत्त्व परमेश्वर कहा गया है। मायाका ही नाम प्रकृति है। पुरुष उस मायासे आवृत है। मल और कर्मके द्वारा प्रकृतिका पुरुषके साथ सम्बन्ध होता है। शिव ही इन दोनोंके प्रेरक ईश्वर हैं। माया महेश्वरकी शक्ति है। चित्स्वरूप जीव उस मायासे आवृत है। चेतन जीवको आच्छादित करनेवाला अज्ञानमय पाश ही मल कहलाता है। उससे शुद्ध हो जानेपर जीव स्वतः शिव हो जाता है। वह विशुद्ध ही शिवत्व है।

मुनियोंने पूछा—सर्वव्यापी चेतनको माया किस हेतुसे आवृत करती है? किसलिये पुरुषको आवरण प्राप्त होता है? और किस उपायसे उसका निवारण होता है?

वायुदेवता बोले—व्यापक तत्त्वको भी आंशिक आवरण प्राप्त होता है; क्योंकि कला आदि भी व्यापक हैं। भोगके लिये किया गया कर्म ही उस आवरणमें कारण है। मलका नाश होनेसे वह आवरण दूर हो जाता है। कला, विद्या, राग, काल और नियति—इन्हींको कला आदि कहते हैं। कर्मफलका जो उपभोग करता है, उसीका नाम पुरुष (जीव) है। कर्म दो प्रकारके हैं—पुण्यकर्म और पापकर्म। पुण्यकर्मका फल सुख और पापकर्मका फल दुःख है। कर्म अनादि है और फलका उपभोग कर लेनेपर उसका अन्त हो जाता है। यद्यपि जड कर्मका चेतन आत्मासे कुछ सम्बन्ध नहीं है, तथापि अज्ञानवश जीवने उसे अपने-आपमें मान रखा है। भोग कर्मका विनाश करनेवाला है, प्रकृतिको भोग्य कहते हैं और भोगका साधन है शरीर। बाह्य इन्द्रियाँ और अन्तःकरण उसके द्वार हैं। अतिशय भक्तिभावसे उपलब्ध हुए महेश्वरके कृपाप्रसादसे मलका नाश होता है और मलका नाश हो जानेपर पुरुष निर्मल—शिवके समान हो जाता है। विद्या पुरुषकी ज्ञानशक्तिको और कला उसकी क्रियाशक्तिको अभिव्यक्त करनेवाली है। राग भोग्य वस्तुके लिये क्रियामें प्रवृत्त करनेवाला होता है। काल उसमें अवच्छेदक होता है और नियति उसे नियन्त्रणमें रखनेवाली है। अव्यक्तरूप जो कारण है, वह त्रिगुणमय है; उसीसे जड जगत्‌की उत्पत्ति होती है और उसीमें उसका लय होता है। तत्त्व-चिन्तक पुरुष उस अव्यक्तको ही प्रधान और प्रकृति कहते हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिसे प्रकट होते हैं; तिलमें तेलकी भाँति वे प्रकृतिमें सूक्ष्मरूपसे विद्यमान रहते हैं। सुख और उसके हेतुको संक्षेपसे सात्त्विक कहा गया है, दुःख और उसके हेतु राजस कार्य हैं तथा जडता और मोह—वे तमोगुणके कार्य हैं। सात्त्विकी वृत्ति ऊर्ध्वको ले जानेवाली है, तामसी वृत्ति अधोगतिमें डालनेवाली है तथा राजसी वृत्ति मध्यम स्थितिमें रखनेवाली है। पाँच


789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 A

६७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

तन्मात्राएँ, पाँच भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा प्रधान (चित्त), महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार और मन—ये चार अन्तःकरण—सब मिलकर चौबीस तत्त्व होते हैं। इस प्रकार संक्षेपसे ही विकाससहित अव्यक्त (प्रकृति)-का वर्णन किया गया। कारणावस्थामें रहनेपर ही इसे अव्यक्त कहते हैं और शरीर आदिके रूपमें जब वह कार्यावस्थाको प्राप्त होता है, तब उसकी 'व्यक्त' संज्ञा होती है—ठीक उसी तरह, जैसे कारणावस्थामें स्थित होनेपर जिसे हम 'मिट्टी' कहते हैं वही कार्यावस्थामें 'घट' आदि नाम धारण कर लेती है। जैसे घट आदि कार्य मृत्तिका आदि कारणसे अधिक भिन्न नहीं है, उसी प्रकार शरीर आदि व्यक्त पदार्थ अव्यक्तसे अधिक भिन्न नहीं हैं। इसलिये एकमात्र अव्यक्त ही कारण, करण, उनका आधारभूत शरीर तथा भोग्य वस्तु है, दूसरा कोई नहीं।

मुनियोंने पूछा—प्रभो! बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरसे व्यतिरिक्त किसी आत्मा नामक वस्तुकी वास्तविक स्थिति कहाँ है?

वायुदेवता बोले—महर्षियो! सर्वव्यापी चेतनका बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरसे पार्थक्य अवश्य है। आत्मा नामक कोई पदार्थ निश्चय ही विद्यमान है; परन्तु उसकी सत्तामें किसी हेतुकी उपलब्धि बहुत ही कठिन है! सत्पुरुष बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरको आत्मा नहीं मानते; क्योंकि स्मृति (बुद्धिका ज्ञान) अनियत है तथा उसे सम्पूर्ण शरीरका एक साथ अनुभव नहीं होता। इसीलिये वेदों और वेदान्तोंमें आत्माको पूर्वानुभूत विषयोंका स्मरणकर्ता, सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थोंमें व्यापक तथा अन्तर्यामी कहा जाता है। यह न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। न ऊपर है, न अगल-बगलमें है, न नीचे है और न किसी स्थान-विशेषमें। यह सम्पूर्ण चल शरीरोंमें अविचल, निराकार एवं अविनाशीरूपसे स्थित है। ज्ञानी पुरुष निरन्तर विचार करनेसे उस आत्मतत्त्वका साक्षात्कार कर पाते हैं।$^१$

पुरुषका जो वह शरीर कहा गया है, इससे बढ़कर अशुद्ध, पराधीन, दुःखमय और अस्थिर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। शरीर ही सब विपत्तियोंका मूल कारण है। उससे युक्त हुआ पुरुष अपने कर्मके अनुसार सुखी, दुःखी और मूढ़ होता है।$^२$ जैसे पानीसे सींचा हुआ खेत अंकुर उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अज्ञानसे आप्लावित हुआ कर्म नूतन शरीरको जन्म देता है। ये शरीर अत्यन्त दुःखोंके आलय माने जाते हैं। इनकी मृत्यु अनिवार्य होती है। भूतकालमें कितने ही शरीर नष्ट हो गये और


१-न च स्त्री न पुमानेष नैव चापि नपुंसकः। नैवोर्ध्वं नापि तिर्यक् च नाधस्तान्न कुतश्चन ॥
अशरीरं शरीरेषु चलेषु स्थाणुमव्ययम्। सदा पश्यति तं धीरो नरः प्रत्यवमर्शनात् ॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ५ । ४८-४९)
२-यच्छरीरमिदं प्रोक्तं पुरुषस्य ततः परम्। अशुद्धमवशं दुःखमध्रुवं न च विद्यते॥
विपदां बीजभूतेन पुरुषस्तेन संयुतः। सुखी दुःखी च मूढश्च भवति स्वेन कर्मणा॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ५ । ५१-५२)

789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 B

* वायवीयसंहिता * ६७५

भविष्यकालमें सहस्रों शरीर आनेवाले हैं, वे सब आ-आकर जब जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, तब पुरुष उन्हें छोड़ देता है। कोई भी जीवात्मा किसी भी शरीरमें अनन्त कालतक रहनेका अवसर नहीं पाता। यहाँ स्त्रियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंसे जो मिलन होता है, वह पथिकको मार्गमें मिले हुए दूसरे पथिकोंके समागमके ही समान है। जैसे महासागरमें एक काष्ठ कहींसे और दूसरा काष्ठ कहींसे बहता आता है, वे दोनों काष्ठ कहीं थोड़ी देरके लिये मिल जाते हैं और मिलकर फिर बिछड़ जाते हैं। उसी प्रकार प्राणियोंका यह समागम भी संयोग-वियोगसे युक्त है।* ब्रह्माजीसे लेकर स्थावर प्राणियोंतक सभी जीव पशु कहे गये हैं। उन सभी पशुओंके लिये ही यह दृष्टान्त या दर्शन-शास्त्र कहा गया है। यह जीव पाशोंमें बँधता और सुख-दुःख भोगता है, इसलिये 'पशु' कहलाता है। यह ईश्वरकी लीलाका साधन-भूत है, ऐसा ज्ञानी महात्मा कहते हैं।

(अध्याय ४-५)


महेश्वरकी महत्ताका प्रतिपादन

वायुदेवता कहते हैं—महर्षियो! इस विश्वका निर्माण करनेवाला कोई पति है, जो अनन्त रमणीय गुणोंका आश्रय कहा गया है। वही पशुओंको पाशसे मुक्त करनेवाला है। उसके बिना संसारकी सृष्टि कैसे हो सकती है; क्योंकि पशु अज्ञानी और पाश अचेतन है। प्रधान परमाणु आदि जितने भी जड तत्त्व हैं, उन सबका कर्ता वह पति ही है—यह बात स्वयं समझमें आ जाती है। किसी बुद्धिमान् या चेतन कारणके बिना इन जड तत्त्वोंका निर्माण कैसे सम्भव है। पशु, पाश और पतिका जो वास्तवमें पृथक्-पृथक् स्वरूप है, उसे जानकर ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष योनिसे मुक्त होता है। क्षर और अक्षर—ये दोनों एक-दूसरेसे संयुक्त होते हैं। पति या महेश्वर ही व्यक्ताव्यक्त जगत्का भरण-पोषण करते हैं। वे ही जगत्को बन्धनसे छुड़ानेवाले हैं। भोक्ता, भोग्य और प्रेरक—ये तीन ही तत्त्व जाननेयोग्य हैं। विज्ञ पुरुषोंके लिये इनसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु जाननेयोग्य नहीं है। सृष्टिके आरम्भमें एक ही रुद्रदेव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत्की सृष्टि करके इसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें सबका संहार कर डालते हैं। उनके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर मुख हैं, सब ओर भुजाएँ हैं और सब ओर चरण हैं। ये ही सबसे पहले देवताओंमें ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं। श्रुति कहती है कि 'रुद्रदेव सबसे श्रेष्ठ महान् ऋषि हैं। मैं इन महान् अमृतस्वरूप अविनाशी पुरुष


* नैवास्य भविता कश्चिन्नासौ भवति कस्यचित्। पथि संगम एवायं दारैः पुत्रैश्च बन्धुभिः॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ। समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागमः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ५। ५८-५९)

789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 C

६७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

परमेश्वरको जानता हूँ। इनकी अंगकान्ति सूर्यके समान है। ये प्रभु अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान हैं।$^{१}$ इन परमात्मासे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इनसे अत्यन्त सूक्ष्म और इनसे अधिक महान् भी कुछ नहीं है। इनसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है। इनके सब ओर हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक, मुख और कान हैं। ये लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। ये सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाले हैं, परंतु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित हैं। सबके स्वामी, शासक, शरणदाता और सुहृद् हैं। ये नेत्रके बिना भी देखते हैं और कानके बिना भी सुनते हैं। ये सबको जानते हैं, किंतु इनको पूर्णरूपसे जाननेवाला कोई नहीं है। इन्हें परम पुरुष कहते हैं। ये अणुसे भी अत्यन्त अणु और महान्‌से भी परम महान् हैं। ये अविनाशी महेश्वर इस जीवकी हृदय-गुफामें निवास करते हैं।$^{२}$

एक साथ रहनेवाले दो पक्षी एक ही वृक्ष (शरीर)-का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमेंसे एक तो उस वृक्षके कर्मरूप फलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा उस वृक्षके फलका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।$^{३}$ जीवात्मा इस वृक्षके प्रति आसक्तिमें डूबा हुआ है, अतः मोहित होकर शोक करता रहता है। वह जब कभी भगवत्कृपासे भक्तसेवित परम कारणरूप परमेश्वरका और उनकी महिमाका साक्षात्कार कर लेता है, तब शोकरहित हो सुखी हो जाता है। छन्द, यज्ञ, क्रतु तथा भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण विश्वको वह मायावी रचता है और मायासे ही उसमें प्रविष्ट होकर रहता है। प्रकृतिको ही माया समझना चाहिये और महेश्वर ही वह मायावी है।$^{४}$ ये विश्वकर्मा महेश्वर ही परम देवता परमात्मा हैं, जो सबके हृदयमें विराजमान हैं। उन्हें जानकर ही पुरुष परमानन्दमय अमृतका अनुभव करता है। ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, असीम एवं अविनाशी परमात्मामें विद्या और अविद्या दोनों गूढ़भावसे स्थित


१-विश्वस्मादधिको रुद्रो महर्षिरिति हि श्रुतिः॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तममृतं ध्रुवम्। आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्संस्थितं प्रभुम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। १७-१८)

२-सर्वतःपाणिपादोऽयं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः। सर्वस्य प्रभुरीशानः सर्वस्य शरणं सुहृत्॥
अचक्षुरपि यः पश्यत्यकर्णोऽपि शृणोति यः। सर्वं वेत्ति न वेत्तास्य तमाहुः पुरुषं परम्॥
अणोरणीयान्महतो महीयानयमव्ययः। गुहायां निहितश्चापि जन्तोरस्य महेश्वरः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। २१-२४)

३-द्वौ सुपर्णौ च सयुजौ समानं वृक्षमाश्रितौ। एकोऽत्ति पिप्पलं स्वादु परोऽनश्नन् प्रपश्यति॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ३०)

४-छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो यद्भूतं भव्यमेव च।
माया विश्वं सृजत्यस्मिन्निविष्टो मायया परः। मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ३२-३३)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 D

* वायवीयसंहिता * ६७७

हैं। विनाशशील जडवर्गको ही यहाँ अविद्या कहा गया है और अविनाशी जीवको विद्या नाम दिया गया है; जो उन दोनों विद्या और अविद्यापर शासन करते हैं, वे महेश्वर उनसे सर्वथा भिन्न—विलक्षण हैं। ये प्रतापी महेश्वर इस जगत्‌में समष्टिभूत और इन्द्रियवर्गरूप एक-एक जालको अनेक प्रकारसे रचकर इसका विस्तार करते हैं। फिर अन्तमें संहार करके सबको अनेकसे एकमें परिणत कर देते हैं तथा पुनः सृष्टिकालमें सबकी पूर्ववत् रचना करके सबपर आधिपत्य करते हैं। जैसे सूर्य अकेला ही ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलकी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ स्वयं भी देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार ये भजनीय परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप पृथ्वी आदि तत्त्वोंका नियमन करते हैं। श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होनेयोग्य, आश्रयरहित कहे जानेवाले, जगत्‌की उत्पत्ति और संहार करनेवाले, कल्याण-स्वरूप एवं सोलह कलाओंकी रचना कर उन महादेवको जो जानते हैं, वे शरीरके बन्धनको सदाके लिये त्याग देते हैं अर्थात् जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं।

वे ही परमेश्वर तीनों कालोंसे परे, निष्कल, सर्वज्ञ, त्रिगुणाधीश्वर एवं साक्षात् परात्पर ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका रूप है। वे सबकी उत्पत्तिके कारण होकर भी स्वयं अजन्मा हैं, स्तुतिके योग्य हैं, प्रजाओंके पालक, देवताओंके भी देवता और सम्पूर्ण जगत्‌के लिये पूजनीय हैं। अपने हृदयमें विराजमान उन परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं। जो काल आदिसे परे, जिनसे यह समस्त प्रपंच प्रकट होता है, जो धर्मके पालक, पापके नाशक, भोगोंके स्वामी तथा सम्पूर्ण विश्वके धाम हैं, जो ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति हैं, उन भुवनेश्वरोंके भी ईश्वर महादेवको हम सबसे परे जानते हैं। उनके शरीररूप कार्य और इन्द्रिय तथा मनरूपी करण नहीं हैं, उनके समान और उनसे अधिक भी इस जगत्‌में कोई नहीं दिखायी देता। ज्ञान, बल और क्रियारूप उनकी स्वाभाविक पराशक्ति वेदोंमें नाना प्रकारकी सुनी गयी है। उन्हीं शक्तियोंसे इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। उसका न कोई स्वामी है, न कोई निश्चित चिह्न है, न उसपर किसीका शासन है। वह समस्त कारणोंका कारण होता हुआ ही उनका अधीश्वर भी है। उनका न कोई जन्मदाता है, न जन्म है, न जन्मके माया-मलादि हेतु ही हैं। वह एक ही सम्पूर्ण विश्वमें, समस्त भूतोंमें गुहारूपसे व्याप्त है। वही सब भूतोंका अन्तरात्मा और धर्माध्यक्ष कहलाता है। वह सब भूतोंके अंदर बसा हुआ, सबका द्रष्टा, साक्षी, चेतन और निर्गुण है। वह एक है, वशी है, अनेकों विवशात्मा निष्क्रिय पुरुषोंको वशमें रखनेवाला है। वह नित्योंका नित्य, चेतनोंका चेतन है। वह एक है, कामनारहित है और बहुतोंकी कामना पूर्ण करनेवाला ईश्वर है। सांख्य और योग अर्थात् ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य सबके कारणरूप उन जगदीश्वर परमदेवको जानकर जीव सम्पूर्ण पाशों (बन्धनों)-से मुक्त हो जाता है। वे सम्पूर्ण विश्वके स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यके हेतु, ज्ञानस्वरूप, कालके भी स्रष्टा, सम्पूर्ण दिव्य गुणोंसे सम्पन्न, प्रकृति और जीवात्माके